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शुक्रवार, 2 मार्च 2018

उदासियों के बियाबान ---कविता


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अगर मिलो  किसी मोड़ पर यूँ ही -
 उदास हंसी  से  लेना जान तुम -
हों   मौन अधर और पलकें नम-
मैं वही हूँ  -जाना    पहचान तुम !

दामन तुम्हारा ना भिगो पाएंगे -
 कभी ये आँखों के सावन  मेरे ,
दूर होकर भी  पास रहना -
 बन मथुरा ,काशी  वृन्दावन मेरे ;
 किसे  बताऊं  मैं?कोई कहाँ समझ पायेगा ?
मेरे भीतर ही बसना  -बन मेरे भगवान् तुम !!

 एकांत  बने कब  साथी मेरे -
क्यों ये दर्द  है  नियति मेरी ?
पूछना मत  ! उजालों से दूर -
क्यों  है  अंधेरों से प्रीति मेरी ; 
 पैर न रखना   इनमे उलझ कर रह जाओगे
 झाँकने  ना आना- मेरी उदासियों के बियाबान तुम  !1
  
ना करूं  जतन    मिलने   का तुमसे   -
ना कोई  दुआ-  मनमीत मैं  ,
 तुम्हारी  यादों  में  गुम रहूं बस  -  
नित  रचूं  तुम्हारे  गीत  मैं  ;
 पर आस का एक पंछी   मंडराता मन  की मुंडेर पे  -
क्या पता?   आ  कहीं से -कर दो मुझे हैरान तुम !!!!!!!!!!!!! 


चित्र ----- गूगल से साभार 

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51 टिप्‍पणियां:

  1. विरह की आग में तपते हृदय की करुण वाणी और किसी चकोर की अनबुझ प्यास लिए ये रचना मन को झकझोर गई:
    अगर मिलो किसी मोड़ पर यूँ ही -
    मेरी उदास हंसी से लेना जान तुम -
    हों मौन अधर और पलकें नम-
    मैं वही हूँ -जाना मुझे पहचान तुम !
    शब्दों संग भावों का बेहतरीन संयोजन बहुत की सुंदर बन उभड़ आया है।
    पर आस का एक पंछी मंडराता मन की मुंडेर पे -
    क्या पता? आ कहीं से -कर दो मुझे हैरान तुम !!
    पुनः बधाई.....

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    1. आदरणीय पुरुषोत्तम जी ----- रचना पर आपका विस्तृत चिंतन ने मेरा उत्साहवर्धन किया है | आपके शब्द अनमोल है | इनके लिए कोई आभार पर्याप्त नहीं | ऋणी हूँ आपकी | बस सादर नमन |

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  2. अंधेरे से कर प्रिति उजाले सब दे दिये
    अब न ढूंढना उजालो मे हमे
    हम मिलेंगे सुरमई शाम के घेरों मे
    वाह सखी विरह का ऐसा आलाप की जैसे नयन बदरिया बस छलकी छलकी ।
    अप्रतिम रचना

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    उत्तर
    1. प्रिय कुसुमजी आपकी काव्यात्मक टिप्पणी ने मेरी रचना की शोभा तो बढाई ही है साथ ही मेरी रचना के अधूरेपन को पूरा कर दिया | आपने वो कह दिया जो मैं ना लिख पाई |आपकी सराहना ने मनोबल बढाया है | सादर आभार बहना |

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  3. वाह 👏 खूबसूरत अप्रतिम विरह गीत.
    दामन तुम्हारा ना भिगो पाएंगे -
     कभी ये आँखों के सावन  मेरे ,
    बहुत खूबसूरत भाव

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  4. उदासियो का बियाबान.. विरह में बहते नयन.. अंतस में बिलखते शब्द...सारा कुछ आपने उड़ेल दिया इस रचना में..मन आहत सा हो उठा... बेहतरीन लिखा आपने परिस्थितियां लग रही है सामने है... अच्छी प्रस्तुति दी...

