मेरी प्रिय मित्र मंडली

सोमवार, 5 दिसंबर 2022

प्रेम

 

प्रेम तू सबसे न्यारा .
कहाँ तुझसा कोई प्यारा!

शब्दातीत, कालातीत, 
ज्ञानातीत तू ही! 
इश्क मुर्शिद का तुझसे,
राधा की प्रीत तू ही !
चमक  रहा कब से क्षितिज पे 
बनकर ध्रुव तारा!

मीठा ना  तुझसा छ्न्द कोई.
ना  बाँध सके अनुबंध कोई!
उन्मुक्त गगन के पाखी-सा ,
सह सकता नहीं प्रतिबंध कोई 
 कोई रोके,रोक ना पाये 
 तोड़  निकले हर इक कारा!

आन मिले अनजान पथिक-सा  
साथ चल दे जाने किसके .
अरूप और अदृश्य तू ,
नहीं आता सबके हिस्से !
विरह के आनंद  में बह जाता   
बन कर अंसुवन धारा  !


चित्र -पाँच लिंक से साभार  


45 टिप्‍पणियां:

  1. आन मिले अनजान पथिक-सा
    साथ चल दे जाने किसके .
    अरूप और अदृश्य तू ,
    नहीं आता सबके हिस्से !
    विरह के आनंद में बह जाता
    बन कर अंसुवन धारा !....
    प्रिय रेणु, प्रेम की दो अवस्थाएँ जैसे चित्र में दिखाई गई हैं, उनसे आपकी कविता ने संपूर्ण न्याय किया है। मैंने भी इसी चित्र को देखकर कल कुछ लिखने की कोशिश की थी परंतु लिखना कुछ था और लिखा कुछ और !!!
    प्रेम के सुकोमल, सरल, सहज रूप को चित्रित करती मन छू जानेवाली कविता। बहुत सारा स्नेह आपको।

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    1. प्रिय मीना, आपकी प्रतिक्रिया से अपार हर्ष हुआ।अनायास लिखा गया और मन यहाँ प्रकाशित करने का हो आया।हर किसी के अपने भाव होते हैं।आपसे मेरा आग्रह है कि आप वो रचना अवश्य पूरी करें।हार्दिक आभार और प्यार ♥️

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  2. उत्तर
    1. हार्दिक आभार है आपका।कृपया अपना नाम भी लिखें ताकि मैं अपने प्रिय पाठक के बारे में कुछ जान सकूँ।

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  3. चित्र के भावों को शब्दों में उतार दिया है । प्रेम किसी बंधन को स्वीकार नहीं करता , अपनी राह बनाता जाता है भले ही किसी और की राह अवरुद्ध हो जाये ।
    लाजवाब सृजन ।

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    1. आपकी प्रतिक्रिया से सन्तोष हुआ प्रिय दीदी।हार्दिक आभार और प्रणाम 🙏🙏

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  4. व्वाहहहहहहहहहह
    शानदार भाव दे दिया आपने चित्र को
    इस अफगानीस्तानी चित्र के दिन बदल गए
    आभार

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    1. आपकी वाह मेरा सौभाग्य है।हार्दिक आभार और प्रणाम प्रिय दीदी 🙏🙏

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  5. विरह के आनंद में ....
    अद्भुत। .... बहुत सुन्दर भाव
    जय श्री कृष्ण जी !

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    1. ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है तरुण जी।राधे-राधे 🙏🙏

      हटाएं
  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ दिसंबर २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  7. आन मिले अनजान पथिक-सा
    साथ चल दे जाने किसके .
    अरूप और अदृश्य तू ,
    नहीं आता सबके हिस्से !
    विरह के आनंद में बह जाता
    बन कर अंसुवन धारा !
    वाह!!!
    चित्राभिव्यक्ति कमाल की है रेणु जी ! इस चित्र पर इससे बे तर और क्या लिखा जा सकता है , निःशब्द हूँ मै तो आपकी रचना से...
    लाजवाब बस लाजवाब।

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    1. विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ प्रिय सुधा जी 🌹🌹

      हटाएं
  8. मीठा ना तुझसा छ्न्द कोई.
    ना बाँध सके अनुबंध कोई!
    उन्मुक्त गगन के पाखी-सा ,
    सह सकता नहीं प्रतिबंध कोई
    प्रेम के स्वरूप को परिभाषित करती अत्यंत सुन्दर कृति । लाजवाब चित्राभिव्यक्ति प्रिय रेणु जी !

