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शनिवार, 12 मई 2018

फिजूल चाहत में-- कविता -

ख़त नही दिल भेजा था --
 क्या तुमने अंजाम किया ?
बेहतर बात ये तुम तक रहती -
तुमने चर्चा आम किया !

फ़ा का इकरार किया  -
 बे इन्तहा  प्यार किया ,
इश्क खुमारी सर चढ़ बोली -
सजदा रात- भिनसार  किया  !!

दी थी दावते -इश्क तुम्ही ने  -
 भेज गुलाब उमीदो के ,
 फिर  क्यों बैठ, सरे महफ़िल 
नाम मेरा बदनाम किया  !!?!!

तुम्हे पाने की कोशिश - 
तमाम हुई नाकाम हुई -
 फिजूल चाहत में  ख्वाब मिटे -
 मुझे रुसवा सरेआम किया  !!!!!!!!!!!!!

संदर्भ ---- हमकदम -- पञ्च लिंक --रचना लेखन -विषय निम्न पंक्तियाँ -
इन्तजार , इज़हार ,गुलाब ,ख्वाब , नशा
उसे पाने की कोशि श तमाम हुई - सरेआम हुई 
द्वारा- रोहितास  घोडेला जी -- 
 श 
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शनिवार, 28 अप्रैल 2018

मैं श्रमिक --- कविता --

मैं श्रमिक  ---  कविता  --
इंसान हूँ मेहनतकश मैं -
नहीं लाचार या बेबस मैं !

किस्मत हाथ की रेखा मेरी  -

रखता मुट्ठी में कस मैं !!

बड़े गर्व से खींचता
  जीवन का ठेला ,
संतोषी मन देख रहा-
अजब दुनिया का खेला !!

गाँधी सा सरल चिंतन -
मैले कपडे उजला मन ,
श्रम ही स्वाभिमान मेरा -
हर लेता पैरों का कम्पन !

भीतर मेरे गांव बसा
है कर्मभूमि नगर मेरी ,
हौंसले कम नहीं  हैं  -
कठिन भले ही डगर मेरी !!!!!!!!!

चित्र --- गूगल से साभार ------
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शनिवार, 21 अप्रैल 2018

बुद्ध की यशोधरा -- कविता |

बुद्ध की योधशरा की पेंटिंग के लिए छवि परिणाम

बुद्ध की प्रथम और अंतिम नारी-
 जिसने  उसके मन में झाँका,
जागी थी जैसे तू कपलायिनी -- 
ऐसे  कोई नहीं जागा !!

पति प्रिया से बनी  पति त्राज्या-- 
 सहा अकल्पनीय दुःख पगली,
नभ से आ  गिरी धरा पे-
 नियति तेरी ऐसी बदली ;
 वैभव  से बुद्ध ने किया पलायन
तुमने वैभव में सुख त्यागा |

 बुद्ध को सम्पूर्ण करने वाली -
  एक नारी बस तुम थी ,
 थे  श्रेष्ठ बुद्ध भले जग में -
 बुद्ध पर  भारी बस  तुम  थी ;
सिद्धार्थ  बन गये बुद्ध भले  -
 ना  तोडा  तुमने  प्रीत का धागा !!

इतिहास झुका तेरे आगे --
 देख उजला   मन का दर्पण
  एक मात्र पूंजी पुत्र जब
 किया  बोधिसत्व को अर्पण ;
आत्म गर्वा माँ बन तुमने -
अधिकार अपने पुत्र का मांगा !!


बुद्ध का अंतस भी भीगा  होगा -- 
देख तुम्हारा  सूना तन - मन
चिर विरहणी, अनंत मन -जोगन -- 
विरह अग्न में तप हुई कुंदन ! !
 बुद्ध की करुणा में  सराबोर हो 
तू बनी अनंत महाभागा !!!!!!!!!!!!!!!

चित्र --- गूगल से साभार |
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शनिवार, 31 मार्च 2018

जिस पहर से------कविता ---


जिस पहर से पढने-
 शहर गये हो -
 तन्हाईयों  से ये 
 घर आँगन भर गये  हैं  |

उदासियाँ   हर गयी है
 घर भर का  ताना - बाना
हर आहट पे तुम हो
अब ये भ्रम पुराना
 जाने कहाँ वो किताबे तुम्हारी -
 बन  प्रश्न तुम्हारे-मेरे उत्तर गये है  

झांकती हूँ गली में-
लौटे बच्चों की टोली,
याद आ जाती तुम्हारी -
 सूरत सलोनी  भोली
तुम्हारा लौट आना -  
अतीत में   वो पहर गये हैं

 सजा लिया आँखों में
 नया सुहाना सपना
चुन लिया है तुमने
 आकाश नया अपना
 उड़ान है नई सी
 उगे  अब  पर  नये  हैं

तन्हाई में रंग भरता 
तुम्हारा अतिथि बन आना 
सजाता है पल को 
इस घर का  वीराना-
खिल जाती है बहना 
 नैन ख़ुशी से  भर गये हैं 

चिड़िया  सी नहीं मैं -
तुम्हे गगन  में उड़ा दूँ
ना नम नयना  करूं
 ख़ुशी से मुस्कुरा दूँ
 बहुत थामा दिल को
  बन नैन निर्झर    गये है

चित्र ---------गूगल से साभार
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आई तुम्हारी याद -----कविता -----

आई तुम्हारी याद -- कविता
दूभर तो बहुत थी -
ये उदासियाँ मगर ,
आई तुम्हारी याद -
तो हम मुस्कुरा दिए !
आई पलट के खुशियां -
महकी हैं मन की गलियां ;
बहुत दिनों के बाद -
हम मुस्कुरा दिए ! ! 

