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बुधवार, 2 सितंबर 2020

चलो नहायें बारिश में - बाल कविता


Pin on Raindrops Keep Fallin...

 चलो  नहायें बारिश में  

लौट कहाँ  फिर आ पायेगा ?

ये बालापन अनमोल बड़ा ,
जी भर आ भीगें  पानी में 
झुलसाती तन धूप बड़ा ; 
गली - गली  उतरी  नदिया 
 कागज की  नाव बहायें बारिश में !
चलो  नहायें बारिश में !

झूमें डाल- डाल  गलबहियाँ, 
गुपचुप करलें  कानाबाती  
 करेंगे मस्ती और मनमानी 
सीख आज हमें ना भाती ,
 लोट - लोट  लिपटें माटी से 
 और गिर -गिर जाएँ बारिश में ! 
चलो  नहायें बारिश में !

 भरेंगी खाली ताल -तलैया 
सूखे खेत हरे कर  देंगी 
अंबर से  झरती  टप- टप  बूँदें 
हरेक दिशा शीतल कर  देंगी 
धुल -धुल  होगा गाँव  सुहाना 
चलो घूम के आयें बारिश में 
चलो  नहायें बारिश में 

घर आँगन तालाब बन गये  
छप्पकछैया   करें - जी  चाहे 
उमड़ -घुमडते  भाते बादल 
ठंडी  हवा तन -मन सिहराए 
बेकाबू हुआ  उमंग भरा मन   
चलो नाचें -गायें बारिश में 
चलो  नहायें बारिश में 

चित्र - गूगल से साभार
शब्द नगरी पर पढ़ें ----

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

ये तेरी मुस्कान लाडली,- कविता



लाख करोड़ों पर भारी है
 ये तेरी मुस्कान लाडली,
 तू है मेरे जिगर का टुकडा
तू है मेरी जान लाडली !

तू आशा की अमरबेल ,
तुझसे सब संसार मेरा ;
 सपने मेरे जहाँ डग भरते 
 तू मेरा आसमान लाडली! 

 तनिक  रहे जो  दूर तू मुझसे 

 आँखें  मेरी  तुम्हें ही खोजे  ;
सब हों भले  -बिन तेरे लगता 
 ये जीवन वीरान लाडली !

धूप तुम्हारी हंसी -ख़ुशी की ,
 भरती आँगन में  उजियारा ,
 निश्छ्ल  वाणी  मन सहलाती 
    करती जीना आसान  लाडली !

सब कहें आज  तू बिटिया मेरी
 दुआ है ,वो दिन भी आये
तेरे नाम से नाम हो मेरा
 तू बनें मेरी पहचान लाडली !

  चित्र  - गूगल से साभार 
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रविवार, 5 जुलाई 2020

गुरु वंदना --



[ तीन साल -सौ रचनाएँ ]
🙏🙏🙏🙏गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर , ब्लॉग की तीसरी  वर्षगांठ पर  आज  सौवीं रचना के  साथ  ,  मेरे  ब्लॉग के गुरुतुल्य   प्रणेता  को कोटि आभार  जिनके  मार्गदर्शन  के बिना  ये ब्लॉग कभी अस्तित्व में ना आता    | स्नेही पाठकवृन्द को ब्लॉग पर , आज तक  उनकी  30683  स्नेहिल उपस्थितियों के लिए  हार्दिक आभार  और नमन   , जिन्होंने मेरी हर रचना  तो अतुल्य स्नेह दिया और  जब भी समय मिला ,  उन पर अपनी स्नेह भरी प्रतिक्रियाएं भी  अंकित   की | समस्त गुरुसत्ता  को नमन करते हुए सभी  को गुरुपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई 🙏🙏🙏🙏

गुरु- वंदना 

तुम कृपासिन्धु  विशाल , गुरुवर !
 मैं  अज्ञानी , मूढ़  , वाचाल गुरूवर !
  
पाकर आत्मज्ञान बिसराया .
छल गयी मुझको जग की माया ;
मिथ्यासक्ति   में डूब  -डूब हुआ
 अंतर्मन  बेहाल , गुरुवर ! 

तुम्हारी कृपा का  अवलंबन ,
पाया     अजपाजाप  पावन  ,  
गुरुविमुख हो सब खोया 
उलझा गया मुझे   भ्रमजाल गुरुवर !

 कुटिल वचन  वाणी दूषित ,
मैं अकिंचन  , विकारी , जीव  पतित 
तुम्हारी करूणा से  पाऊँ त्राण
धुलें मन के सभी मलाल  गुरुवर! 

 सहजो  ने  नित गुरुगुण गाया , 
मीरा ने गोविन्द को पाया , 
रत्नाकर बन गये बाल्मीकि 
 ये गुरुकृपा  है   कमाल गुरुवर !

वेदवाणी  के प्रणेता तुम ,
मानवता  के  सुघढ अध्येता  तुम ;
साकार रूप परमब्रहम  के 
करो दया,  होऊं निहाल गुरुवर !
चित्र - गूगल से साभार 
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ब्लॉग का प्रथम लेख --

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रविवार, 24 मई 2020

मरुधरा पर - - कविता




 मरुधरा पर ये  किसने  की मनमानी ?
 कौन है जिसने  रेत सिन्धु मथने की ठानी? 

