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शनिवार, 16 सितंबर 2017

राह तुम्हारी तकते - तकते----------------कविता --


राह तुम्हारी  तकते  - तकते ----------  कविता --
राह तुम्हारी तकते - तकते-
बीते यूँ ही   अनगिन पल साथी,
आस हुई  मध्यम संग में -
और  नैना हुए सजल साथी !

दुनिया को बिसरा   दिल ने-
 बस एक तुम्हें  ही याद किया ,
हो चली  दूभर जब तन्हाई
तुमसे मन ने संवाद किया ;
 पल   को  भी मन की नम आँखों से-
ना हो पाये तुम ओझल साथी ! !


अप्राप्य से अनुराग ये मन का
क्यों हुआ ? कहाँ उत्तर इसका ?
इस राह की ना मंजिल कोई  -
फिर भी क्यों सुखद सफ़र इसका ?
प्रश्नों के भंवर में डूबे- उबरे
हुआ समय बड़ा बोझिल साथी !!



था धूल सा निरर्थक ये जीवन -
छू रूह से किया चन्दन तुमने ,
अंतस का धो सब  ख़ार दिया -
किया निष्कलुष और पावन तुमने ;
निर्मलता के तुम मूर्त रूप -
कोई तुम सा कहाँ सरल साथी !!!

राह तुम्हारी तकते - तकते
यूँ ही बीते अनगिन पल साथी
आस हुई  मध्यम संग में -
ये नैना हुए सजल साथी !!.,
चित्र--- गूगल से साभार !
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