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सोमवार, 11 नवंबर 2019

नमन न्यायपालिका


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नवम्बर को भारत की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गये ऐतहासिक निर्णय के लिए न्यायपालिका के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ --
नमन न्यायपालिका के -
सम्पूर्ण अधिकार की शक्ति को,
न्याय मिला , भले देर हुई , 
वन्दन  इस द्वार शक्ति को !

समय बढ़   गया आगे,
लिख सौहार्द की  नई परिभाषा;
 प्यार जीता नफरत हारी , 
बो हर दिल में नयी आशा ;
हर कोई अपलक  देख रहा -
इस   प्यार की शक्ति को !

समभाव भरी ये पुण्यधरा .
गीता भी जहाँ ,  क़ुरान भी है
कुनबा ये वासुदेव का है,
यहाँ राम है ,तो रहमान भी है;
कभी ना आंकों कम, 
इस   परिवार की शक्ति को ! 

ज्ञान- बुद्धि श्रद्धा से हारे .
ना तर्क आस्था ने माने ;
राह दिखाते मानवता को ,
पगचिन्ह वो  मानव ने पहचाने ;
शीश झुकाया  मान  सभी ने  .
सच्चे करतार की शक्ति को !

राम आराध्य जन- जन के,
युगपुरुष चेतना के उत्तम;
जगहित दिया मर्यादित रामपथ   ,
हुये सृष्टि के    नायक   सर्वोत्तम  ; 
 रामराज्य  के रूप में जग जाना .
  राघव सरकार की शक्ति को !!!!!!

स्वरचित 
चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 26 अक्तूबर 2019

दीपमाल के उत्सव में- कविता


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दीपमाल  के उत्सव में
अनायास तुम  याद  आये , 
 जा  तुममें ही उलझा  चितवन 
 हर दीप में  तुम्हीं नजर आये ! !

 जीवन अभिनय से  कोसों दूर
तुम स्नेही सखा मेरे मन के ,  
 ओझल  नजरों से दुनिया की 
 पावन- सिन्धु अपनेपन के . 
पल  सुखद  तुम्हारी यादों के
 विचलित  मेरा मन  सहलाएं !
 रहा   तुममें ही उलझा चितवन 
 हर दीप में  तुम्हीं   नजर आये !!


अवनि -अम्बर को जोड़ रही -
 उजालों की  अनगिन लड़ियाँ
 पर  मन को  लगी बींधने  क्यों
कण -कण में बिखरती फुलझड़ियाँ . 
सघन  नैन कुहासों में  बरबस ,
 बन चन्द्र-नवल  तुम मुस्काए !
 जा   तुममें ही    उलझा चितवन 
 हर दीप में  तुम्हीं   नजर आये  

मौन स्वर ये  प्रार्थना  के 
तुम्हें समर्पित अविराम मेरे .
 उपहार तुम्हारा अनमोल वो पल  
 जो लिख दिए तुमने नाम मेरे ;
 प्रेम -प्रदीप्त दो नयन तुम्हारे
जब  भी सुधियों में छाये !
 जा  तुममें ही   उलझा चितवन 
 हर दीप में  तुम्हीं   नजर आये  !!

स्वरचित 
चित्र गूगल से साभार 
सभी साहित्य- प्रेमियों को दीपावली की  मंगलकामनाएं और बधाई |

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

लिख दो कुछ शब्द -



लिख दो ! कुछ शब्द
नाम मेरे ,
अपने होकर ना यूँ -
बन बेगाने रहो तुम !
हो दूर भले - पास मेरे .
इनके ही बहाने रहो तुम !

कोरे कागज पर उतर कर .
ये अमर हो जायेंगे ;
जब भी छन्दो में ढलेंगे ,
गीत मधुर हो जायेंगे ;
ना भूलूँ जिन्हें उम्र भर
बन प्रीत के तराने रहो तुम !

जब तुम ना पास होंगे
इनसे ही बाते करूँगी .
इन्हीं में मिलूंगी तुमसे
जी भर मुलाकाते करूँगी
शब्दों संग मेरे भीतर बस
मेरे साथी रूहाने रहो तुम !

जीवन की
ढलती साँझ में
ये दुलारेंगे मुझे ,
तुम्हारे ही प्रतिरूप में-
स्नेहवश निहारेंगे मुझे ;
रीती पलकों पर मेरी
बन सपने सुहाने रहो तुम !

कौन जाने कब कहाँ
हो आखिरी पल इस मिलन का
शब्दों की अनुगूँज ही
होगी अवलंबन विकल मन का
पुकार सुनो
विचलित मन की
ना इस दर्द से अंजाने रहो तुम !!
  
स्वरचित  -- रेणु
धन्यवाद शब्दनगरी 
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रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - ( लिख दो कुछ शब्द -- ) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

सोमवार, 22 जुलाई 2019

सुनो चाँद !-- कविता


   à¤šà¤‚द्रयान के चित्र के लिए छवि परिणाम

अब  नहीं हो! दुनिया के लिए, 
 तुम तनिक  भी अंजाने, चाँद!
 सब जान गए राज तुम्हारा 
 तुम इतने  भी नहीं    सुहाने, चाँद! 

