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मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

जीवन की ढलती सांझ में

सांध्य दैनिक मुखरित मौन


जीवन की ढलती साँझ में
गीत मेरे सुनने आना
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

हो  जाए शायद आँखें नम

गुज़र यादों के  गलियारों से,
टीस  उभरेगी पतझड़ की
 कर सामना  बीती बहारों से;
दुनियादारी से ना मिलना
याद आये तब मिलने आना!
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

सुन लेना हर दर्द मन का

बन सखा  घनश्याम तुम
थके प्राणों को दे छाँव अपनी
देना तनिक आराम तुम;
 कलुषता   हर अंतस की
भाव मधुर भरने आना !
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

लिख जिन्हें पास अपने

 छिपा रख लेती हूँ मैं
एकांत में कभी  इन्हें
पढ़ रो कभी हँस देती हूँ मैं
ख़त    तुम्हारे  नाम के
चुपके से कभी पढने आना
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

 स्वरचित  

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

कल सपने में ------------- नवगीत ---



कल  सपने  में ---- नव  गीत

कल सपने में हम जैसे 
इक सागर -तट पर निकल पड़े  , 
 हाथ में लेकर हाथ चले
और निर्जन पथ पर निकल पड़े !!
 
जहाँ फैली थी मधुर  चाँदनी
शीतल जल के धारों पे , 
कुंदन जैसी रात थमी थी  
मौन  स्तब्ध आधारों  पे ;
फेर के आँखे जग -भर से 
दो प्रेमी नटखट निकल पड़े !!

फिर से हमने चुनी सीपियाँ
और नाव डुबोई कागज की ,
वहीँ रेत के महल बना बैठे -
भूली थी सब पीड़ा जग की ; 
हम मुस्काये तो मुस्काते
तारों के झुरमुट निकल पड़े ! 

ठहर गई थी  वहाँ हवाएँ
 सुनने बातें  कुछ छुटपन की ,
दो मन थे अभिभूत प्यार से 
 ना बात थी कोई अनबन की ;
कोई भूली कहानी याद आई
 कईं  बिसरे किस्से निकल पड़े  ! 

कभी राधा थे - कभी कान्हा थे 
मिट हम -तुम के सब भेद गए ;
 कुछ लगन मनों में थी ऐसी 
हर चिंता , कुंठा छेद गए , 
मन के रिश्ते सफल हुए   
और तन के रिश्ते शिथिल पड़े   ! 

कल सपने में हम जैसे 
इक सागर तट पर निकल पड़े  , 
 हाथ में लेकर हाथ चले 
और निर्जन पथ पर निकल पड़े !!
चित्र -- गूगल से साभार -----------------------------------------------------------------------------------


विशेष रचना

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