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शनिवार, 22 सितंबर 2018

तृष्णा मन की - कविता

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 मिले  जब  तुम अनायास -
 मन मुग्ध    हुआ  तुम्हें  पाकर  ;
 जाने थी कौन तृष्णा  मन की - 
जो छलक गयी अश्रु बनकर   ? 

 हरेक     से मुंह मोड़ चला -
  मन तुम्हारी  ही   ओर चला
 अनगिन    छवियों में उलझा -
  तकता   हो भावविभोर चला-
 जगी भीतर  अभिलाष  नई-
 चली ले उमंगों की नयी डगर  ! !

प्राण स्पंदन हुए कम्पित,
जब सुने स्वर तुम्हारे सुपरिचित ;
जाने ये भ्रम था या तुम  वो  ही थे-
 सदियों से  थे  जिसके   प्रतीक्षित;
 कर  गये शीतल- दिग्दिगंत   गूंजे- 
 तुम्हारे ही    वंशी- स्वर मधुर !!



 डोरहीन   ये  बंधन  कैसा ?
यूँ अनुबंधहीन     विश्वास  कहाँ ?
  पास नही    पर  व्याप्त मुझमें
 ऐसा जीवन  -  उल्लास  कहाँ ?
 कोई गीत  कहाँ मैं  रच पाती ? 
तुम्हारी रचना ये शब्द प्रखर !
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धन्यवाद शब्दनगरी 

रेणु जी बधाई हो!,

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धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

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