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शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

नदिया ! तुम नारी सी!!--कविता --



नदिया! तुम नारी सी -
निर्मल, अविकारी सी ,
 कहीं जन्मती कहीं मिल जाती -
नियति की मारी सी !!

निकली बेखबर  अल्हड , शुभ्रा  ,
स्नेह्वत्सला ,धवल धार ,
 पर्वत  प्रांगण में इठलाती -
  प्रकृति का अनुपम उपहार ;
 सुकुमारी अल्हड बाला -
तुम बाबुल की दुलारी सी -
नदिया ! तुम नारी सी !!

 हुलसती, लहराती  आगे बढ़ती
  नवयौवना , चंचल  ,  चपला
 उमंग भरी , प्रीतम अभिलाषी -
ये रूप तुम्हारा खूब खिला -
 तट- बंधन में कस बहती जाती  -
 साजन की प्यारी सी !
नदिया !तुम नारी सी !!

अनगिन सभ्यताओं की पोषक   - ,
 अन्नपूर्णा   ,  तृषाहरणी तुम ,
 जाति- धर्म  से दूर बहुत
 संस्कृतियों की जननी तुम ;
 धो  नित जग की   कलुषता   -
बनी मीठी से खारी   सी  -
नदिया ! तुम नारी सी!!

तुम्ही गोमती  ,रावी,सतलुज -
कालिंदी,कावेरी ,कृष्णा ,
 तुम्ही  मोक्षदायिनी  हर- हर गंगे -
हरती हर तन -मन की तृष्णा -
जीवनरेख -  धरे रूप अनेक 
  मंगलकरणी- उपकारी सी - 
नदिया  !तुम नारी सी !!

हो अतिक्रमण  -टूटे संयम के बंध
धर  रौद्र रूप -   उमड़े   उद्वेग
कम्पित धरा -अम्बर --- करती आर्तनाद
    प्रलयकारी -प्रचंड  वेग -
करती विनाश - थमती  सी सांस -
तट   तोड़ दिखती सृष्टि संहारी सी-
नदिया  ! तुम नारी सी !!

जीवन का  अंतिम  छोर -
बढ़ती सिन्धु - प्रियतम की ओर,
निढाल प्राण - पाते त्राण -
सजल नयन ,मन भाव विभोर  ;
लिए मलिन धार -  ढूंढे   आधार  -
   पाती अनंत  विराम   थकी हारी सी -
नदिया  !तुम नारी सी !!!!!!!!!!!!!!

चित्र -- पांच लिंकों से साभार --

22 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !!!बहुत खूबसूरत शब्द और अप्रतीम भाव बहुत बढ़िया लिखा.... बधाई सुंदर सृजन

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    1. प्रिय नीतू जी -- सस्नेह आभार आपका |

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  2. खूबसूरत सृजन रेनू जी. बधाई

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    1. प्रिय सुधा जी सस्नेह आभार |

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  3. वाह!!बहुत सुंदरता के साथ संजोया है आपने अपनी कविता को ।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय शुभा जी प्रेरक शब्दों के लिए सस्नेह आभार |

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक १२ फरवरी २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय श्वेता जी -- आपके सहयोग के लिए आभारे हूँ |

      हटाएं
  5. बहुत सुंंदर रचना..
    नदी को प्रतीकात्मक रूप से नारी का वर्णन बहुत बढिया।
    आभार।

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    1. प्रिय पम्मी जी -- सस्नेह आभार आपका |

      हटाएं
  6. आदरणीय रेनू दी, नदी और नारी दोनों को एक दुसरे के प्रतीकों के रूप में उनकी विविध रंगी छटा को बहुत गंभीरता से संजोया है आपने। आप का लेखन बहुत गहरा है ।
    जीवन का अंतिम छोर -
    बढ़ती सिन्धु - प्रियतम की ओर,
    निढाल प्राण - पाते त्राण -
    सजल नयन ,मन भाव विभोर ;
    लिए मलिन धार - ढूंढे आधार -
    पाती अनंत विराम थकी हारी सी -
    नदिया !तुम नारी सी !!!!!!!!!!!!!!
    इन पंक्तियों में छिपे गूढ़ अर्थों तक पंहुचना आसान नहीं ।
    बहुत सुंदर रचना।
    सादर

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    1. प्रिय अपर्णा -- रचना पर आपकी सारगर्भित टिप्पणी से बहुत ख़ुशी हुई | आपके व्यापक चिंतन ने रचना के विषय को विस्तार और मेरा अपार उत्साहवर्धन | ह्रदय तल से धन्यवाद | आशा है ये स्नेह बना रहेगा |

      हटाएं
  7. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १२ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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    1. प्रिय ध्रुव -- सस्नेह आभार आपका | आपका सहयोग अतुलनीय है |

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  8. नदी और नारी.... बहुत ही सुन्दर समानता.....
    बेहतरीन ,लाजवाब.....
    वाह!!!
    जीवन का अंतिम छोर -
    बढ़ती सिन्धु - प्रियतम की ओर,
    निढाल प्राण - पाते त्राण -

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    उत्तर
    1. आदरणीय सुध जी -- आपके शब्द सदैव मनोबल बढ़ाते हैं | सादर आभार और नमन |

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  9. नारी और नदी में अद्भुत साम्यता स्थापित की है आपने रेनू बेहद खूबसूरत रचना. वाह 👏 👏 👏

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    1. प्रिय सुधा जी -- सस्नेह आभार |

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  10. उत्तर
    1. आदरणीय सर -- सादर आभार आपका |

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  11. बहुत सुन्दर रेनू जी. नदी और नारी दोनों ही हमको हरा-भरा रखती हैं पर हम हैं कि उनको सुखाने और प्रदूषित करने में ही लगे हुए हैं.

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    उत्तर
    1. आदरणीय गोपेश जी --सर्वप्रथम आपका मेरे ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत करती हूँ | मेरा सौभाग्य की आप मेरे ब्लॉग पर आये और रचना पढ़ी | आपने रचना के मर्म को पहचाना - ये मेरे लेखन की सार्थकता है | सादर आभार और नमन |

      हटाएं

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