मेरी प्रिय मित्र मंडली

सोमवार, 18 सितंबर 2017

सुनो गिलहरी --------- कविता

सुनो    गिलहरी ------------ कविता
पेड़ की फुनगी के मचान से 
क्या खूब झांकती  शान से ,
देह इकहरी काँपती ना  हाँफती
निर्भय हो घूमती  स्वाभिमान से ! 

 पूँछ उठाये ,चौकन्नी निगाहें  ,  
चल देती  जिधर मन आये 
छत , दीवार , तार या खंबा -- 
बड़ी सरल हैं तुम्हारी राहें ! 

जहाँ जी चाहे आँख मूँद सो लेती
मसला पानी है ना रोटी ;
भूख में फल पेट भर खाती
माँ की रखी कुजिया से 
झटपट पानी पी जाती ! 

घूमती डाल - डाल और पात - पात 
मलाल नहीं कोई नहीं है साथ ,
आज की चिंता ना कल की फ़िक्र  
देख लिए हैं पेड़ के सारे फल चखकर ,

फुदकती मस्ती में 
 हो बड़ी सयानी
बन बैठी हो पूरी 
बगिया की महारानी ,
सुबह  ,शाम ना देखती दुपहरी  
दुनिया में तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!! 

स्वरचित --रेणु
चित्र -- गूगल से साभार -- 

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 गूगल से साभार -- अनमोल टिप्पणी --

दुनिया मे तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!
जीवन का दर्शन, तुम जीती हर घड़ी ।
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40 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्यारी सी.गुनगुनाती रचना अंतिम पंक्तियों में सारा सार लिख दिया है।
    रेणु जी,सहज सरल एवं सुंदर रचना।

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    1. आदरणीय श्वेता जी ------- बहुत आभारी हूँ आपकी ----

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  2. पहले पढ़ी सी लग रही है. बहुत सुंदर कविता.
    शब्द नगरी पर आई है क्या?

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    1. आदरणीय अयंगर जी ---- आपने सही पहचाना ----- ये पहले आप शब्द नगरी पर पढ़ चुके हैं ----- यहाँ अपनी शब्द नगरी वाली कई रचनाएँ अपने नए पाठकों के लिए डाली हैं बहुत अच्छा लगा कि मेरी ये साधारण सी रचना आपकी समृतियों में रही | हार्दिक आभारी हूँ आपकी ------सादर |

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  3. बहुत ही सुन्दर....
    दुनिया में सबसे सुखी है गिलहरी....
    बहुत ही सुन्दर सीख देती आपकी प्रस्तुति......
    लाजवाब.....

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    1. आदरणीय सुधा जी ------ बहुत प्रेरक हैं आपके शब्द |

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  4. बाल रचनाएं लिखना दुष्कर होता है बहुत ही ... परन्तु आपने न्याय किया है इस रचना से ... बाल तो अलग बड़ों के भी मनभावन रचना है ... बहुत सुन्दर ...

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    1. आदरणीय दिगंबर जी हार्दिक आभार आपका !!!!!!!!!!!!!

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  5. उस गिलहरी के प्रति अनुराग क्यूँ न उत्पन्न हो। कठोर हधदय इस मतलबी दुनियाँ में मतलब के दोस्त होने से तो अच्छाहहै मस्त गिलहरी बन कर जिएँ सुंदर रचना हेतु बधाई आदरणीय रेणु जी।

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    1. आदरणीय पुरुषोत्तम जी ------ आपके अनमोल शब्द बहुत मनोबल बढ़ाते हैं | आभारी हूँ आपकी |

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  6. "बाल कविता - सुनी गिलहरी के माध्यम से निर्भीकता , मस्ती , स्वाभिमान और बेफ्क्रि के साथ जीवन जीने की सीख देती सुन्दर बाल कविता ।"
    आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/09/36.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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    1. आदरणीय राकेश जी ------ ''मित्र - मण्डली '' से मेरा परिचय करवाने के लिए आपकी आभारी रंहुंगी |

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  7. आदरणीय राजीव जी ------ हार्दिक स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर | रचना पढने के लिए आभारी हूँ आपकी |

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  8. गिलहरी के जीवन की गतिविधियों का बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुतिकरण आप ने किया है ! सुंदर प्रस्तुति ! बहुत खूब आदरणीया ।

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    1. आदरणीय राजेश जी ----- स्वागत है आपके अनमोल विचारों का !!!!!!!!

