मेरी प्रिय मित्र मंडली

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

समय साक्षी रहना तुम --- कविता --

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 अपने अनंत प्रवाह में बहना तुम ,
 पर समय साक्षी रहना   तुम !!

उस पल के , जो  सत्य सा अटल ,
 ठहर गया है भीतर   गहरे ;
रूठे सपनों से मिलवा जिसने  
भरे पलकों में रंग सुनहरे ;
यदा -कदा  बैठ साथ मेरे  
उन यादों के हार पिरोना तुम 

जिसमें  जाने  कहाँ  से आया  
जन्मों की ले पहचान कोई ,
 विस्मय सा भर जीवन में  
कर गया हैरान कोई !  
मौन आराधन सा वो  मेरा  
उसका   जन्मों  का संग बोना तुम

  अतल गहराइयों में  आत्मा की
जो  भरेगा उजास  नित नित  ,
गुजर जायेंगे   दिन महीने 
 आँखों से ना होगा ओझल  किंचित ;
हो ना जाऊं तनिक मैं विचलित 
प्राणों में  अनत धीरज  भर देना तुम !!

अपने अनंत प्रवाह में बहना तुम ,
 पर समय साक्षी रहना   तुम !!!!!!!!!!!!!!

 चित्र--- गूगल से साभार -- 

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

तुम्हारा मौन --- कविता --

तुम्हारा   मौन
असह्य हो चुका है  
तुम्हारा ये विचित्र मौन  ,
विरक्त हो जाना तुम्हारा 
रंग , गंध और स्पर्श के प्रति ;
अनासक्त हो जाना - अप्रतिम सौ सौंदर्य के प्रति    !
भावहीन हो बैठ उपेक्षा करना  
संगीत की मधुर स्वर लहरियों की  ,
स्वयं से रूठना और कैद हो जाना  ,
मन की ऊँची दीवारों के बीच 
नहीं है जीवन ----- !

उठो ! खोल दो मन के द्वार !
सुनो गौरैया की चहचहाहट और -
भँवरे की गुनगुनाहट में उल्लास का शंखनाद ! 
देखो बसंत आ गया है  -- - -- 
निहारो रंगों को  , महसूस करो गंध को  ,
जो उन्मुक्त पवन फैला रही है हर दिशा में ----
हर कोने में !
स्पर्श करो  सौंदर्य   को -
जिसमे निहित है जीवन की सार्थकता !
उठो !कि स्पंदन से भरी 
एक मानव देह हो तुम हो  ,
कोई निष्प्राण प्रतिमा नहीं !
तुम्हारे लिए ही बने है ;
रंग , गंध ,  सौंदर्य और संगीत
क्योंकि  तुम्हीं  निमित्त हो  
 सृष्टि में नवजीवन के!! 

संदर्भ---- एक अवसाद ग्रस्त युवा के लिए --- 

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

फिर चोट खाई दिल ने --- विरह गीत

  विकल , बरबस , मंजिल ,  छवि , 

फिर चोट  खाई  दिल ने 
और बरबस लिया पुकार  तुम्हें   ,
 हो  विकल   यादों  की गलियों में   
 मुड--मुड ढूंढा   हर  बार तुम्हें   !

 मुख मोड़ के चल दिए  तुम तो 
 नयी मंजिल   नयी राहों पे  ; 
  ये तरल नैन रह गए तकते 
  तुम रहे अनजान  जिगर की आहों से ;
 वो दिल को  बिसरा कर बैठ गए  
 दिया जिसपे  सब अधिकार तुम्हें  !
हो  विकल   यादों  की गलियों में -
 मुड--मुड ढूंढा   हर  बार तुम्हें   !

दो  नैनों  की क्या कहिये  
बस इनमें  छवि तुम्हारी थी ,
मंदिर की  मूर्त  में भी हमने   
बस  सूरत  तेरी निहारी थी ;
मिल  जाते जो  किसी  रोज़ यूँ ही 
थकते ना   अपलक  निहार तुम्हें  !
हो  विकल   यादों  की गलियों में 
 मुड--मुड ढूंढा   हर  बार तुम्हें   !

न  था कोई     जो मन की सुनता 
समझ लेता    जज़्बात मेरे  ,
कौन    मेरा  अपना तुम  बिन
जो  अधरों   पे   सजाता हास   मेरे ;
खुद को खोकर   पाया तुमको  
 जीता  मन को हार  तुम्हें  !
हो  विकल   यादों  की गलियों में 
 मुड--मुड ढूंढा   हर  बार तुम्हें   !

 हर ओर थे  अनगिन चेहरे , 
पर    तुम्हीं  थे  दिल के पास मेरे,
 तुम्हीं हँसी में और   दुआ में 
थे  तुमसे  सब एहसास मेरे;
 तुम  लौट ना आये  तो   थक   के 
गीतों में लिया उतार  तुम्हें  !!
हो   विकल     यादों  की गलियों में -
 मुड--मुड ढूंढा    हर  बार  तुम्हें   !! 










विशेष रचना

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चाँद नगर सा गाँव तुम्हारा   भला ! कैसे पहुँच पाऊँगी मैं ?  पर ''इक रोज मिलूंगी तुमसे  '' कह जी को बहलाऊंगी मैं ! मौन...