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बुधवार, 12 दिसंबर 2018

सुन ! ओ वेदना-- कविता --

ब्लॉग पर 75 वीं  रचना 


सुन ! ओ वेदना 
जीवन में -लौट कभी ना आना तुम !
घनीभूत पीड़ा -घन बन -
ना पलकों पर छा जाना तुम !!

हूँ आलिंगनबद्ध -   सुखद  पलों से -
कर ना   देना दूर तुम ,
 दिव्य आभा से घिरी मैं  -
ना हर लेना ये नूर तुम ,
सोई हूँ ले सपने  सुहाने    -
 ना मीठी  नींद से जगाना तुम

 आज प्रतीक्षित है  कोई  -
कुछ पग संग चलने के लिए ;
 रीते मन  में   रंग अपनी -
 प्रीत  का  भरने के लिए
 लौटा  लाया  खुशियाँ  मेरी    -
 समझो ना उसे बेगाना तुम

लौटी हूँ चिरप्रवास से -
 रिक्तियों के नभ से मैं
आकंठ हूँ अनुरागरत  -
 विरक्त हूँ   इस जग से मैं
 स्नेह पाश में बंधी     -
ना बंधन ये तोड़ जाना तुम

जो हैं शब्दों से परे-
एहसास जीने दो मुझे
बन गया अभिमान मेरा  -
विश्वास जीने दो मुझे -
जोड़ नाता अतीत से -
ना फिर मुझे  भरमाना तुम

ना सताना मुझे
 ना फिर रुला देना   मुझे
 दिवास्वप्न ये मधुर से - 
 मिटा ना तरसाना  मुझे 
दूर किसी जड़ बस्ती  में
जाकर के बस जाना तुम !! 
चित्र -- गूगल से साभार | 

शनिवार, 24 नवंबर 2018

रूमानियत

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इस   क़दर अपना बनाया आपने -
कर दिया जग से पराया आपने  !

था दर्द की इन्तहा में  डूबा  ये दिल ,
 चाहत का  मरहम लगाया आपने !

 मेरे  भीतर ही था सोया कहीं -
आ  वो बचपन   लौटाया  आपने! 

बदल गए मंज़र कायनात के
वो हसीं जादू जगाया आपने  !

हुआ एक पल भी दूभर बिन आपके ,
  खुद का यूँ आदी बनाया आपने !

 इस  जमीं से आगे कब  था  मेरा जहाँ '
 आसमां पे ला बिठाया आपने !!

 रूमानियत का  है करिश्मा आपकी, 
मुझसे ही मुझको  मिलाया आपने !!!!!!!!!!!



शनिवार, 17 नवंबर 2018

आये अतिथि आंगन मेरे-- कविता -

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  आये  अतिथि आंगन मेरे ,
 महक  उठे   घर - उपवन मेरे !!

छलके  खुशियों के पैमाने -
गूंजे  मंगल - गीत सुहाने , 
आज ना पड़ते पांव  धरा पे -
भूल गये   सब दर्द पुराने ;
 खिला है कोना -कोना घर का
पतझड़ बन  गये फागुन  मेरे !!

जिस  पल  को थे नैना तरसे ,
देख उसे ये  तन - मन   हरषे ;
खूब निहारूं और  इतराऊँ -
आँगन आज मिलन -रंग  बरसे ;
अपनों  ने जब गले लगाया 
नैना बन गये सावन मेरे !!

 जगमग दीप द्वार  सजे  हैं ,
 झिलमिल  बन्दनवार  सजे  हैं ;
 पथ बिखरी   गुलाब पांखुरी-
 सुवासित गेंदाहार सजे हैं   ;
देव  अतिथि    तुम हो  मेरे -
 स्वीकार करो अभिनंदन  मेरे  !! 
  
 आये अतिथि आंगन मेरे ,
 महक  उठे   घर - उपवन मेरे !!!!!!!
चित्र -- गूगल से साभार -- 

बुधवार, 17 अक्तूबर 2018

कहीं मत जाना तुम -- कविता


बिनसुने - मन की व्यथा --
दूर कहीं मत जाना तुम !
किसने - कब- कितना सताया -
सब कथा सुन जाना तुम ! !

जाने कब से जमा है भीतर --
दर्द की अनगिन तहें , 
जख्म बन चले नासूर - 
अब तो लाइलाज से हो गए ; 
मुस्कुरा दूँ मैं जरा सा -- 
वो वजह बन जाना तुम ! ! 

रोक लूंगी मैं तुम्हे - 
किसी पूनम की चाँद रात में ,
उस पल में जी लूंगी मैं-
उम्र सारी - तुम्हारे साथ में ;
नील गगन की छांव में बस - 
मेरे साथ जगते जाना तुम ! 

