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बुधवार, 29 मई 2019

याद तुम्हारी-- नवगीत


  
मन कंटक वन में-
 याद  तुम्हारी  -
खिली फूल सी 
 जब -ब महकी  

 हर दुविधा -
उड़ चली  धूल सी!!

 रूह से लिपटी जाय-

तनिक विलग ना होती,
  रखूं   इसे संभाल -
 जैसे सीप में मोती ;
सिमटी  इसके  बीच -
दर्द  हर चली भूल सी !!


होऊँ जरा   उदास

 मुझे  हँस बहलाए
 हो जो इसका साथ
 तो कोई साथ न  भाये -
 जाए  पल भर   ये दूर -
 हिया में चुभे शूल सी !!

 तुम नहीं हो जो पास -

 तो सही याद  तुम्हारी ,
रहूं  मगन मन  बीच -
 चढी ये अजब खुमारी ;
बना प्यार मेरा अभिमान 
 गर्व  में रही फूल सी !!
मन कंटक वन में-
 याद  तुम्हारी  -

खिली फूल सी !!!!

स्वरचित -रेणु

चित्र---गूगल से साभार --

रविवार, 26 मई 2019

अव्यवस्था के अग्नि कुण्ड में --- सूरत अग्नि काण्ड पर


Image result for भावपूर्ण श्रद्धांजली चित्र
मौसम आयेंगे  जायेंगे पर 
वे   वापस  ना आयेंगे 
 घर आँगन  में  नौनिहाल
 अब ना खिलखिलाएंगे !

 गर्म हवा से भी  न कभी 
  छूने  दिया था जिन्हें 
सोच ना था  अव्यवस्था के
 अग्नि   कुंड  उन्हें  भस्म  कर  जायेंगे !


जीने की खातिर   जिन्होंने 

  लड़ी  जंग  आखिरी दम तक 
कब वो मन की आँखों से 
 ओझल हो पायेंगे ? 

रंग हुए फीके होली के 

 खो गयी ख़ुशी दीवाली  की 
बुझे  आंगन के दीप 
कैसे जश्न मन पाएंगे  ?

हर आहट पे   होगा भ्रम  

 आँखों के तारों  के आने का 
 मानो  कहीं से  जिगर के टुकड़े 
   आ गले लग जायेंगे !!!!!!!!!!!

 अश्रुपूरित  नमन   उन  सुकुमार नौनिहालों जो जीने की  खातिर  आखिरी साँस तक लड़े !!!!!!!

शनिवार, 18 मई 2019

ना शत्रु बन प्रहार करो --कविता [ एक वृक्ष की व्यथा -]




 ना शत्रु बन प्रहार करो -
 सुनो मित्र ! निवेदन मेरा भी -
मैं मिटा तुम भी ना रहोगे -
 जुडा तुमसे यूँ जीवन मेरा भी !

  करूं श्रृंगार जब सृष्टि का मैं  -

फूल -फूल कर इठलाती
 सुयोग्य  सुत  मैं धरा    का
मुझ बिन  माँ  की फटती छाती
तुम जैसे ही ममता वश  मैं -
नहीं  कम कोई समर्पण मेरा भी !!


सदियों से पोषक हूँ  सबका  -

 कृतघ्न  बन- ना दो धोखा
निष्प्राण नही   निःशब्द हूँ मैं
कहूं कैसे अपने  मन की  व्यथा   ?
  जड़  नही चेतन हूँ  मैं
दुखता है मन मेरा भी !!

खाए ना कभी अपने फल मैंने -

न फूलों से श्रंगार किया ,
जग हित हुआ जन्म मेरा   -
पल -पल इसपे उपकार किया;
खुद तपा- बाँट छाया सबको -
  जुडा सबसे अंतर्मन  मेरा भी !!

कसता नदियों के तटबंध मैं -

 थामता   मैं ही हिमालय  को ,
जुगत मेरी  कायम रहे   सृष्टि -
महकाता मैं ही देवालय  को ;
 तुम संग बचपन में लौटूं -
 संग  गोरी खिलता यौवन मेरा भी !

स्वरचित -- रेणु
चित्र -गूगल से साभार 

बुधवार, 8 मई 2019

पथिक ! मैंने क्यों बटोरे

 
पथिक !  मैंने क्यों बटोरे   -
 नेह भरे   वो पल तुम्हारे ?
यतन कर  - कर के हारी , 
गए ना    मन से बिसारे !

कब  माँगा  था   तुम्हें 
किसी दुआ  और प्रार्थना में ?
तुम कब थे समाहित 
मेरी     मौन अराधना में ?
आ गये अपने से बन क्यों
 बंद ह्रदय के  द्वारे  ! !

हंसी- हँसी  में लिख दिए -
 दर्द संग अनुबंध मैंने ,
 थाम रखे जाने  कैसे- 
 आँसूओं के बन्ध मैंने  ;
 टीसते मन को लिए-
 संजोये   भीतर  सागर   खारे !!

क्यों उतरे मन के तट-
एक सुहानी प्यास लेकर?
अनुराग  गंध से भरे -
 अप्राप्य से मधुमास लेकर ;
क्यों ना गये राह अपनी
समेट  मधु स्वप्न सारे ! !

ना था अधिकार   क्यों  रखी    
व्यर्थ   मिलन  की चाह मैंने ?
किस आस पर निहारी
 पहरों तुम्हारी राह मैंने ?
आंचल में  क्यों  भर बैठी
 भ्रामक से चाँद सितारे !!

स्वरचित --  रेणु-- 
चित्र ---- गूगल से साभार -- 

विशेष रचना

क्षमा करना हे श्रमवीर!

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