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शनिवार, 9 मार्च 2019

उस फागुन की होली में -- कविता


जीना चाहूं वो लम्हे बार बार 
 जब तुमसे जुड़े थे मन के तार
जाने  उसमें  क्या जादू  था   ?
 ना रहा जो खुद पे  काबू  था
 कभी गीत बन कर हुआ मुखर
  हंसी में घुल  कभी गया बिखर
 प्राणों में मकरंद घोल गया
 बिन कहे ही सब कुछ बोल गया 
   इस धूल  को बना गया    चन्दन   
  सुवासित , निर्मल और पावन 
 कभी चाँद हुआ कभी फूल हुआ
  या चुभ  हिया की शूल हुआ
लाल था कभी - कभी नीला
 कभी सिंदूरी - कभी पीला
 कोरे मन  रंग निकल गया
कभी अश्रु बनकर ढुलक गया   
ना खबर हुई  क्या ले गया -
 क्या खाली झोली में भर गया? 
वो चुटकी भर..अबीर तुम्हारा
 उस फागुन की होली में !!!!!!!!!
स्वरचित -- रेणु-
चित्र -- गूगल से साभार 

  

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

हार्दिक अभिनन्दन !

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वीर अभिनन्दन !    हार्दिक अभिनन्दन  ! 
 तुम्हारे   शौर्य  को  कोटि  वन्दन !

 पुलकित , गर्वित  माँ  भारती -
 तुम्हारे   निर्भीक   पराक्रम से ,
 मृत्यु -  भय से हुए ना विचलित -
  ना चूके संयम से ;
सिंह पुत्र  तुम जननी के  
 सहमा शत्रु नराधम !!

 शत्रु भूमि पर   जा देखो -
  मातृभूमि का मान बढ़ाया  ,
अर्जित की अखंड कीर्ति   -
 ना पीछे कदम हटाया ;
मान मर्दन किया   पापी का 
 रहा  अडिग हिमालय सा तन !!

 कोटि नैन बिछे पथ में-  
स्वागत को आज  तुम्हारे  .
 एक कुटुंब सा जुटा राष्ट्र -
 अपलक तुम्हे   निहारे ;
 तुम्हारा यश रहे  अमर  जग में-
  पुकार रहा  यही जन - जन !!!!!!!
  
स्वरचित -- रेणु
चित्र --गूगल से साभार --

विशेष रचना

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