बड़े विकल कर रहे थे --
कुछ  संशय मनचले थे ;

धीरज ना कुछ बचा था -
और नैन भर चले थे ;
बस यूँ ही उड़ चले --

कई दर्द अनकहे
 . 
जब तुमसे हुई बात -

तो हम मुस्कुरा दिए ! ! 

हम यूँ ही बस भले थे -
तन्हाइयों में जीते !
तुम आये किधर से राही -
ले रंग   जिंदगी के ?
जीवन में वो कमी थी -
आँखों में बस नमी थी , 
पर तुम जो आये साथ -- 
तो हम मुस्कुरा दिए ! !


अपना ये सब जहाँ था -

पर तुमसा  कोई कहाँ था ?

अंधेरों से मन घिरा था 

हर  पग पे  इम्तिहां था 

 थे  कभी  अकेले  ;

 तुम  लाये ख़ुशी के मेले

 सुनी  मन  की  बात 

तो  हम  मुस्कुरा दिये !!!!!!!!

चित्र ------ गूगल से साभार ----
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शनिवार, 24 मार्च 2018

सुनो ! मन की व्यथा--------- कविता

सुनो  !   मन की  व्यथा कथा -
समझो मन के जज्बात मेरे ,
कभी झाँकों  इस  सूने मन  में -
 रुक   कुछ पल साथ मेरे  !

दीप की भांति जला है ये दिल -
सदियों सी  लम्बी  रातों में ,
 कभी  थमे  -  कभी छलके  हैं  -
 अनगिन  आंसूं मेरी आँखों  से   ;
छोडो  अलसाई रात का दामन  
कभी  तो  जागो साथ मेरे  !! 

उन्ही मन की  अनजानी  गलियों में   -
 फिर  अजनबी बन आ जाओ तुम ;
  इन विचलित प्राणों  में मेरे  -
  बन बादल   छा जाओ तुम |
कभी  मनाओ जो रूठे हम -
चलो ले हाथों में हाथ मेरे !!

ये रेगिस्तान मायूसी के -
है इनमे कोई आस कहाँ ? 
तकती है  आँखे राह तुम्हारी   -
तुम बिन इनमे कोई आस कहाँ ? 
एकांत   स्नेह से अपने भर दो-
रंग दो  रीते एह्सास  मेरे !!
कभी झाँकों  इस  सूने मन  में -
 रुक   कुछ पल साथ मेरे  !!!!!!!!!!!!!!
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शुक्रवार, 9 मार्च 2018

जीवन में तुम्हारा होना ---- कविता --





जीवन में  तुम्हारा होना---- कविता --


जब सबने रुला दिया -
तब तुमने हंसा दिया ,
ये कौन प्रीत का  जादू   भीतर  -
तुमने जगा दिया  ?
  
जीवन में  तुम्हारा होना -
 शायद अरमान हमारा था ;
इसी लिए अनजाने में  
 दिल ने  तुम्हे  पुकारा था ;
 सहलाया ये   घायल  अंतर्मन   --
मरहम सा लगा दिया !!

खुद को भूले  बैठे थे -
जीवन की तप्त दुपहरी थी -
 जो साथ तुम्हे लेकर आई -
वो भोर सुनहरी थी ;
तुम आये खुशियाँ संग लाये - 
 हरेक दर्द भुला दिया  !!

जो मन में  गूंजा  करता था
 वो इक नाम तेरा ही था ;
 एक अलग रूप में मिला है साथी -
 तू घनश्याम मेरा ही था ;
  साथ  दिया  अपना  - 
 मायूसी  की नींदों से जगा  दिया !!
  
उसी क्षण की परिक्रमा  करता -
ये अनुरागी मन मेरा ,
जो भर  गया दामन  में उमंगे -
और बदल गया जीवन मेरा ;
उपकार बड़ा उस पल का-
 जिसने  तुमसे मिला दिया !!!!!!!!!!!!


चित्र -- गूगल से साभार ----- 
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धन्यवाद शब्द नगरी ------ 

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (जीवन में तुम्हारा होना---- कविता -- ) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
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फिजूल चाहत में-- कविता -

ख़त नही दिल भेजा था --  क्या तुमने अंजाम किया ? बेहतर बात ये तुम तक रहती - तु मने चर्चा आम किया ! व फ़ा का इकरार किया  ...