
क्या तुमसे लिखूँ परिचय मेरा ?
तुम पावन स्नेह प्रश्रय मेरा !!
कब स्वर में मुखरित हो पाते हो !
शब्दों में कहाँ समाते हो ?
मैं हँसूं , हँसी में हँस जाते
बन घन नैना छलकाते हो !
सपनों से भर जाते कैसे
ये सूना -सा ,पलक- निलय मेरा !!
क्यों विकल कर जाता मन को
अरूप , अनाम सा ये नाता ?
जैसे भाये तुम अनायास
कहाँ यूँ मन को कोई भाता ?
पा तुम्हें सब कुछ भूल गया है
बौराया ह्रदय मेरा !!
पुलकित सी इस प्रीत - प्रांगण में
हो कर निर्भय मैं विचरूँ ?भर विस्मय में तुम्हें निहारूं
रज बन पथ में बिखरूं ;
हुई खुद से अपरिचित सी मैं -
यूँ तुझमें हुआ विलय मेरा !!
क्या तुमसे लिखूँ परिचय मेरा ?
तुम पावन स्नेह प्रश्रय मेरा !!!
चित्र और विषय -- पांच लिंकों से साभार |
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तुम पावन स्नेह प्रश्रय मेरा !!!
चित्र और विषय -- पांच लिंकों से साभार |
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आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवार (20-08-2018) को "आपस में मतभेद" (चर्चा अंक-3069) पर भी होगी!
जवाब देंहटाएं--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आदरनीय सर -- आपका अतुलनीय सहयोग अविस्मरनीय है | सादर आभार और नमन |
हटाएंजी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक २० अगस्त २०१८ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।
प्रिय श्वेता -- सस्नेह आभार आपका |
हटाएंबहुत भावप्रवण रचना! कुछ प्रभावोत्पादक शब्द "पलक - निलय"
जवाब देंहटाएंशानदार!
आदरणीय सर -- आपका हार्दिक स्वागत है मेरे ब्लॉग पर | आपके सराहना भरे शब्दों के लिए बहुत आभारी हूँ | सादर --
हटाएंबेहद खूबसूरत रचना
जवाब देंहटाएंसस्नेह आभार प्रिय अनुराधा जी |
हटाएंआपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/08/83.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंसादर आभार आदरणीय राकेश जी |
हटाएंजय मां हाटेशवरी...
जवाब देंहटाएंअनेक रचनाएं पढ़ी...
पर आप की रचना पसंद आयी...
हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
इस लिये आप की रचना...
दिनांक 21/08/2018
को
पांच लिंकों का आनंद
पर लिंक की गयी है...
इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।
आदरणीय कुलदीप जी --आपके सहयोग के लिए सादर आभार |
हटाएंकब स्वर में मुखरित हो पाते हो
जवाब देंहटाएंशब्दों में कहाँ समाते हो ?-
मैं हसूं- हंसी में हंस जाते -
बन घन नैना छलकाते हो
गज़ब बहुत ही लाज़वाब कविता लिखी हैं.
जिसका ही सब कुछ हैं जिसके लिए ही सब हैंउसको हम क्या परिचय दे ?
कौन से शब्द अर्पित करे जिससे उसे व्यक्त कर सके।
प्रिय जफर जी -- सबसे पहले स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर | आप जैसे भावों के मर्मज्ञ और कुशल रचनाकार द्वारा रचना का विशलेषण करना मेरा सौभाग्य है | आपने रचना के अंतर्निहित मर्म को पहचाना, मेरा लिखना सफल हुआ | सस्नेह आभार आपका |
हटाएंबढ़िया
जवाब देंहटाएंपिय सुमन जी --सस्नेह आभार और स्वागत मेरे ब्लॉग पर |
हटाएंभावों को शब्दों मे गूंथ कर निश्छल समर्पित प्रेम को इतना सुन्दर स्वरूप देना!! जैसे किसी निरव मंदिर मे कोई चिराग पूर्ण श्रृदा से अपने आराध्य के द्वार पर प्रज्वलित हो रहा हो।
जवाब देंहटाएंआलोकिक बहन रेनू जी
प्रिय कुसुम बहन -- रचना के मर्म तक पहुंच उसकी विषय - वस्तु की सटीक व्याख्या कर आपने रचना पर अपार संतोष की अनुभूति दी है | सस्नेह आभार और मेरा प्यार |
हटाएंबहुत सुन्दर ...
जवाब देंहटाएंजब विलय हो जाये हर पल, हस लम्हे, कण कण का तो क्या परिचय किसका परिचय ...
प्रेम जब एक हो तो दो परिचय तो संभव नहीं ... दो मिटकर ही तो एक प्रेम बनता है ...
गहरी अभिव्यक्ति ... निश्छल प्रेम की अभिव्यक्ति ...
आदरणीय दिगम्बर जी -- आपका ब्लॉग पर आकर उत्साहवर्धन करना अपार सुकून की अनुभूति करवाता है | सादर आभार आपका |
हटाएंक्या लिखूं तुमसे परिचय मेरा ?
जवाब देंहटाएंतुम पावन स्नेह प्रश्रय मेरा !!....
मन के भावों को सुंदर एहसासों में पिरोकर,लिखी गई यह रचना अन्तस्थ को छू गई । बहुत सारी शुभकामनाएं आदरणीय रेणु जी।
आदरनीय पुरुषोत्तम जी -- बहुत दिनों के बाद आपको अपने व्लोग पर देखकर अपार हर्ष हुआ |इस प्रेरक सराहना के लिए | आपका सादर आभार |
हटाएंवाह !!! बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा लिखा आप ने 🙏🙏🙏
प्रिय नीतू जी - सस्नेह आभार आपका |
हटाएं
जवाब देंहटाएंक्यों विकल करजाता मन को
अरूप , अनाम सा ये नाता
जैसे भाये तुम अनायास
कहाँ यूँ मन कोकोई भाता ?
पा तुम्हे सब भूल गया है -
बौराया ह्रदय मेरा !!
जी रेणु दी इस सुंदर रचना में बहुत कुछ बातें छिपी भी है और प्रकट भी है।
प्रिय शशि भाई-- आपकी सूक्ष्म विश्लेषणात्मक समीक्षा बहुत प्रेरक है | सस्नेह आभार आपका |
हटाएंप्रिय अमित --आप जैसे सजग और स्नेही पाठक की सराहना बहुत प्रेरक है | सस्नेह आभार आपका |
जवाब देंहटाएंपुलकित सी इस प्रीत - प्रांगण में
जवाब देंहटाएंहो कर निर्भय मैं विचरूं,
भर विस्मय में तुम्हे निहारूं -
रज बन पथ में बिखरूं ;
हुई खुद से अपरिचित सी मैं -
यूँ तुझमे हुआ विलय मेरा !! .... बहुत सुंदर रचना रेनू जी , बधाई
आदरणीय वन्दना जी -- आपने ब्लॉग पर आकर हमेशा की तरह मेरा मान बढ़ाया | सादर आभार आपका |
हटाएंहर पंक्ति मन को स्पर्श करती हूं
जवाब देंहटाएंबहुत ही भावप्रवण रचना
आदरणीय लोकेश जी ---आपका निरंतर सहयोग बहुत मनोबल बढाता है | सादर आभार |
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