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बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

न आओ अब साथ मेरे - कविता

 


न आओ  अब साथ मेरे  

अकेले ही   चलने दो मुझे ,

 खा -खा ठोकर जीवन -पथ पर 
खुद   संभलने दो मुझे !

बहुत दूर तक  ना तुम 
आ सकोगे  साथ  मेरे 
शून्य मैं ,शिखर हो तुम
कब आ पाओगे हाथ मेरे ;
मरीचिका  में व्यर्थ की 
 ना खुद को  छलने दो मुझे 
  न  आओ  अब साथ मेरे   
अकेले ही   चलने दो मुझे !

 बरसे   थे  बादल से  तुम , 

थी   तपती  धरा - सी मैं ;
धधकने लगी और ज्यादा 
 हुई  जो  शीतल  जरा -सी मैं 
नियति से मिली   अगन में 

यूँ ही  जलने दो मुझे  
न आओ  अब साथ मेरे   
अकेले ही   चलने दो मुझे ,

 पढ़ना  खुद को  शब्दों में मेरे  
जो  तुमसे   तुम  तक जाते हैं, 
सदा  कहाँ संग रहता कोई
क्षणभंगुर सब नाते हैं, 
दूर छूटी  तनहाइयों से
फिर से  जुड़ने दो मुझे !
 न  आओ  अब साथ मेरे   
अकेले ही   चलने दो मुझे !

काकी रहने की जिद नही
ये तो है नियति मेरी 
खुद से मिल खुद में रहूंगी 
 यही  अंतिम परिणिति मेरी 
 भ्रम के इस  गहरे भंवर से  
 अब निकलने दो मुझे !
गूगल से साभार -

66 टिप्‍पणियां:

  1. ओह्ह दी.बेहद हृदयस्पर्शी, भावपूर्ण सृजन।
    बेहद लाजवाब।
    स्मृतियों के सुनहरे धागों का एक छोर पकड़े हुए
    अकेले चलना नियति नहीं स्वयं की पहचान की यात्रा की प्रगति है।
    ्ब्हुत अंतराल पर आपकी रचना पढ़ी दी।
    सच में निःशबद हूँ इतने जीवंत भावों के स्पर्श से।

    प्रणाम दी।
    सादर।

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    1. तुम्हारी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार प्रिय श्वेता। पिछले दिनों की व्यस्ताएँ कुछ लिखने नहीं दे रही थी ।आशा है कुछ बाद सब नियमित होगा ❤❤🙏🙏🌹

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  2. बरसे थे बादल से तुम ,
    थी तपती धरा - सी मैं ;
    धधकने लगी और ज्यादा
    हुई जो शीतल जरा -सी मैं
    नियति से मिली अगन में
    यूँ ही जलने दो मुझे
    न आओ अब साथ मेरे
    अकेले ही चलने दो मुझे ..सुन्दर अभिव्यक्ति,
    मन की वीथियों को धीरे-धीरे खोलती पंक्तियाँ..
    कोई शिकवा नहीं.बस शिकवे के अहसासों में भिगोती पंक्तियाँ..

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    1. आपकी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार प्रिय जिज्ञासा जी। आपके प्रेरक शब्द अनमोल है ❤❤🙏🌹🌹

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  3. हृदयस्पर्शी कविता है यह रेणु जी ।

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  4. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 18 फरवरी 2021 को साझा की गई है.........  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    उत्तर
    1. आपका और मुखरित मौन का हार्दिक आभार
      प्रिय दिव्या जी ❤❤🙏🌹🌹

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  5. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 19-02-2021) को
    "कुनकुनी सी धूप ने भी बात अब मन की कही है।" (चर्चा अंक- 3982)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

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    उत्तर
    1. चर्चा मंच और आपका सस्नेह आभार प्रिय मीना जी ❤❤🙏🌹🌹

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  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १९ जनवरी २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. पांच लिंक मंच की आभारी हूँ प्रिय श्वेता।

      हटाएं
  7. बहुत बहुत सुन्दर मधुर मन को छूने वाली रचना |

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    उत्तर
    1. सादर आभार आलोक जी। ब्लॉग पर आपका निरंतर आना मेरा सौभाग्य है🙏🙏🙏🙏