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  9. रेणु दी, बचपन की सुखद स्मृतियों को स्मरण करवाने वाली आपकी इस रचना में भाव ही नहीं संदेश भी है। घर के ऊपर वह बरगद का पेड़ और उससे नीचे छत पर उतर कर फुदकती गिलहरी रानी , जिसके लिए हम बच्चे दाना-पानी की व्यवस्था करते थे। दुम उठा कर फलों को खाने की इनकी कला मनभावन है। निश्चित ही इनमें हम मनुष्यों की तरह लोभ नहीं है। इनकी कर्मठता के कारण ही कक्षा दो में हमारी पाठ्य पुस्तक में कौआ-गिलहरी की यह कथा थी।जिसका यह अंश आज भी मेरी जुबान पर है
    कौआ फिर बोला तुम चलो मै आता हूँ – हरी डाल पर बैठा हूँ सुखी रोटी खाता हूँ ठंढा पानी पिता हूँ ..कावं कावं कावं ।

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    1. शशि भैया , ये मेरी पुरानी रचना है जो शब्दनगरी की बेहद लोकप्रिय रचनाओं में से एक रही है | आज इसे फिर से शेयर करने का मन हुआ , क्योकि कुछ नया लिखने में खुद को असमर्थ पा रही हूँ | गिलहरी किसको पसंद नहीं आएगी | आज के बच्चे भले इसमें कोई रूचि ना लें ,पर हमारे बचपन में हमने गिलहरियों के कौतुक खूब देखे हैं , आपको भी आज तक कक्षा दो की कविता याद है ये शायद इसी लिए कि आपके बचपन गिलहरियों से आपका बहुत स्नेहिल रिश्ता रहा |हमारे आंगन के पेड़ पे आज भी मैं कई गिलहरियों को मस्ती में फुदकते देखती हूँ | आपकी भाव्पुएँ टिप्पणी के लिए सस्नेह आभार |

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  10. वाह!सखी रेनू जी ,क्या बात है ,आपनें फुदकती गिलहरियों की याद दिला दी ,अब शहरों में इन ऊँची -ऊँची इमारतों के बीच कहीं दिखाई नहीं देती ।

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    1. प्रिय शुभा बहन , आपने सही कहा आजकल गिलहरियाँ ऊँची इमारतों में दिखाई नहीं पड़ती , पर पास के पार्क अथवा सड़कों के किनारे पेड़ों पर ये खूब नजर आ जाती हैं | हम ये जरुर कहा सकते हैं , कि हमारे पास भी इन्हें निहारने का पर्याप्त समय नहीं है | आपने रचना में रूचि लेकर इसे पढ़ा बहुत ख़ुशी हुई | सस्नेह

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  11. जी दी,
    गिलहरियाँ मुझे बेहद पसंद हैं।
    नन्ही गिलहरियों की स्फूर्ति एवं ऊर्जा मन को उत्साह से भर देती है।
    बेहद सुंदर,कोमल,सहज,निर्मल शब्दों का निश्छल प्रवाह से मन को मोहित करती प्यारी-सी कविता लिखी है आपने।
    सादर।

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    1. प्रिय श्वेता , मस्ती में अठखेलियाँ करती गिलहरियाँ किसे पसंद नहीं होगीं ? सबसे ज्यादा अनुकरणीय तो गिलहरी का जीवन दर्शन है | ना आवश्यकता से अधिक की लालसा ना किसी के साथ की चिंता | अपने आप में डूबी सम्पूर्ण जीवन जीती है गिलहरी | पुरानी रचना में तुमने फिर से रूचि दिखाई , बहुत अच्छा लगा | सस्नेह शुभकामनाएं|

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  12. फुदकती मस्ती में - हो बड़ी सयानी
    बन बैठी हो पूरी बगिया की महारानी ,
    सुबह ,शाम ना देखती दुपहरी --
    दुनिया में तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!!
    बहुत सुंदर रचना,रेणु दी।

