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शनिवार, 8 जुलाई 2017

श्री गुरुवै नमः -------- गुरु पूर्णिमा पर विशेष -


                                                                                                              


भारत  अनंत   काल से  ऋषियों  और मनीषियों   की  पावन   भूमि रहा है  जिन्होंने  समूचे  विश्व और  भटकी  मानवता   का सदैव मार्ग प्रशस्त  कर  उन्हें  सदाचार और सच्चाई  की  राह  दिखाई   है | इसकी अध्यात्मिक   पृष्ठभूमि  ने हर  काल में  गुरुओं  के सम्मान  की    परम्परा  को  अक्षुण रखा  है |  अनादिकाल से ही     आमजन  से  लेकर अवतारों तक  के जीवन  में गुरुओं  का विशेष  महत्व रहा  है | इसी  क्रम  में  गुरुओं  के  प्रति सम्मान  व्यक्त  करने  को परमावश्यक   माना   गया  है  क्योकि  माता -  पिता  के  बाद  यदि  कोई व्यक्ति हमारे जीवन  को  संवारता  है  तो  वह  गुरु  ही  है | इसी  लिए  गुरु  को  ब्रह्म ,विष्णु  , महेश  नहीं  बल्कि  साक्षात  परमब्रह्म  की उपाधि  दी  गई  है ------
'गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा:
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।'
गुरुहमारे  भीतर  के  अन्धकार  को  मिटा वहां  ज्ञान  के  प्रकाश   को       भरते  हैं |  तभी गुरु  को  अंधकार  से  प्रकाश   की   और  ले  जाने  वाला  बताया गया  है  -- अर्थात  गु यानि  अन्धेरा  और  रु   यानि प्रकाश   | अपने  गुरुओं  की  उपासना  पर्व  के  रूप  में आषाढ़  मास  की  पूर्णिमा  को गुरु  पर्व मनाया  जाता  है|  इसे गुरु पूर्णिमा  के  नाम से  भी  जाना  जाता  है | कहते  हैं इसी   पूर्णिमा  के दिन  परम  श्रद्धेय  वेदों  के रचियता  व्यास जी  का  भारतभूमि   पर   अवतरण  हुआ  था |   उन्ही  व्यास  जी    के  नाम  पर  इस  पूर्णिमा  को  व्यास  पूर्णिमा  भी  कहा  जाता  है | भारतवर्ष में कहीं  भी  कथा  हो तो कथावाचक   के  बैठने  के  स्थान को  व्यास  पीठ  कह  कर  सम्मान दिया  जाता है | इन्ही  परम  पूजनीय वेदव्यास   जी   को  प्रथम गुरु  भी कहा  गया  क्योंकि उन्होंने  ही  पहली  बार अपने  मुखारविंद  से  वेदों की महिमा  का  बखान  कर  मानवता  को   धन्य   किया  था | वैसे  तो हर  प्रकार  के  ज्ञान  प्रदाता को  गुरु  कहा  गया  है  पर अध्यात्मिक  ज्ञान  देने  वाले  गुरु  का  जीवन में विशेष  महत्व  है  ,इसी  लिए  उन्हें  सतगुरु  कर कर  पुकारा  गया  है | हिन्दू  धर्म   ,   सिख धर्म  ,  मुस्लिम धर्म  या  फिर  ईसाई  सबमे  परम  ज्ञानी  पथ  प्रदर्शक  की  महता   को  स्वीकारा  गया  है  | गोस्वामी  तुलसीदास जी ने  तो अपनी  भक्ति , अपनी  रचनात्मकता सभी  का  श्रेय  अपने गुरु  को  दे  कर ,    अपना सर्वस्व  अपने  गुरु   के  चरणों में  अर्पण कर  उनके  प्रति अपनी परम  आस्था  को दर्शाया  है  | वे  गुरु  को  कृपा  का सागर और  भगवान् का  मानव  रूप  बताते  हुए  उनके  चरणों  में   वंदना  करते  लिखते  हैं  -------
बदौं गुरु  पद कंज --कृपा  सिन्धु  नर  रूप  हरि |
महा मोह  तम  पुंज , जासु  वचन  रवि  कर  निकर | |