      हटाएं
  8. काफी दिनों बाद तुम्हे फिर से सक्रिय देख कितनी ख़ुशी हो रही है सखी,ये मैं शब्दों में नहीं बता सकती
    तुम लौट आई इस ब्लॉग की महफ़िल में इसके लिए दिल से शुक्रिया तुम्हारा
    तुम्हारी कविता की तारीफ क्या करना, वो तो हमेशा से प्रशंसा से परे होती है
    हाँ,चंद पंक्तियाँ

    "पढ़ना खुद को शब्दों में मेरे
    जो तुमसे तुम तक जाते हैं,
    सदा कहाँ संग रहता कोई
    क्षणभंगुर सब नाते हैं, "

    जो जीवन सत्य है, इसे हमारा मन जितनी जल्दी स्वीकार ले उतना अच्छा

    "मरीचिका में व्यर्थ की
    ना खुद को छलने दो मुझे "
    मरीचका में भटकना सचमुच व्यर्थ है,ढेर सारा स्नेह सखी

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    उत्तर
    1. तुम्हारी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार सखी। तुम्हारा स्नेह अनमोल है 🌹🌹🙏❤❤

      हटाएं
  9. एकाकी रहने की जिद नही
    ये तो है नियति मेरी
    खुद से मिल खुद में रहूंगी
    यही अंतिम परिणिति मेरी
    भ्रम के इस गहरे भंवर से
    अब निकलने दो मुझे !
    बहुत सुंदर रचना, रेणु दी।

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    उत्तर
    1. आपकी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार ज्योति बहन ❤❤🙏🌹🌹

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  10. सांसारिक जटिलताओं से निकलकर खुद को पा लेने की..आत्मनिर्भरता को महसूस करने को प्रेरित करती आपकी रचना हृदय सुलभ है..
    सादर प्रणाम आपको..

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    उत्तर
    1. आपकी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार प्रिय अर्पिता जी।

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  11. उत्तर
    1. सस्नेह आभार और अभिनंदन सुमन जी ❤❤🙏🌹🌹

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  12. उत्तर
    1. आपकी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार आदरणीय सर🙏🙏

      हटाएं
  13. वाह! रेणु बहन बहुत दिनों बाद आपकी रचना देखी, यूं तो पहले भी लाजवाब थे आप पर आज कुछ और चमक बढ़ गई है सितारों में,इतनी सुंदर प्रस्तुति है आपकी कि उस पर कुछ लिखना ...बस निशब्द।
    आत्मा के स्वरूप को समझने जब चल पड़ता है सच्चे मन से कोई तो ऐसे उदगार फूटते हैं जो खुद स्वर्णिम अक्षर में लिख दिए जाते हैं,यूं धीरे से दूर होना संसार से।
    अद्भुत भाव सृजन।

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    उत्तर
    1. प्रिय कुसुम बहन, आपकी स्नेह भरी प्रतिक्रिया से रचना पर संतोष हुआ। आपके प्रेरक शब्दों में रचना के मर्म तक पहुँचने की क्षमता है। जीवन के अनुभव बहुत कुछ सिखा जाते हैं।हार्दिक आभार आपके मनोबल ऊँचा करते शब्दों के लिए🌹🌹🙏 ❤❤

      हटाएं
  14. भावपूर्ण व हृदयस्पर्शी रचना शुभकामनाओं सह।

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    उत्तर
    1. शांतनु जी ब्लॉग पर आपकी उपस्थिति मेरा सौभाग्य है। सादर आभार आपका 🙏🙏

      हटाएं
  15. एकाकी रहने की जिद नही
    ये तो है नियति मेरी
    खुद से मिल खुद में रहूंगी
    यही अंतिम परिणिति मेरी
    भ्रम के इस गहरे भंवर से
    अब निकलने दो मुझे !

    सुंदर आशावादी एवं स्वाभिमानी रचना...

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    उत्तर
    1. आपकी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार प्रिय शरद जी। मेरे ब्लॉग पर स्वागत है आपका।

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  16. उत्तर
    1. आपकी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार अनुराधा जी ❤❤🙏🌹🌹

      हटाएं
  17. बहुत ही सुंदर सृजन मन को छूते भाव।
    सादर

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  18. कहीं न कहीं अकेले ही सफर तय करना होता है इंसान को
    ठोकरे कुछ इंसानों को कमजोर भले ही करती हों लेकिन बहुत लोग उनसे मजबूत होना सीख ही जाते हैं


    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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    1. आपकी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार कविता जी 🌹🌹🙏❤❤

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  19. उत्तर
    1. दीपक जी, हार्दिक अभिनंदन और आभार आपका 🙏🙏💐💐