एक नदी बाहर है - 
इक मेरे भीतर थमी है ,
खारे जल की झील बन जो -
कब से बर्फ सी जमी है ;
ताप देकर स्नेह का -
इसको पिंघला जाना तुम ! ! 

साथ ना चल सको - 
मुझे नहीं शिकवा कोई , 
मेरे समानांतर ही कहीं -
चुन लेना सरल सा पथ कोई ; 
निहार लूंगी मैं तुम्हे बस दूर से - 
मेरी आँखों से कभी- ओझल ना हो जाना तुम ! !

बिनसुने -- मन की व्यथा - 
दूर कहीं मत जाना तुम  !!!!!!!!!!!!!!
-चित्र ०० गूगल से साभार - 
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शनिवार, 13 अक्तूबर 2018

उलझन -- लघु कविता

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इक   मधुर एहसास है तुम संग -
 ये अल्हड लडकपन जीना ,
 कभी सुलझाना ना चाहूं -
 वो मासूम सी उलझन जीना !

  बीत  ना मन का मौसम जाए - 
 चाहूं समय यहीं थम जाए ;
 हों  अटल ये पल -प्रणय  के साथी -
 भय है, टूट ना ये  भ्रम जाए 
संबल  बन गया  जीवन का -
 तुम संग ये नाता पावन जीना !

  बांधूं   अमर  प्रीत- बंध मन के
 तुम  संग  नित  नये ख्वाब सजाऊँ 
 रोज मनाऊँ तुम रूठो तो
पर    तुमसे रूठना -  कभी ना  चाहूं 
फिर भी  रहती -चाहत मन   की  
इक   झूठमूठ की अनबन जीना !!!!!!!!
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धन्यवाद शब्द नगरी - 

रेणु जी बधाई हो!,

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धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

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शनिवार, 29 सितंबर 2018

नेह - तूलिका -कविता




सुनो !   सखा- ले   नेह - तूलिका -
 रंग दो मन की कोरी चादर
 हरे ,गुलाबी ,  लाल , सुनहरी 
 रंग इठलायें  जिस पर  खिलकर !!

 सजे  सपने इन्द्रधनुष के   -
 नीड- नयन     से मैं   निहारूं 
सतरंगी आभा पर इसकी -
तन -मन मैं  अपना     वारूँ
बहें  नैन -जल कोष  सहेजे--
 मुस्काऊँ  नेह -अनंत पलक  भर !!
  
स्नेहिल सन्देश   तुम्हारे -
 नित शब्दों में  तुमसे मिल लूं   -
 यादों के गलियारे  भटकूँ -
फिर से  बीते हर  पल  जी लूं  ;
डूबूं आकंठ उन  घड़ियों में -
 दुनिया की हर सुध  बिसराकर

   अनंत मधु मिठास रचो तुम
आहत मन की आस रचो तुम
रचो प्रीत उत्सव कान्हा बन -
 जीवन  का मधुमास रचो तुम 
  खिलो कंवल  बन   मानसरोवर  
 सजो  अधर   चिर हास तुम  बनकर !!!!!!!!!
चित्र -- पञ्च लिंकों से साभार --  
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धन्यवाद  शब्दनगरी ------- 

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शनिवार, 22 सितंबर 2018

तृष्णा मन की - कविता

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 मिले  जब  तुम अनायास -
 मन मुग्ध    हुआ  तुम्हें  पाकर  ;
 जाने थी कौन तृष्णा  मन की - 
जो छलक गयी अश्रु बनकर   ? 

 हरेक     से मुंह मोड़ चला -
  मन तुम्हारी  ही   ओर चला
 अनगिन    छवियों में उलझा -
  तकता   हो भावविभोर चला-
 जगी भीतर  अभिलाष  नई-
 चली ले उमंगों की नयी डगर  ! !

प्राण स्पंदन हुए कम्पित,
जब सुने स्वर तुम्हारे सुपरिचित ;
जाने ये भ्रम था या तुम  वो  ही थे-
 सदियों से  थे  जिसके   प्रतीक्षित;
 कर  गये शीतल- दिग्दिगंत   गूंजे- 
 तुम्हारे ही    वंशी- स्वर मधुर !!



 डोरहीन   ये  बंधन  कैसा ?
यूँ अनुबंधहीन     विश्वास  कहाँ ?
  पास नही    पर  व्याप्त मुझमें
 ऐसा जीवन  -  उल्लास  कहाँ ?
 कोई गीत  कहाँ मैं  रच पाती ? 
तुम्हारी रचना ये शब्द प्रखर !
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धन्यवाद शब्दनगरी 

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शनिवार, 8 सितंबर 2018

तुम्हे समर्पित सब गीत मेरे--

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मीत कहूं ,मितवा कहूं ,
क्या कहूं तुम्हे  मनमीत मेरे ?
 नाम तुम्हारे ये शब्द  मेरे
 तुम्हे समर्पित सब गीत मेरे !!


