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शनिवार, 20 जनवरी 2018

बसंत बहार से तुम --- कविता

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 था पतझड़ सा नीरस  जीवन 
आये बसंत  बहार से तुम ,
सावन भले  भर -भर  बरसे 
 सौंधी   पहली बौछार से तुम  |

 मन  ये कितना अकेला था 
एकाकीपन में खोया था  , 
किसी   ख़ुशी  का इन्तजार  कहाँ 
बुझा - बुझा  हर रोयाँ  था ;
बरसे सहसा तपते मन पे  
शीतल  मस्त फुहार से तुम ! 

 मधु सपना बन  ठहर  गए 
 थकी  मांदी  सी आँखों में ,
हो पुलकित  मन ने उड़ान भरी 
थकन बसी थी  पांखोंमें ;
उल्लास का ले आये तोहफा -
  मीठी मन की   मनुहार से तुम !! 

चिर विचलित प्राणों में साथ
 आन  बसे संयम से तुम ,
कोई दुआ    हुई  सफल मेरी 
 बने  घाव पे  मरहम से तुम ;
मन के मौसम   पलट गये 
छाये  निस्सीम  विस्तार से तुम !!

विशेष रचना

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