बहुत भरमाया सदियों तुमने ,
गढ़ी झूठी कहानी थी;
 थी वह तस्वीर एक धुंधली  ,
नहीं  सूत कातती नानी थी;
युग_युग से बच्चों के मामा -
 क्या कभी आये लाड़ लगाने?चाँद !
  
 खोज -  खबर लेने तुम्हारी , 
विक्रम संग प्रज्ञान चला है।
 ले  खूब  दुआओं के तोहफे,
 तुम्हे  मिलने  हिन्दुस्तान चला है ;
  ना होना तनिक  भी विचलित   -
 नहीं आया  कोई भरमाने , चाँद !   

 उत्तरी ध्रुव के भेद खुले -

अब दक्षिण की बारी है;
 करो !हम से भी  भाईचारा,
 नहीं    कोई दुश्वारी  है;  
 टंके रहोगे कब तक तन्हा ?
 अन्तरिक्ष में  वीराने , चाँद!
स्वरचित -- रेणु

चित्र - Google से साभार ----   

भारतवर्ष के गौरव 'इसरो' को चंद्रयान-2 के सफल प्रक्षेपण के लिए हजारों सलाम!
सभी प्रतिभाशाली वैज्ञानिक  बधाई  के पात्र हैं | 

शुक्रिया शब्दनगरी -----

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (सुनो चाँद ! ) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन     

शनिवार, 20 जुलाई 2019

गाय बिन बछड़ा --कविता

  

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गाय  बिन  बछड़ा  रहता   उदास  बड़ा ,
 डूबा   है किसी फ़िक्र में ,दिखता  हताश   बड़ा !

जाने  क्यों  इसके लिए  निष्ठुर बना   विधाता ?
क्रूर काल  ने  जन्मते   छीन  ली  इसकी  माता ;
अबोध , असहाय  ये नन्हा   सा  बछडा- 
बड़ी करुणा  से  तकता ,आँखे  नम  कर  जाता ;
पेट पीठ  में लगा   लोग  कहें  बड़ा  अभागा,
मूक  वेदना     भांप   मन होता   निराश बड़ा !

होती माँ  जो  आज  चाट कर  लाड़ जताती .
 होता  तनिक  भी दूर  जोर  से बड़ा रंभाती ; 
स्नेह  से  पिलाती दूध  जरा   भूखा जो  दिखता .
ममता  से रखती खूब - माँ  बनकर  इतराती ;
कुलांचे भरता  नन्हा ,  दिखती उमंग    बचपन  की ,
  दिखता भोली  आँखों  से    मीठा   उल्लास  बड़ा !

काश  ! होती  जुबान ,तो बात  मन   की  कह  पाता,
माँ  को करता  याद -  बड़ा ही   रुदन    मचाता ;
  स्वामी  विकल  -स्नेह से  खूब    सहलाये ,
लगती  तनिक  जो भूख  बोतल  से  दूध  पिलाता ;
  माँ  की  कमी  न  पर वो   पूरी  कर  पाए 
भले है  मन  को  इस  गम   का एहसास  बड़ा ! !!!!!! 
स्वरचित -- रेणु

  
 

शनिवार, 22 जून 2019

कभी अलविदा ना कहना तुम



कभी अलविदा ना कहना तुम 
मेरे साथ  यूँ ही रहना तुम !

 तुम  बिन थम जाएगा  साथी ,

  मधुर गीतों का ये सफर ;
रुंध कंठ में  दम तोड़ देगें -
आत्मा के स्वर प्रखर ;
 बसना मेरी मुस्कान में नित  
 ना संग आंसुओं के बहना तुम

 तुम ना होंगे हो जायेगी  गहरी

 भीतर की    तन्हाईयां-
टीसती  विकल करेंगी
 यादों की ये  परछाईयां-
 गहरे   भंवर में संताप के -
    देखो !ना  डुबो देना तुम !

निःशब्द   हो सहेज लेना 
 अक्षय स्नेहकोष  मेरा, 
 रखना याद ये स्नेहिल पल -
 भुला देना हर दोष मेरा ;
  दूर आखों से  हो जाओं
ये सजा कभी मत देना तुम !


  

बुधवार, 29 मई 2019

याद तुम्हारी-- नवगीत


  
मन कंटक वन में-
 याद  तुम्हारी  -
खिली फूल सी 
 जब -ब महकी  

 हर दुविधा -
उड़ चली  धूल सी!!

 रूह से लिपटी जाय-

तनिक विलग ना होती,
  रखूं   इसे संभाल -
 जैसे सीप में मोती ;
सिमटी  इसके  बीच -
दर्द  हर चली भूल सी !!


होऊँ जरा   उदास

 मुझे  हँस बहलाए
 हो जो इसका साथ
 तो कोई साथ न  भाये -
 जाए  पल भर   ये दूर -
 हिया में चुभे शूल सी !!