उन्होंने  अपने  रचना  संसार  में  हर  कहीं गुरु को   असीम  महत्व  दे  कर  अपनी  श्रद्धा  उन्हें समर्पित  की  है |सूरदास जी    भी  गुरु  की  महिमा  का बखान कर  लिखते  हैं ---
सब्दहिं-सब्द भयो  उजियारो -- सतगुरु  भेद बतायो |
ज्यौ  कुरंग  नाभि  कस्तूरी  , ढूंढत   फिरत   भुलायो ||
सहजो  बाई  कहती  हैं  -------
राम तजूं  गुरु  ना  बिसारूँ  ------ गुरु के  सम  हरिको  ना  निहारूं | अर्थात   भले  ही   हरि को तजना  पड़े  पर  गुरु को  कभी  नहीं   भुलूं   और  गुरु के  जैसे  हरि  को   कभी  ना  निहारूं  |  मीरा बाई  ने  भी हरि  धन  की प्राप्ति  का   श्रेय  अपने  गुरु  रविदास  जी  को  दिया  ; वे  कह  उठी --------
पायो  जी  मैंने  राम  रतन  धन  पायो
वस्तु  अमोलक  दई  मोरे -  सतगुर  किरपा  कर  अपनायो  | अर्थात  मैंने  राम  के नाम का धन  पा  लिया  है  |   मेरे  सतगुरु  ने  कृपा  करी है जो     मुझे   अपनाकर ये  अनमोल   वस्तु  मुझे  दी  है |
सिख  धर्म  में  तो गुरुओं को सर्वोच्च   स्थान  दिया  गया है  क्योकि  गुरु नानकदेव  जी  ने सिख  धर्म  की नींव  रखी  तो  उनके  बाद  अगले  नौ  गुरुओं  ने सिख  धर्म में  गुरु  परम्परा   को  कायम   रख  इसे   आगे  बढाया  |  पर  दसवें  गुरु  गोविन्द  सिंह  जी ने    सिखोंको  गुरुओं  के स्थान  पर गुरबाणी युक्त पुस्तक  ग्रंथ  साहिब  को  ही   गुरु  का  दर्जा  दे  उसे   अपने  जीवन  में  अपनाने  की  सीख  दी | तब  से  सिख  धर्म  में  ग्रन्थ  साहिब को  गुरु   ग्रंथ  साहिब कहकर   पुकारा  जाता  है   और  इसमें  संग्रहित  अनेक  गुरुओं  की  पवित्र   वाणी  को  सुनना  सभी सिख   अपना सौभाग्य  मानते  हैं  |
 भगवान् श्री  कृष्ण  ओर  श्री  राम  ने  भी  अपने   जीवन  में  गुरुओं   के  सानिध्य में    अध्यात्मिक   ज्ञान प्राप्त  कर   सदमार्ग पर  चलने  की  प्रेरणा  ली | उन्होंने  गुरु को  अपने ह्रदय  में  धारण   कर  उनके  अधीन   रहने  में  जीवन  को  सार्थक  माना | गुरु  के  चरणों  की  सेवा  को  अपना  पूजा  का  मूल  माना |  माना  कि  मोक्ष  का  मूल गुरु की कृपा   का  मिलना  है  उसके  बिना  मोक्ष  मिलना असम्भव  है  |  बिना  गुरु  कृपा  के  जीव  भव सागर  से पार  नहीं  हो  सकता | उन्ही  की  परम  कृपा से  जीवन में  दिव्यता  और   चेतनता  आती  है  | तभी  तो कहा  गया  है  -------------
गुरु  गोविन्द  दोउ  खड़े  काकें   लागूं  पांव ,
बलिहारी  गुरु  आपने  जिन  गोविन्द  दियो  मिलाय||
अर्थात  गुरु  और  भगवान्  दोनों  खड़ें हैं --  किसके  पांव  लगूं?  मैं  तो  अपने  गुरु  पर    बलिहारी  जाऊँ  जिसने    भगवान् से  मुझे  मिलवा  दिया  है | संक्षेप  में  वेदांत  अनेक  हैं संदेह  भी  बहुत  है  और  जानने  योग्य  आत्म  तत्व   भी  अति  सूक्षम  है   पर गुरु  के  बिना  मानव  उन्हें  कभी  जान  नहीं   पाता | वेदों ,उपनिषदों में वर्णित  परमात्मा  का  रहस्य रूप   या  ब्रह्म ज्ञान  हमें  गुरु  ही दे सकते  है  | आज  इन्ही  गुरु जनों  की  उपासना  और  वंदना  का   पावन   दिन  है,   जिसे हम  उनके   पवित्र ज्ञान  का अनुसरण  कर  सार्थक  कर  सकते  हैं -- सभी  को  इस  पावन  दिवस  की  हार्दिक  शुभकामनाएं |