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  20. प्रिय रेणु, आपकी इस कविता को आपके ब्लॉग पर लौट लौट कर पढ़ा। इस रचना की गहराई को नापना मेरे शब्दों के बस का नहीं है। बस, निस्तब्ध हूँ। अपने भावों को शब्दों की सरिता में इसी तरह बहने दीजिए। बहुत सारे स्नेह के साथ।

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    उत्तर
    1. प्रिय मीना, ये आप सखियों का स्नेह है बस। सस्नेह आभार ❤❤🙏🌹🌹

      हटाएं
  21. एकाकी रहने की जिद नही
    ये तो है नियति मेरी
    खुद से मिल खुद में रहूंगी
    यही अंतिम परिणिति मेरी
    भ्रम के इस गहरे भंवर से
    अब निकलने दो मुझे !,,,,,,,,बहुत ही गहरे भाव लिए आप की ये रचना

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय मधुलिका जी, ब्लॉग पर आपकी उपस्थिति और स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ❤❤🙏🌹🌹

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  22. खुद से ठोकर खाकर सीखना ही अनमोल पाठ है- उम्दा रचना - बधाई

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    उत्तर
    1. सुस्वागतम और हार्दिक आभार समीर जी🙏🙏

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  23. एकाकी रहने की जिद नही
    ये तो है नियति मेरी
    खुद से मिल खुद में रहूंगी
    यही अंतिम परिणिति मेरी
    भ्रम के इस गहरे भंवर से
    अब निकलने दो मुझे !-------------बधाई

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  24. बहुत ही खूबसूरत और हिम्मत देने वाली पंक्ति!

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  25. आदरणीया मैम ,
    इतने दिनों बाद आपकी रचना पढ़ी, बता नहीं सकती कितनी ख़ुशी हो रही है मुझे।
    अत्यंत भाव-पूर्ण करुण अनुभूतियों से भरी हुई रचना। माँ और नानी को भी पढ़ाया।
    आपसे हम तीनों का अनुरोध है कि अपनी कविताओं की पुस्तक बनवा लें।
    आपकी यह रचनाएँ मात्र कविताएं नहीं पर सुंदर और शाश्वत अनुभूतियाँ हैं।
    हार्दिक आभार इस सुंदर रचना के लिए वआपको प्रणाम।

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    उत्तर
    1. प्रिय अनन्ता इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत प्यार और शुभकामनाएं। और पुस्तक के विषय में जरूर सोचूँगी इस साल।

      हटाएं
  26. हार्दिक प्रसन्नता हुई लेखनी की चमक देख कर । चरैवेति चरैवेति ... पुनः हार्दिक आभार एवं शुभकामनाएँ ।

    जवाब देंहटाएं
  27. एकाकी रहने की जिद नही
    ये तो है नियति मेरी
    खुद से मिल खुद में रहूंगी
    यही अंतिम परिणिति मेरी
    भ्रम के इस गहरे भंवर से
    अब निकलने दो मुझे...दीदी आप.इतना प्यारा कैसे लिख लेती हैं

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    उत्तर
    1. प्रिय शकू , ये सब आप सब सखियों का स्नेह है | इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार |

      हटाएं
  28. भ्रम के इस गहरे भंवर से
    अब निकलने दो मुझे !
    .......... सुंदर रचना,तमाम भावनाओं को समेटे हुए रेणु दी।

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  29. बहुत दूर तक ना तुम
    आ सकोगे साथ मेरे
    शून्य मैं ,शिखर हो तुम
    कब आ पाओगे हाथ मेरे ;
    मरीचिका में व्यर्थ की
    ना खुद को छलने दो मुझे
    न आओ अब साथ मेरे
    अकेले ही चलने दो मुझे !

    एक बार जब साथ छूट जाये भावनाओं के तार टूट जायें तो तो शून्य से शिखर तक दूर हो जाता है मन...फिर बार बार साथ का भ्रम और हाथ का यूँ छूटना सहने की शक्ति नहीं रहती...फिर मन यही कहता है
    अकेले ही चलने दो मुझे
    खा -खा ठोकर जीवन -पथ पर
    खुद संभलने दो मुझे !
    चरम और मर्म को छूती लाजवाब भावाभिव्यक्ति।

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    उत्तर
    1. रचना का भावार्थ स्पष्ट करती स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार सुधा जी। आपका ब्लॉग पर सदैव अभिनंदन है।

      हटाएं

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