मेरी प्रिय मित्र मंडली

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

कहो शिव!

कहो शिव! क्यों लौट गए खाली

मुझ अकिंचन के द्वार से तुम ?

क्यों कर गए वंचित पल में,

करुणा के उपहार से तुम! 


दावानल-सी  धधक रही,

विचलित उर में वेदना!

निर्बाध हो कर रही भीतर

खण्डित धीरज और चेतना!

सर्वज्ञ हो कर  अनभिज्ञ   रहे,

मेरे भीतर के हाहाकार से तुम!


आए जब तुम आँगन मेरे, 

क्यों न तुम्हें पहचान सकी!

तुम्हीं थे चिर-प्रतीक्षित पाहुन

 थी मूढ़  बड़ी ,ना जान सकी!

क्यों ठगा मुझे यूं छल-बल से

भर गए क्षणिक विकार से तुम!


एक भूल की न मिली क्षमा,

कर-कर हारी हरेक जतन!

कैसे इस ग्लानि से  उबरूं ? 

बह चली अश्रु की गंग-जमन!

ये क्लांत प्राण हों जाएं शांत,

जो कर दो मुक्त उर-भार से तुम!







गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

कहाँ आसान था

 

था वो मासूम-सा 
दिल का  फ़साना साहेब !
बहुत मुश्किल था पर
प्यार निभाना साहेब !

दुआ थी  ना कोई चाह  अपनी 
यूँ ही  मिल गयी उनसे  निगाह अपनी 
 बड़ा  प्यारा था उनका
सरेराह मिल जाना साहेब !

रिश्ता ना जाने कब का
लगता  करीब था
 उनसे  यूँ मिलना 
बस अपना नसीब था 
अपनों से प्यारा  हो गया था
 वो एक बेगाना साहेब ! 

वो सबके खास थे
पर अपने तो दिल के पास थे
हम इतराए हमें मिला
दिल उनका नजराना साहेब! 

हमसे निकलने लगे जब बच कर
खूब मिले ग़ैरों से हँस कर!
फिर भी रहा राह तकता,
दिल था अजब दीवाना साहेब!

बातें थी कई झूठी,
अफ़साने बहुत थे!
हुनर उनके पास
बहलाने के बहुत थे!
ना दिल सह पाया धीरे- धीरे
उनका बदल जाना साहेब! 

बहाए आँसू  उनकी खातिर 
और    उड़ाई  नींदें अपनी 
जो  लुटाया उन पर हमने 
 था अनमोल खजाना साहेब 

बहुत संभाला हमने खुद को
दर्द को पीया भीतर -भीतर
पर ना रुक पाया जब -तब
अश्कों का छलक जाना साहेब!

अलविदा  कहना  कहाँ आसान था ?
 टूटा जो रिश्ता वो मेरा गुमान था !
 पर,बेहतर था  तिल-तिल मरने से ,
एक दफ़ा मर जाना  साहेब !


शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

सरस्वती वंदना

🌷🌷सभी साहित्य प्रेमियों को बसन्त पंचमी की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं🙏🙏🌷🌷🙏🙏


मां सरस्वती, मैं सुता तुम्हारी ,

हूँ  हीन छंद , रस, अलंकार से माँ !

फिर भी  भर दी  गीतों से झोली 

ना भेजा खाली निज द्वार से माँ !

 

हाथ उठा ना माँगा कुछ तुमसे 

बैठ कभी ना ध्याया  माँ ,

पर वंचित ना रखा तुमने   

करुणा के  उपहार  से  माँ !

 

 रहे शुद्धता मन ,वाणी ,कर्म में  

रखना निष्पक्ष  कवि -धर्म मेरा .

भावों में रहे सदा  शुचिता 

दूर रहूँ अहंकार से माँ !



संवाहक बनूँ सद्भावों  की 

रचूँ  प्रेम के भाव अमिट, 

भर बुद्धि -ज्ञान  के दर्प-गर्व में   

बचूँ व्यर्थ की रार से माँ !



यही आंकाक्षा  मन में मेरे 

रहूँ बन प्रिय संतान तुम्हारी !

 ग्लानि कोई ना शेष हो भीतर 

 जब  जाऊँ संसार से माँ !

🙏🙏🙏

विशेष रचना

सब गीत तुम्हारे हैं

  तुम्हारी यादों की  मृदुल  छाँव में  बैठ सँवारे  हैं  मेरे पास कहाँ कुछ था  सब गीत तुम्हारे हैं | मनअम्बर पर टंका हुआ है, ढाई  आखर  प्रेम  ...