27 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना रेणु जी, आपके सुंदर विचार और लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
    धन्यवाद आपका।

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    1. आदरणीय श्वेता जी -- अपने ब्लॉग की पहली रचना पर उत्साहवर्धन करती आपकी पहली टिप्पणी से अभिभूत हूँ आपकी हार्दिक आभार --आशा है भविष्य में भी आपका सहयोग मिलता रहेगा --

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  2. गुरु पूर्णिमा पर सार्थक लेख.

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    1. आदरणीय विनोद जी सादर व सस्नेह आभार आपका जो आप ब्लॉग पर पधारे ------

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 10 जुलाई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

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  4. तस्मै श्री गुरुवे नमः
    सादर

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  5. गुरु पूर्णिमा पर विशेष सारगर्भित आलेख. ब्लॉगिंग की दुनिया में आदरणीय रेणु जी का हार्दिक स्वागत है. रेणु जी अपनी समीक्षक,मोहक टिप्पणियों के साथ ब्लॉगिंग की दुनिया में अपना परिचय दे चुकी थी, अब ब्लॉग के साथ आई हैं. बधाई रेणु जी.

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    1. आदरणीय रवीन्द्र जी -- आपके भाव भीने शब्दों से अभिभूत हूँ -- अगर आप जैसे स्नेहीजन और उत्साहवर्धन करने वाले सुधिजन ना होते तो शायद रचना संसार में मेरा कोई महत्व ना होता |आपका ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है और आभार तो शायद बहुत छोटा शब्द है ----------

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    1. स्वागत है आपका आदरणीय सुधा जी और हार्दिक आभार कि आपने लेख पढ़ा --

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  7. बहुत सुंदर लेख । बधाई आदरणीया ।

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    1. आदरणीय राजेश जी मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है बहुत आभार लेख पढने के लिए --

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  8. शुभ संध्या रेणु बहन..
    एक बार फिर आई हूँ यहाँ
    जहाँ पर कुछ भी लिखने के लिए
    शब्दों का अभाव पाती हूँ....
    बस.. नमस्कार कर देती हूँ
    शब्द नगरी में मैं भी हूँ..
    पर तपस्थली नहीं बना पाई यहाँ
    सादर

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    1. आदरणीय यशोदा जी -- सस्नेह अभिवादन | आपका ब्लॉग पर दो बार आना मेरा सौभाग्य है | अभिभूत हूँ कि आपने मेरी छोटी सी कोशिश को सराहा अन्यथा गुरु -वंदन की क्षमता मेरी साधारण लेखनी में कहाँ ? गुरुजनों , ऋषियों , मनीषियों ने आदिकाल से ही अपनी अध्यात्मिक चिंतान की संपदा से देवभूमि भारत को संपन्न रखा है और मानवता के प्रति समभाव की उद्दात विचारधारा को विकसित कर इसे विश्व में अलग पहचान दिलाई है | गुरु अंतस के तम से अनंत उजास देने वाले तत्वदर्शी का नाम है जिनकी महिमा अनंत है | आपके स्नेहासिक्त संदेशों के लिए आपका हार्दिक आभार | शब्दनगरी में मैं कुछ ही महीने पहले आई थी और वहां से ही ब्लॉग की प्रेरणा मिली , आज प्रथम पोस्ट पर ही सबके प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभारी हूँ |

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  9. बहुत अच्छा आलेख रेणु जी

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    1. आदरणीय मीना जी लेख का मर्म समझने के आभार आपका और स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर

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  10. बहुत सुन्दर आलेख पसंद आया रेनू जी

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय संजय जी और आपका स्वागत है मेरे ब्लॉग पर |

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. आइये , आपके ब्लॉग के इस श्री गणेश पाठ को हम गुरु-शिष्य के समवेत औपनिषदिक स्वर से अभिमंत्रित करें:-
    "सः नौ अवतु,
    सः नौ भुनक्तु,
    सः वीर्यं करवावहैI
    तेजस्वी नवधीतमस्तु,
    मा विद्विषावहैII "

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    1. आदरणीय विश्वमोहन जी आपके मंत्रोचारण के स्वर मन को अभिभूत कर रहे है -- आभार आपका

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    2. हार्दिक स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर -----

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  13. गुरु पूर्णिमा पे गुरु की महिमा को नमन है ... गुरु ही सच्चा मार्ग दिखाता है इस भाव को बाखूबी रखा है आपने ... बहुत बधाई इस आलेख पर ...

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    1. आदरनीय दिगंबर जी आपका मेरे ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है -- रचना के मर्म को समझने के लिए आपका आभार ---------

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  14. बहुत सुंदर सार्थक लेख..

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    1. आदरणीय पम्मी जी हार्दिक स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर --- बहुत खुश हूँ कि आपने लेख पढ़ा --

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  15. गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा:
    गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।'

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