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    1. जी ज्योति बहन , अपने रूचिपूर्वक रचना पढ़ी , बहुत अच्छा लगा | हार्दिक आभार और शुभकामनाएं |

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  13. अद्भुत... अद्भुत... अद्भुत!गिलहरी बहुत ही मासूम और प्यारा प्राणी है। बहुत अच्छा लगा, आपने इस पर लिखा।

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    1. आदरणीय सर, रचना पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार। गिलहरी पुराणों से लेकर आज तक , बच्चों, बूढों और जवान सबकी चहेती रही है। आपको रचना पसंद आई तो अच्छा लगा
      । सादर 🙏🙏🙏🙏

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  14. आदरणीया मैम,
    बहुत ही प्यारी कविता। एक और ऐसी रचना जिसका स्थान बच्चों की हिंदी पाठ्य पुस्तक में होना चाहिये। यदि ये कविता मैं ने विद्यालय में पढ़ी होती तो कितना आनंद आता। गिलहरी सच मुच एक बहुत ही प्यारी और विशेष प्राणी है। अपने अथक प्रयास और निष्ठा पूर्वक अपना योगदान दे कर प्रभु राम की सहायता करने वाली गिलहरी भगवान जी को भो बहुत प्यारी लगती है। मेरे घर के बाहर एक जामुन का पेड़ है जिसके ऊपर गिलहरियां रहती हैं। में उन्हें अपनी खिड़की से देख सकती हूँ। आज सुबह सुबह उन्हें देख देख कर आपकी कविता पढ़ी तो बहुत आनंद आया। आपका बहुत बहुत आभार और आपको सादर नमन।

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    1. प्रिय अनंता, तुम्हारी इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए मेरा प्यार बस | तुम भी अपने शब्दों में गिलहरी पर लिखो | प्रकृति और ये मासूम प्राणी हमारी सबसे बड़ी प्रेरणा है सृजन की | भोले- भाले अबोले जीवों में गिलहरी जीवटता और मनमौजीपन की सुंदर मिसाल है | इसे बीते पल का दुःख नहीं और आने वाले कल की फ़िक्र नहीं |इतनी जीवट और आशा की धनी कि रामसेतु में अपना योगदान देने चल पड़ी | भगवान् राम ने भी उसका मान बढाया और उस गिलहरी की महिमा कको हमेशा के लिए अमर कर दिया और जताया कि संसार में हर जीव अहम् है कोई एक भी व्यर्थ नहीं | खूब खुश रहो और आगे बढो |

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  15. बहुत सुन्दर ! इस बाल-गीत को बच्चों को ज़रूर सुनाया जाना चाहिए.

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    1. सादर आभार गोपेश जी | आपके स्नेहिल शब्द अनमोल हैं |

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  16. फुदकती मस्ती में - हो बड़ी सयानी
    बन बैठी हो पूरी बगिया की महारानी ,
    सुबह ,शाम ना देखती दुपहरी --
    दुनिया में तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!!
    वाह!!!
    जितनी बार पढ़ो एकदम नयी सी लगती है यह बाल कविता....
    पढ़कर गिलहरी की हर एक गतिविधि दिलोदिमाग में छा गयी
    अद्भुत ....लाजवाब..।

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    1. प्रिय सुधा जी , आपके उदगार मन को छू जाते हैं | स्नेहिल पाठक धर्म का निर्वहन करने में आपका कोई सानी नहीं | आभार और प्यार सखी |

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  17. सादर आभार और अभिनंदन ayan जी🙏🙏 💐💐

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  18. उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद अनुराधा जी, ब्लॉग पर आप
      के निरंतर सहयोग के लिए आभारी हूँ 🌹🌹

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  19. फुदकती गिलहरी
    और कविता भाव भरी
    उदास मन को भी
    जैसे सहला रही ।
    सुंदर रचना

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    उत्तर
    1. प्रिय दीदी, आपका मेरी पुरानी रचना पर आना और आपकी सुंदर काव्यात्मक प्रतिक्रिया दोनों अनमोल है। कोटि आभार आपके स्नेह का 🙏🙏🌹🌹❤❤

      हटाएं

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