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    उत्तर
    1. विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ मीना जी।🙏🌹

      हटाएं
  9. आन मिले अनजान पथिक-सा
    साथ चल दे जाने किसके .
    अरूप और अदृश्य तू ,
    नहीं आता सबके हिस्से !


    सही कहा "सबके हिस्से कहां आता है ये"
    और "प्रेम" की अभिव्यक्ति इतने सरल और सहज शब्दों में तुमसे अच्छा कोई कर भी नहीं सकता सखी, हमेशा की तरह लाजबाव सृजन

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    उत्तर
    1. सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ प्रिय सखी🌺🌹🌹❤

      हटाएं
  10. वाह! रेणु बहन प्रेम जैसे अबूझ तत्व को अपने सहजता से भावना की डोरी में मोतियों सा पिरोया है।
    हृदय को आलोडित करता सुंदर सार्थक सृजन।
    बस अहा!!
    सस्नेह।

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  11. वाह!प्रिय सखी रेणु ,बहुत खूबसूरत सृजन ।

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  12. आपकी लिखी कोई रचना सोमवार 19 दिसंबर 2022 को
    पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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  13. आत्मिक प्रेम की आभा बिखराता सुंदर सृजन

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  14. प्रिय रेणु दी, चित्र देख कर उस पर अपने भाव प्रगट करना एक असाध्य सा कार्य है। आपने इस कार्य को बहुत ही खूबसूरती से अंजाम दिया है। प्रेम के8 अभिव्यक्ति बहुत ही सरल और सुंदर शब्दो मे की है आपने। बहुत बढ़िया दी।

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    उत्तर
    1. आपके प्रेरक शब्दों के लिए आभार आपका प्रिय ज्योति जी 🙏🌹

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  15. दिगम्बर नासवा23 दिसंबर 2022 को 6:01 pm बजे

    प्रेम तो शाश्वत है रहता है किसी न किसी रूप में …
    ये है तो बहता समीर है, साँस है …
    बखूबी प्रेम में इस आलौकिक संसार को शब्दों में बांधा है आपने …

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  16. किसी भी चित्र को देखने के पश्चात मन में कोई न कोई भाव हर किसी को आते हैं, पर उनको शब्दों में पिरोना आसान नहीं। आपने अनोखे शब्दों से इस चित्र को काव्य में पिरो दिया।
    लाजवाब सृजन !!

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  17. प्रभावी अभिव्यक्ति, बधाई आपको

    जवाब देंहटाएं
  18. शब्दातीत, कालातीत,
    ज्ञानातीत तू ही!
    इश्क मुर्शिद का तुझसे,
    राधा की प्रीत तू ही !
    चमक रहा कब से क्षितिज पे
    बनकर ध्रुव तारा!
    . जितना सुंदर गीत, उतना ही सुंदर शब्द शौष्ठव और भाव है।
    चित्र पर बेहतरीन भावाभिव्यक्ति है, चित्र पर लिखना आपके गहन अवलोकन और अनुभूति को दर्शाता है, जिसमें आप सफ़ल रही हैं ,बहुत सुंदर सार्थक रचना के लिए बधाई।
    नव वर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई प्रिय सखी 🌹🌹❤️❤️

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    उत्तर
    1. आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ प्रिय जिज्ञासा जी 🌹🌹

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  19. आन मिले अनजान पथिक-सा
    साथ चल दे जाने किसके .
    अरूप और अदृश्य तू ,
    नहीं आता सबके हिस्से !
    अदृश्य और अरूप, प्रेम का सच्चिदानंद स्वरुप! वाह!!! अप्रतिम और पूज्य भाव। नमन!!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक आभार और प्रणाम आदरणीय विश्वमोहन जी 🙏🙏

      हटाएं

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