मेरी प्रिय मित्र मंडली

शनिवार, 9 मार्च 2019

उस फागुन की होली में -- कविता


जीना  चाहूँ वो लम्हे बार -बार ,
 जब तुमसे जुड़े थे मन के तार !

जाने  उसमें  क्या जादू  था   ?
 ना रहा जो खुद पे  काबू  था !
 
कभी गीत बन कर हुआ मुखर,
 हँसी में घुल  कभी गया बिखर !
 
प्राणों में मकरंद घोल गया,
 बिन कहे ही सब कुछ बोल गया !
   
इस धूल  को बना गया    चन्दन   
सुवासित , निर्मल और पावन 
 
कभी चाँद हुआ ,कभी फूल हुआ,
या चुभ  हिया की शूल हुआ !

लाल था कभी - कभी नीला,
 कभी सिंदूरी - कभी पीला !
 
कोरे मन  रंग  कर निकल गया ,
कभी   अश्रु बनकर ढुलक गया  ! 

ना खबर हुई  क्या ले गया  
क्या  भर गया खाली झोली में  ?
वो चुटकी भर..अबीर तुम्हारा
 उस फागुन की होली में !!! 
स्वरचित -- रेणु-
चित्र -- गूगल से साभार 

  

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