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शनिवार, 18 मई 2019

ना शत्रु बन प्रहार करो --कविता [ एक वृक्ष की व्यथा -]




 ना शत्रु बन प्रहार करो -
 सुनो मित्र ! निवेदन मेरा भी -
मैं मिटा तुम भी ना रहोगे -
 जुडा तुमसे यूँ जीवन मेरा भी !

  करूं श्रृंगार जब सृष्टि का मैं  -

फूल -फूल कर इठलाती
 सुयोग्य  सुत  मैं धरा    का
मुझ बिन  माँ  की फटती छाती
तुम जैसे ही ममता वश  मैं -
नहीं  कम कोई समर्पण मेरा भी !!


सदियों से पोषक हूँ  सबका  -

 कृतघ्न  बन- ना दो धोखा
निष्प्राण नही   निःशब्द हूँ मैं
कहूं कैसे अपने  मन की  व्यथा   ?
  जड़  नही चेतन हूँ  मैं
दुखता है मन मेरा भी !!

खाए ना कभी अपने फल मैंने -

न फूलों से श्रंगार किया ,
जग हित हुआ जन्म मेरा   -
पल -पल इसपे उपकार किया;
खुद तपा- बाँट छाया सबको -
  जुडा सबसे अंतर्मन  मेरा भी !!

कसता नदियों के तटबंध मैं -

 थामता   मैं ही हिमालय  को ,
जुगत मेरी  कायम रहे   सृष्टि -
महकाता मैं ही देवालय  को ;
 तुम संग बचपन में लौटूं -
 संग  गोरी खिलता यौवन मेरा भी !

स्वरचित -- रेणु
चित्र -गूगल से साभार 

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