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बुधवार, 9 मार्च 2022

बस समय ने सुनी -- कविता



ना  जान  सका  बात  कोई
समर्पण   और  अभिसार  की
सुनी समय  ने  बस   कहानी
तेरे  मेरे  प्यार  की  !

 पेड  ने आँगन के  
सुनना चाहा  झुककर  इसे,
देखना  चाहा  कभी
चिड़िया  ने  रुककर   इसे
निहारने लगी , चली ना
एक मधु बयार  की ,
सुनी समय  ने  बस   कहानी
तेरे  मेरे  प्यार  की  !

मिल  गए  भीतर  ही
जब  देखने निकले  तुम्हें ,
खो  बैठे  खुद  को  ही
जब    ढूँढने  निकले  तुम्हें ,
पड़ गयी  हर  जीत  फीकी 
थी बात ऐसी 
हार की
सुनी समय  ने  बस   कहानी
तेरे  मेरे  प्यार  की  !

स्वाति बूँद से आ  गिरे
हृदय  के  खाली  सीप  में!
 चंदन वन  महका  गए,
जीवन के  बीहड़   द्वीप  में!
इस जन्म  ना  थी चाह कोई ;
है प्रार्थना  युग- पार  की !
सुनी समय  ने  बस   कहानी
तेरे  मेरे  प्यार  की


देखते  ही बीत  चले
दिन,  महीने  , साल  यूँ  ही  !
ना   फीके पडे रंग चाहत  के
रहा  तेरा  ख्याल  यूँ  ही  !
प्रगाढ़  थी  लगन  मन की
कहाँ  बात  थी अधिकार   की  ?
सुनी समय  ने  बस   कहानी
तेरे  मेरे  प्यार  की  !!

विशेष रचना

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