यहाँ हीरा , मानिक  ना कोई मोती

रेतीले सागर में  पड़ी वीरानी सोती ;
इस ठांव  क्या  ढूंढने   आया होगा कोई  ?
 कलकल बहती नदिया ना  फसलें धानी !
  कौन है जिसने  रेत सिन्धु मथने की ठानी? 

किसके पदचिन्ह  रेतीले  तट पर उभरे हैं ?

कौन  पथिक  हैं जो इस पथ से गुजरे हैं ?
 वीर प्रताप से थे  शायद  रणबांकुरे  
लिख चले शौर्य गाथा वो अमर बलिदानी !
 कौन है जिसने  रेत सिन्धु मथने की ठानी? 

कोई  था  भूला भटका  या लाई  उसे उसकी तन्हाई? 
 निष्ठुर  बालू बंजर    जान पाया    कब  पीर पराई? 
भरमाया सुनहरे  सैकत  की आभा से    
मन  रहा ढूंढता होगा कोई छाँव सुहानी ? 
 कौन है जिसने  रेत सिन्धु मथने की ठानी? 

थी   मीरा   दीवानी तपती कृष्ण  लगन में ,       

या कोई  मजनूं दीवाना   जलता विरह अगन में ;
प्यास लिए मरुस्थल  सी  एक   जोगी बंजारा , 
  गाता फिरता  होगा -किस्सा   इश्क रूहानी !
  कौन है जिसने  रेत सिन्धु मथने की ठानी? 

चित्र -- पांच लिंकों से साभार 

सोमवार, 18 मई 2020

क्षमा करना हे श्रमवीर!


औरंगबाद के दिवंगत   श्रमवीरों के नाम -- 

 Father Who Lost Two Sons In Aurangabad Train Accident Is Broken ...
  ऐसे सोये- सोते ही रहे- -- ,
भला! ऐसी भी क्या आँख लगी ?
पहचान सके ना मौत कीआहट-
 अनमोल जिन्दगी गयी ठगी !


फूलों का बिस्तर तो ना था - 
क्यों  लेट गये मौत की पटरी ?
  लेकर  चले थे शहर से  जो -
 बिखर गयी  सपनों की  गठरी , 
ना ढली  स्याह रात पीड़ा की
जीवन की  ना नई भोर उगी
 !


क्यामोल मिला तुम्हें   श्रम का ?
हाथ   रहे सदा ही   खाली , 
देह  गयी मिटती पल- पल 
मिटी  ना दुर्भाग्य की छाया काली ;
 रहा सदा  मृगतृष्णा  बन  जीवन 
 सोई  हुई ना  आस जगी !

 परदेशी थे ,  परदेशी  ही रहे 

अपना पाया  ना शहर तुम्हें  , 
गले लगाने  कोई मसीहा - 
ना आया किसी भी  पहर तुम्हें ;
 भूले   निष्ठा  अगाध तुम्हारी 
 उठेगी  ना ये नज़र    झुकी !


रौंदा  रफ़्तार ने कसर ना छोड़ी ,
लील गए रस्ते जिंदगानी; 
सनीं लाल लहू    से सड़कें 
पग -पग दारुण हुई कहानी;
मौत लिपट दामन से  चल दी
 अनगिन टुकड़ों में    देह   बंटी !
 

शर्मिन्दा  थी पहले ही मानवता 
 तुम्हारे पांव के छालों से ., 
कहाँ बच पाएगा  इतिहास 
कटी  देहों  के  इन सवालों से ;
क्यों मुख मोड़  चली जिंदगी
 टूटी  सासों की  चाल सधी  ।  


क्षमा करना हे   श्रमवीर ! 
दे सके   ना तुम्हें संबल  कोई  
जोखिम उठा  जिस  ओर चले  
मिल सकी   ना   मंजिल कोई ;
 ना  चूम सके  घर -गाँव की चौखट-
छू पाए ना माटी स्नेह  पगी !!

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

रेगिस्तान में आ यायावर --

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रेगिस्तान में आ यायावर --
क्यों हुए तुम्हारे पलक गीले ?
रेतीले पथ पर कहाँ खोजता--
खुशियों के बसंत सजीले !

ये असीम रेतीला सागर
तुझे क्या धीरज दे पायेगा ?
खुद है जो बेहाल प्यास से
कैसे शीतलता दे पायेगा ?
तुझको आगे बढ़ने ना देंगे
रेत के ऊँचे पर्वत , टीले !

बारिश की बूंदें या आंसू -
सब इसमें ज़ज़्ब हो जायेंगे .
मरुधरा पर हरियाली के
कहाँ स्वप्न पनपने पायेंगे ;
बींध देंगे कोमल पांव तेरे
ये राह के बबूल कंटीले !
कहाँ खोजता रेतीली राहों में --
खुशियों के रंग सजीले !

