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रविवार, 11 फ़रवरी 2018

चाँद नगर सा गाँव तुम्हारा ----- कविता ---


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चाँद नगर सा गाँव तुम्हारा
 भला ! कैसे पहुँच पाऊँगी मैं ?
 पर ''इक रोज मिलूंगी तुमसे  ''
कह जी को बहलाऊंगी मैं | !!

मौन साधना  तुम  मेरी  ,
मनमीत ! तुमसा  कहाँ   कोई प्यारा ?
मन -क्षितिज पर  स्थिर  हुआ  -
 तुम्हारी  प्रीत  का झिलमिल तारा ;
 इक पल  भी   तुम्हें  भूल भला  
कैसे  सहज जी पाऊँगी मैं ?

जगती आँखों के सपने तुम संग -
देखूं !कहाँ अधिकार मेरा ?
फिर भी  पग -पग संग आयेगा -
ये  करुणा  का उपहार मेरा ;
ले  ख्वाब  तुम्हारे आँखों में -
हर रात यूँ ही सो जाऊंगी मैं -
   

एकांत भिगोते  नयन - निर्झर -
सुनो ! मनमीत तुम्हारे हैं ,
मेरे पास कहाँ कुछ था -
सब गीत तुम्हारे हैं ;
 इस दिव्य ,  अपरिभाषित प्यार को 
रच गीतों में अमर कर जाऊंगी मैं !!

 तुम ! वाणी रूप और  शब्द रूप ,
  स्नेही मन- सखा मेरे ; 
  बांधे रखते स्नेह  -  डोर में  -
  तुम्हारे  सम्मोहन  के घेरे  ; 
थाम  इन्हें जीवन-पार कहीं -
आ तुममें  मिल जाऊंगी मैं -
चाँद नगर सा गाँव तुम्हारा - 
भला ! कैसे पहुँच पाऊँगी मैं ?

स्वरचित --रेणु चित्र --- गूगल से साभार |
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