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मंगलवार, 7 नवंबर 2017

आँगन में खेल रहे बच्चे ,-----बाल कविता ---







आँगन  में खेल रहे  बच्चे  ,
भोले भाले मन के सच्चे !

एक दूजे के कानों में -
गुप चुप  से बतियाते हैं   ,
  तनिक जो हो  अनबन आपस में -
खुद मनके गले मिल  जाते है  ;
भले  -बुरे  तर्क ना जाने
बस हैं  थोड़े अक्ल के कच्चे !
आँगन  में खेल रहे बच्चे  !!

निश्छल  राहों के ये राही -
भोली  मुस्कान से जिया   चुरालें ,
नजर भर देख ले जो इनको
बस हंसके गले लगा ले ;
 अभिनय नहीं  इनकी फितरत
जो मन में वो ही मुखड़े पे दिखे !
आंगन  में  खेल रहे  बच्चे !!

इन नन्हे  फूलों  से  आज -
ये आँगन  का उपवन  महक रहा है ,
 सूना  और वीरान था पहले -
अब कोना - कोना  चहक रहा है ,
कौतुहल से भरे ये चुन- मुन--
मन के कोमल-  शक्ल के  अच्छे !
आँगन में खेल  रहे  बच्चे !!
भोले भाले मन के सच्चे !!!!!!!!!!!!




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