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    1. प्रिय अनु -- किसी की अंतर्व्यथा को मैंने अपने शब्द देने का प्रयास किया क्योकि नारी मन की वेदना एक जैसी ही होती है | मेरी विदुषी बहनों की सराहना ने मेरे इस प्रयास को सार्थक कर दिया है | रचना पर व्यापक चिंतन के लिए सस्नेह आभार आपका |

      हटाएं
  5. बहुत ही सुंदर विरही वेदना की प्रस्तुति

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    उत्तर
    1. आदरणीय बड़े भ्राता -- सादर आभार | आपको अपने ब्लॉग पर देख अत्यंत ख़ुशी हुई | स्नेह बनाये रखिये |

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  6. सुन्दर रचना विरही वेदना की 👌👌👌😥😥

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  7. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक ५ मार्च २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय श्वेता जी सहयोग के लिए सस्नेह आभार |

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  8. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ०५ मार्च २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' ०५ मार्च २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने सोमवारीय साप्ताहिक अंक में आदरणीय विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' जी से आपका परिचय करवाने जा रहा है।

    अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय ध्रुव-- आपका सहयोग अविस्मरनीय है | सस्नेह आभार |

      हटाएं
  9. एकांत बने कब साथी मेरे -
    क्यों ये दर्द है नियति मेरी ?
    पूछना मत ! उजालों से दूर -
    क्यों हुई अंधेरों से प्रीति मेरी ;
    विरह की वेदना पर अति सुन्दर रचना आपकी
    वाह!!!!
    मेरे भीतर ही बसना बन मेरे भगवान तुम
    बहुत लाजवाब...

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    उत्तर
    1. आदरणीय सुधा जी -- आपके उत्साहवर्धक शब्द अनमोल हैं | हमेशा मेरा मनोबल उंचा करते है | सादर आभार और नमन |

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  10. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/03/59.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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    उत्तर
    1. आदरणीय राकेश जी -- आप के सहयोग के लिए सादर आभार |

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  11. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति ।

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  12. इश्वर ... या कहूं तो प्रेम जरूर आता है अचंभित करने ... हर पल जो साथ रहता है पर दीखता नहीं इस संवेदनशील मन में ...
    इन उदासियों के बियाबान को कब वो संदल के बागों में बदल देगा पता नहीं चलेगा ... बस हाथ रहना चाहिए उस बंसी का ... दिल को छूते हुए शब्द हैं इस रचना के ... लाजवाब ...

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    उत्तर
    1. आदरणीय दिगम्बर जी ----- आपकी रचना पर इस अध्यात्मिक विवेचना के लिए लिखे आपके शब्दों के लिए कोई आभार नहीं हो सकता | ये शब्द अनमोल और आशा भरे हैं | बस सादर नमन |

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  13. इतनी अंतस भावनाएँ कि शब्द कम पड़ रहे
    बहुत खुबसूरत रचना।

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    1. प्रिय पम्मी जी -- बहुत आभारी हूँ आपकी इन अनमोल शब्दों के लिए |

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  14. अंतस के तड़प की तीव्र अभिव्यक्ति,रूहानी रौ में!! बधाई सुन्दर रचना की!!!

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    1. आदरणीय विश्वमोहन जी ------ सादर आभार आपका |

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  15. "ना करूं जतन मिलने का तुमसे -
    ना कोई ऐसी दुआ- मनमीत मैं ,
    तुम्हारी यादों में गुम रहूं बस -
    नित रचूं तुम्हारे गीत मैं ;"

    बेहतरीन अभिव्यक्ति....., अत्यन्त सुन्दर सृजन .

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  16. दामन तुम्हारा ना भिगो पाएंगे -
    कभी ये आँखों के सावन मेरे ,
    दूर होकर भी पास रहना -
    बन मथुरा ,काशी वृन्दावन मेरे
    सुंदर पंक्तियों से सजी सुंदर कविता.