 तुम नहीं हो जो पास -

 तो सही याद  तुम्हारी ,
रहूं  मगन मन  बीच -
 चढी ये अजब खुमारी ;
बना प्यार मेरा अभिमान 
 गर्व  में रही फूल सी !!
मन कंटक वन में-
 याद  तुम्हारी  -

खिली फूल सी !!!!

स्वरचित -रेणु

चित्र---गूगल से साभार --

रविवार, 26 मई 2019

अव्यवस्था के अग्नि कुण्ड में --- सूरत अग्नि काण्ड पर


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मौसम आयेंगे  जायेंगे पर 
वे   वापस  ना आयेंगे 
 घर आँगन  में  नौनिहाल
 अब ना खिलखिलाएंगे !

 गर्म हवा से भी  न कभी 
  छूने  दिया था जिन्हें 
सोच ना था  अव्यवस्था के
 अग्नि   कुंड  उन्हें  भस्म  कर  जायेंगे !


जीने की खातिर   जिन्होंने 

  लड़ी  जंग  आखिरी दम तक 
कब वो मन की आँखों से 
 ओझल हो पायेंगे ? 

रंग हुए फीके होली के 

 खो गयी ख़ुशी दीवाली  की 
बुझे  आंगन के दीप 
कैसे जश्न मन पाएंगे  ?

हर आहट पे   होगा भ्रम  

 आँखों के तारों  के आने का 
 मानो  कहीं से  जिगर के टुकड़े 
   आ गले लग जायेंगे !!!!!!!!!!!

 अश्रुपूरित  नमन   उन  सुकुमार नौनिहालों जो जीने की  खातिर  आखिरी साँस तक लड़े !!!!!!!

शनिवार, 18 मई 2019

ना शत्रु बन प्रहार करो --कविता [ एक वृक्ष की व्यथा -]




 ना शत्रु बन प्रहार करो -
 सुनो मित्र ! निवेदन मेरा भी -
मैं मिटा तुम भी ना रहोगे -
 जुडा तुमसे यूँ जीवन मेरा भी !

  करूं श्रृंगार जब सृष्टि का मैं  -

फूल -फूल कर इठलाती
 सुयोग्य  सुत  मैं धरा    का
मुझ बिन  माँ  की फटती छाती
तुम जैसे ही ममता वश  मैं -
नहीं  कम कोई समर्पण मेरा भी !!


सदियों से पोषक हूँ  सबका  -

 कृतघ्न  बन- ना दो धोखा
निष्प्राण नही   निःशब्द हूँ मैं
कहूं कैसे अपने  मन की  व्यथा   ?
  जड़  नही चेतन हूँ  मैं
दुखता है मन मेरा भी !!

खाए ना कभी अपने फल मैंने -

न फूलों से श्रंगार किया ,
जग हित हुआ जन्म मेरा   -
पल -पल इसपे उपकार किया;
खुद तपा- बाँट छाया सबको -
  जुडा सबसे अंतर्मन  मेरा भी !!

कसता नदियों के तटबंध मैं -

 थामता   मैं ही हिमालय  को ,
जुगत मेरी  कायम रहे   सृष्टि -
महकाता मैं ही देवालय  को ;
 तुम संग बचपन में लौटूं -
 संग  गोरी खिलता यौवन मेरा भी !

स्वरचित -- रेणु
चित्र -गूगल से साभार 

बुधवार, 8 मई 2019

पथिक ! मैंने क्यों बटोरे

 
पथिक !  मैंने क्यों बटोरे   -
 नेह भरे   वो पल तुम्हारे ?
यतन कर  - कर के हारी , 
गए ना    मन से बिसारे !

कब  माँगा  था   तुम्हें 
किसी दुआ  और प्रार्थना में ?
तुम कब थे समाहित 
मेरी     मौन अराधना में ?
आ गये अपने से बन क्यों
 बंद ह्रदय के  द्वारे  ! !

हंसी- हँसी  में लिख दिए -
 दर्द संग अनुबंध मैंने ,
 थाम रखे जाने  कैसे- 
 आँसूओं के बन्ध मैंने  ;
 टीसते मन को लिए-
 संजोये   भीतर  सागर   खारे !!

क्यों उतरे मन के तट-
एक सुहानी प्यास लेकर?
अनुराग  गंध से भरे -
 अप्राप्य से मधुमास लेकर ;
क्यों ना गये राह अपनी
समेट  मधु स्वप्न सारे ! !

ना था अधिकार   क्यों  रखी    
व्यर्थ   मिलन  की चाह मैंने ?
किस आस पर निहारी
 पहरों तुम्हारी राह मैंने ?
आंचल में  क्यों  भर बैठी
 भ्रामक से चाँद सितारे !!

स्वरचित --  रेणु-- 
चित्र ---- गूगल से साभार -- 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

तुम मिले कोहिनूर से -- कविता


विशेष रचना

क्षमा करना हे श्रमवीर!

औरंगबाद के दिवंगत   श्रमवीरों के नाम --        ऐसे सोये- सोते ही रहे- -- , भला! ऐसी भी क्या आँख लगी ? पहचान सके ना मौत कीआहट-   अ...