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शनिवार, 21 अप्रैल 2018

बुद्ध की यशोधरा -- कविता |

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बुद्ध की प्रथम और अंतिम नारी-
 उसके मन में  जिसने झाँका,
जैसे जागी  थी  तू कपलायिनी -- 
ऐसे  कोई नहीं जागा !!

पति- प्रिया से बनी  पति -त्राज्या-- 
 सहा अकल्पनीय दुःख पगली,
नभ से आ  गिरी  धरा पे-
 नियति तेरी ऐसी बदली ;
 वैभव  से बुद्ध ने किया पलायन
तुमने वैभव में सुख त्यागा !

 बुद्ध को सम्पूर्ण करने वाली -
  एक नारी बस तुम थी ,
 थे  श्रेष्ठ बुद्ध भले जग में -
 बुद्ध पर  भारी बस  तुम  थी ;
सिद्धार्थ  बन गये बुद्ध भले  -
 ना  तोडा  तुमने  प्रीत का धागा !!

इतिहास झुका तेरे आगे --
 देख उजला   मन का दर्पण
 
 एक मात्र पूंजी पुत्र जब
 किया  बोधिसत्व को अर्पण ;
बन आत्म गर्वा माँ  तुमने -
अधिकार  पुत्र का मांगा !!


बुद्ध का अंतस भी भीगा  होगा -- 
देख तुम्हारा  सूना तन - मन
चिर विरहणी, अनंत मन -जोगन -- 
विरह अग्न में तप हुई कुंदन ! !
करुणा  में  बुद्ध की    सराबोर हो 
तू बनी अनंत महाभागा !!!!!!!!!!!!!!!

स्वरचित --रेणु-- चित्र --- गूगल से साभार |
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