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    उत्तर
    1. आदरणीय राजीव जी ----- सादर आभार आपका इन उत्साहवर्धक शब्दों के लिए | |

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  17. एकांत बने कब साथी मेरे-
    क्यों ये दर्द है नियति मेरी?
    पूछना मत! उजालों से दूर-
    क्यों हुई अंधेरों से प्रीति मेरी;

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ सुन्दर रचना।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आदरणीय सर ----- आपका अपने ब्लॉग पर हार्दिक अभिनन्दन करती हूँ | आपने मेरी रचना पढ़कर मुझे धन्य किया | कोटिश आभार और नमन |

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  18. उत्तर
    1. प्रिय रोली जी -- स्वागत है मेरे ब्लॉग पर और रचना पढने के लिए सादर आभार |

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  19. अत्यंत ही ह्रदयस्पर्शी रचना।

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    उत्तर

    1. ना करूं जतन मिलने का तुमसे -
      ना कोई ऐसी दुआ- मनमीत मैं ,
      तुम्हारी यादों में गुम रहूं बस -
      नित रचूं तुम्हारे गीत मैं ;
      पर आस का एक पंछी मंडराता मन की मुंडेर पे -
      क्या पता? आ कहीं से -कर दो मुझे हैरान तुम !
      प्रिय रेणु बहन ! अंतिम छंद इस रचना की जान है । कई बार पढ़ा है मैंने आपकी इस रचना को....मन के अंदर गहरे उतरते हुए शब्द !!! बधाई ।

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    2. प्रिय मीना बहन -- आपके सरना भरे शब्दों ने मेरा मनोबल बढाया है | सस्नेह आभार आपका |

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    3. प्रिय सोनू जी -- सादर आभार आपका |

      हटाएं
  20. एकांत बने कब साथी मेरे-
    क्यों ये दर्द है नियति मेरी?
    गंभीर संवेदनशील प्रश्न.....बहुत सुंदर :)

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    1. प्रिय संजय जी --- सस्नेह आभार आपका | बहुत ख़ुशी हुई अरसे बाद आपको अपने ब्लॉग पर देखकर |

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  21. शानदार ...हर बार की तरह ...

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  22. मन के कोमल अहसासों की बहुत ही मीठी सी अभिव्यक्ति ! अति सुन्दर रेनू जी !

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  23. 👌👌👌👏👏👏
    .
    कुछ भी कह पाने के लिए शब्द नहीं मिल रहे हैं। और कुछ कहना मतलब सूरज को दीया दिखाना।
    .
    झाँकने ना आना मेरी उदासियों के बियाबान तुम !!...
    इस पंक्ति पर मेरी, सारी साहित्य साधना समर्पित है...🙏🙏🙏

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    उत्तर
    1. प्रिय अमित -- आपके अत्यंत स्नेहासिक्त शब्दों से मेरी रचना को चार चाँद लगे हैं |आपको रचना पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ | सस्नेह आभार |

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  24. Kusum Kothari's profile photo
    Kusum Kothari
    अप्रतिम विरह की उदासी।
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    Harsh Wardhan Jog's profile photo
    Harsh Wardhan Jog
    क्या पता हैरान कर दो - उम्मीद बनाए रखें!
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    Renu's profile photo
    Renu
    +Kusum Kothari जी बहुत आभारी हूँ बहना |

    Renu's profile photo
    Renu
    +Harsh Wardhan Jog जी सादर आभार आपका |

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  25. बहुत भावपूर्ण कविता है यह रेणु जी आपकी | अंतिम पंक्तियां तो कभी न भुलाई जा सकने वाली हैं | क्या पता? आ कहीं से - कर दो मुझे हैरान तुम | बहुत खूब !

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    उत्तर
    1. हार्दिक आभार जितेन्द्र जी | आपको रचना अच्छी लगी , लिखना सार्थक हुआ | विलंबित प्रतिउत्तर के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ | पुनः आभार |

      हटाएं

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