समर्थक

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

फिर चोट खाई दिल ने ---कविता --



फिर चोट  खाई  दिल ने-
और बरबस लिया पुकार  तुम्हें   ,
 हो  विकल   यादों  की गलियों में -
 मुड--मुड ढूंढा   हर  बार तुम्हें   !

 मुंह  मोड़ के   चल दिए साथी -
  तुम  नयी मंजिल -   नयी राहों पे  ; 
ये तरल नैन रह गए तकते - 
    रहे अनजान  जिगर की आहों से ;
  उस दिल को  बिसरा कर बैठ गए -
  था दिया जिसपे  सब अधिकार तुम्हें  !!

दो  नैनों  की क्या कहिये  -
बस इनमें  छवि तुम्हारी थी ,
मंदिर की   हर मूर्त  में भी    -
बस  सूरत  तेरी निहारी थी ;
मिल  जाते जो  किसी  रोज़ यूँ ही - 
थकते ना   अपलक  निहार तुम्हें  !!


न  था कोई     जो मन की सुनता -  
और  समझ लेता    जज़्बात मेरे  ,
  कौन    मेरा  अपना तुम  बिन-
 जो  अधरों   पे   सजाता हास   मेरे ;
खुद को खोकर   पाया तुमको  -
और जीता  मन को हार  तुम्हें  !!
  
अनगिन चेहरे थे  हर ओर   -
पर     तुम्हीं  थे  दिल के पास मेरे,
 तुम्हीं   हँसी में -  तुम्हीं   दुआ में 
थे  तुमसे  सब एहसास मेरे;
 तुम  लौट ना आये  तो   थक   के - 
गीतों में लिया उतार  तुम्हें  !!
हो   विकल     यादों  की गलियों में -
 मुड--मुड ढूंढा    हर  बार  तुम्हें   !!!!!!!










विशेष रचना

क्षमा करना हे श्रमवीर!

औरंगबाद के दिवंगत   श्रमवीरों के नाम --        ऐसे सोये- सोते ही रहे- -- , भला! ऐसी भी क्या आँख लगी ? पहचान सके ना मौत कीआहट-   अ...