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गुरुवार, 5 मार्च 2020

तुम्हें बदलते देख रही हूँ

मौसम बदलते देखे थे
अब तुम्हें  बदलते देख रही हूँ
सूरज से आये थे एक दिन
साँझ सा  ढलते   देख रही हूँ !


  जिन आँखो  से पोंछ के आसूं
 मुस्कानें   भर दी थी तुमने, 
 आज उन्हीं में  फिर से   -
 सावन  उमड़ते   देख रही हूँ !

  दहल जाता है ये मन अक्सर 
 तुम्हें खो जाने के डर से,
कहीं  वीरानों  में  ना खो जाऊं
 खुद को संभलते   देख रही हूँ !

क्या वो तुम ही थे 
जिसके लिए  जान बिछाई थी? 
हवा हुए अनुबंध प्रेम के, 
घावों को रिसते  देख रही हूँ !

 मेरी पहुँच से दूर हो फिर  भी,.
अनजानी -सी ये  जिद  कैसी ?
चाँद खिलौने पर देखो - 
मनशिशु   मचलते   देख रही हूँ !!

 

विशेष रचना

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