स्वरचित
चित्र गूगल से साभार --

सोमवार, 9 मार्च 2020

देखो मतवाला दिन आया

देखो मतवाला दिन आया
 बिखरे होली के रंग गलियों में
टेसू  फूले ,गुलाब महके
उडी भीनी पुष्प गंध गलियों में

 श्वेत -श्याम एक हुए 
 ना  ऊंच- नीच का भेद रहा 
 रंग एक रंगे  सभी  देखो 
 एक दूजे के  संग -संग गलियों में 
टेसू  फूले ,गुलाब महके . 
उडी भीनी पुष्पगंध गलियों में !!

  ढोल बजे हुडदंग मचे
फूला मन उड़ा  पतंग   जैसे 
गोरी गुलाल से लाल हुई 
फैले   मधुर आनन्द  गलियों में 
  टेसु  फूले, गुलाब  महके 
उडी  भीनी पुष्प  गलियों  में  ! 

घोंट ठंडाई   खूब  चढाये 
 ना कोई बस   में  कर आये
बड़े लाला  घूम  रहे हैं  
 मस्ती में  पी भंग गलियों में 
 टेसू  फूले ,गुलाब महके . 
उडी भीनी पुष्पगंध गलियों में !!

उत्सव जगा ठहरे  जीवन में 
मस्ती के मेले  खूब सजे , 
महकी हवायें गुझिया  से  
 छाई अजब  उमंग गलियों  में 
टेसू  फूले ,गुलाब महके . 
उडी भीनी पुष्पगंध गलियों में !!





गुरुवार, 5 मार्च 2020

तुम्हें बदलते देख रही हूँ

मौसम बदलते देखे थे
अब तुम्हें  बदलते देख रही हूँ
सूरज से आये थे एक दिन
साँझ सा  ढलते   देख रही हूँ !


  जिन आँखो  से पोंछ के आसूं
 मुस्कानें   भर दी थी तुमने, 
 आज उन्हीं में  फिर से   -
 सावन  उमड़ते   देख रही हूँ !

  दहल जाता है ये मन अक्सर 
 तुम्हें खो जाने के डर से,
कहीं  वीरानों  में  ना खो जाऊं
 खुद को संभलते   देख रही हूँ !

क्या वो तुम ही थे 
जिसके लिए  जान बिछाई थी? 
हवा हुए अनुबंध प्रेम के, 
घावों को रिसते  देख रही हूँ !

 मेरी पहुँच से दूर हो फिर  भी,.
अनजानी -सी ये  जिद  कैसी ?
चाँद खिलौने पर देखो - 
मनशिशु   मचलते   देख रही हूँ !!

 

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

जीवन की ढलती सांझ में

सांध्य दैनिक मुखरित मौन


जीवन की ढलती साँझ में
गीत मेरे सुनने आना
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

हो  जाए शायद आँखें नम

गुज़र यादों के  गलियारों से,
टीस  उभरेगी पतझड़ की
 कर सामना  बीती बहारों से;
दुनियादारी से ना मिलना
याद आये तब मिलने आना!
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

सुन लेना हर दर्द मन का

बन सखा  घनश्याम तुम
थके प्राणों को दे छाँव अपनी
देना तनिक आराम तुम;
 कलुषता   हर अंतस की
भाव मधुर भरने आना !
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

लिख जिन्हें पास अपने

 छिपा रख लेती हूँ मैं
एकांत में कभी  इन्हें
पढ़ रो कभी हँस देती हूँ मैं
ख़त    तुम्हारे  नाम के
चुपके से कभी पढने आना
मन के   तटपर यादों की
सीपियाँ  चुनने आना !

 स्वरचित  

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

आज कहीं मत जाना

दिन  आज का बहुत सुहाना साथी -
आज कहीं मत जाना  साथी !!

  मुदित मन के मनुहार खुले हैं ,
 नवसौरभ के बाजार खुले हैं ;
 डाल - डाल पर नर्तन करती -
कलियों के बंद द्वार खुले हैं ;
 सजा   हर वीराना साथी
आज कहीं मत जाना साथी

ये तप्त दुपहरी  जीवन की -
 थी मंद पड़ी प्राणों की उष्मा ,
 जाग पड़ी तुम्हारी  आहट से
सोयी  अंतस की  चिरतृष्णा
हुआ विरह का राग पुराना साथी -
आज कहीं मत जाना साथी -

सुन स्वर तुम्हारा सुपरिचित -
 ले हिलोरें पुलकित अंतर्मन , 
जाने  जोड़ा किसने  और कब?
प्रगाढ़ हुआ  ये मन का बंधन ; 
मिला नेह  नज़राना  साथी  ,
आज   कहीं मत जाना साथी !!

विशेष रचना

क्षमा करना हे श्रमवीर!

औरंगबाद के दिवंगत   श्रमवीरों के नाम --        ऐसे सोये- सोते ही रहे- -- , भला! ऐसी भी क्या आँख लगी ? पहचान सके ना मौत कीआहट-   अ...