 हर बात  कहूं  तुमसे मन की  -

 कह अनंत सुख पाऊँ मैं ,
 निहारूं नित मन- दर्पण में  -
  तुम्हे  स्व सम्मुख   पाऊँमैं;
सजाऊँ  ख्वाब नये  तुम संग -
 भूल, ये  गीत -अतीत मेरे  !!

सृष्टि में जो ये प्रणय का
 अदृश्य  सा महाविस्तार है -
जो युगों से है अपना -
 वही इसका दावेदार है --
बंधने नियत थे तुम संग -
जन्मों के बंध पुनीतमेरे !!
  
अनुराग बन्ध में सिमटी मैं 
यूँ ही पल- पल जीना  चाहूं ,
सपन- वपन कर डगर पे साथी -
संग तुम्हारे चलना चाहूं ;
 तेरे प्यार  से हुए हैं जगमग -
ये नैनों के दीप मेरे  !!
 नाम तुम्हारे हर  शब्द  मेरे
 तुम्हे समर्पित सब गीत मेरे !!!!!!!!!
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 धन्यवाद शब्दनगरी --------

रेणु जी बधाई हो!,

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शनिवार, 25 अगस्त 2018

भैया तुम हो अनमोल ! ---कविता --

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जग में हर वस्तु का मोल -
 पर भैया तुम हो अनमोल  !

दर-दर पर शीश झुका करके -
 मांगा था तुझे विधाता से -
तुम सा कहाँ कोई  स्नेही-  सखा मेरा -
मेरा  तो  गाँव तेरे दम से ;
 सुख- दुःख  साझा  कर लूं अपना  
रख  दूं  तेरे  आगे मन  खोल !!

बचपन में जब तुमने गिर -गिर -
 ये ऊँगली पकड चलना सीखा ,
 नीलगगन का चंदा भी -
था तेरे आगे बड़ा फीका ;
 धरती पर मानो देव  उतरे -
 सुनकर तेरे तुतलाते बोल !!

 बाबुल की बैठक की तुम शोभा -
 तुमसे  माँ का उजला अंगना ;
 भाभी की मांग सजी तुमसे -
 हो तुम उसकी प्रीत का गहना ;
तुमसे बढ़ ना कोई धन मेरा -
 चाहे जग दे तराजू  तोल !! 

लेकर राखी के दो तार -
 आऊँ स्नेह का पर्व मनाने ,
 घूमूं बचपन की गलियों में -
 पीहर  देखूं तेरे बहाने ;
 बहना  मांगे प्यार तेरा बस -
 ना मांगे राखी का मोल !!
जग में हर वस्तु का मोल -
 पर भैया तुम हो अनमोल  !!!!!!!!!!!
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शनिवार, 18 अगस्त 2018

क्या लिखूं तुमसे परिचय मेरा ?-- कविता



क्या लिखूं तुमसे परिचय मेरा ?
 तुम  पावन स्नेह प्रश्रय मेरा !!

 कब स्वर में मुखरित हो पाते हो
शब्दों  में  कहाँ समाते हो ?-
मैं  हसूं- हंसी में हंस जाते  - 
बन घन नैना छलकाते  हो
सपनों से  भर  जाते    कैसे ?
 सूना   पलक- निलय मेरा  !!

क्यों  विकल करजाता  मन को
अरूप , अनाम   सा ये  नाता
जैसे  भाये  तुम   अनायास
 कहाँ  यूँ   मन कोकोई  भाता ?
पा तुम्हे सब भूल गया है -
  बौराया    ह्रदय मेरा !!


पुलकित    सी  इस प्रीत - प्रांगण  में  
हो कर  निर्भय   मैं विचरूं,
भर  विस्मय  में  तुम्हे निहारूं -
रज बन पथ में  बिखरूं ;
हुई खुद से  अपरिचित सी   मैं -
यूँ  तुझमे हुआ विलय मेरा !! 

क्या लिखूं तुमसे परिचय मेरा ?
 तुम  पावन स्नेह प्रश्रय मेरा !!!!!!!!!!!!!!!!
चित्र और विषय -- पांच लिंकों से साभार |
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सुन ! ओ वेदना-- कविता --

ब्लॉग पर 75 वीं  रचना  सुन ! ओ वेदना  जीवन में - लौट कभी ना आना तुम ! घनीभूत पीड़ा -घन बन - ना पलकों पर छा जाना तुम !! हूँ आलिंगनब...