मेरी प्रिय मित्र मंडली

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

जीवन की ढलती सांझ में

सांध्य दैनिक मुखरित मौन


जीवन की ढलती साँझ में
गीत मेरे सुनने आना
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

हो  जाए शायद आँखें नम

गुज़र यादों के  गलियारों से,
टीस  उभरेगी पतझड़ की
 कर सामना  बीती बहारों से;
दुनियादारी से ना मिलना
याद आये तब मिलने आना!
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

सुन लेना हर दर्द मन का

बन सखा  घनश्याम तुम
थके प्राणों को दे छाँव अपनी
देना तनिक आराम तुम;
 कलुषता   हर अंतस की
भाव मधुर भरने आना !
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

लिख जिन्हें पास अपने

 छिपा रख लेती हूँ मैं
एकांत में कभी  इन्हें
पढ़ रो कभी हँस देती हूँ मैं
ख़त    तुम्हारे  नाम के
चुपके से कभी पढने आना
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

 स्वरचित  

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

आज कहीं मत जाना -गीत

दिन  आज का बहुत सुहाना साथी  !
आज कहीं मत जाना  साथी !!

  मुदित मन के मनुहार खुले हैं ,
 नवसौरभ के बाजार खुले हैं ;
 डाल - डाल पर नर्तन करती  
कलियों के बंद द्वार खुले हैं ;
 सजा   हर वीराना साथी !
आज कहीं मत जाना साथी!!

ये तप्त दुपहरी  जीवन की 
 थी मंद पड़ी प्राणों की उष्मा ,
 जाग पड़ी तुम्हारी  आहट से
सोयी  अंतस की  चिरतृष्णा,
हुआ विरह का राग पुराना साथी  !
आज कहीं मत जाना साथी !!

सुन स्वर तुम्हारा सुपरिचित  
 ले हिलोरें पुलकित अंतर्मन , 
जाने  जोड़ा किसने  और कब?
प्रगाढ़ हुआ  ये मन का बंधन ; 
मिला नेह  नज़राना  साथी  !
आज   कहीं मत जाना साथी !!

विशेष रचना

चाँद नगर सा गाँव तुम्हारा ----- कविता ---

चाँद नगर सा गाँव तुम्हारा   भला ! कैसे पहुँच पाऊँगी मैं ?  पर ''इक रोज मिलूंगी तुमसे  '' कह जी को बहलाऊंगी मैं ! मौन...