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शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

लौटा माटी का लाल !

Image result for तिरंगे में लिपटे शहीद चित्र

गूंजी     मातमी धुन 
  लुटा यौवन 
  तन  सजा तिरंगा 
  लौटा माटी का लाल 
 माटी में मिल जाने को !
तन सजा तिरंगा !

 इतराया था एक दिन 
  तन   पहन  के खाकी
 चला वतन की राह 
 ना कोई चाह थी बाकी 
  चुकाने  दूध का कर्ज़  
 पिताका मान बढाने को !
 लौटा माटी का लाल 
 माटी में मिल जाने को !!
तन सजा तिरंगा !

रचा चक्रव्यूह  
शिखंडी शत्रु ने 
 छुपके घात लगाई 
कुटिल  चली चाल 
 मांद जा जान छिपाई 
पल में देता चीर
ना  आया  आँख मिलाने को !
 लौटा माटी का लाल 
 माटी में मिल जाने को !!
तन सजा तिरंगा !

उमड़ा जन सैलाब -
 विदा  की आई बेला ,
हिया विदीर्ण महतारी आज 
आंगन   ये कैसा मेला ?
 सुत सोया अखियाँ मूंद
 जगा ना  धीर  बंधाने  को;
लौटा माटी का लाल -
 माटी में मिल जाने को ;
 तन सजा  तिरंगा !!!!!!!


पुलवामा  के वीर शहीदों को  अश्रुपूरित    नमन !!!!!!!!!
स्वरचित -- रेणु-- 
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शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

चाँद हंसिया रे !

 

चाँद हंसिया   रे  ! सुन  जरा !
ये कैसी  लगन जगाई तूने ?
 कब के जिसे भूले बैठे थे -
फिर उसकी याद दिलाई तूने !!

गगन में अकेला बेबस  सा -
 तारों से  बतियाता  तू 
 नीरवता के  सागर में  -
  पल - पल गोते खाता  तू  ;
कौन खोट  करनी में आया ? \
ये बात ना कभी  बताई तूने !!

किस जन्म किया  ये महापाप ?
शीतल   होकर  भी सहा   चिर संताप ;
 दूर सभी अपनों से रह  - 
 ढोया सदियों ये कौन शाप ?
नित -नित घटता -बढ़ता रहता
नियति कैसी लिखवाई तूने  ? 

तेरी रजत चांदनी मध्यम सी -
 जगाती मन मेंअरमान बड़े ,
  यूँ ही  ये सजा बैठा सपने जो -
  हैं भ्रम से -करते हैरान बड़े
 मुझ सा  -    तू भी   है   तन्हा-
 ना जानी पर  पीर पराई  तूने !!!!!!!!!!


स्वरचित -- रेणु
चित्र -- गूगल से साभार 
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धन्यवाद शब्द नगरी 

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (चाँद हंसिया रे ! ) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 

विशेष रचना

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