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शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

क्या दूँ प्रिय उपहार तुम्हें?



प्रिय क्या दूँ उपहार तुम्हें ?
 जब सर्वस्व पे है अधिकार तुम्हें!
मेरी हर प्रार्थना में तुम हो,
निर्मल अभ्यर्थना में तुम हो!
तुम्हें समर्पित हर प्रण मेरा,
माना जीवन आधार तुम्हें!
मुझमें -तुझमें क्या अंतर अब!
 कहां भिन्न दो मन-प्रांतर अब
ना भीतर शेष रहा कुछ भी,
 सब सौंप दिया उर भार तुम्हें!
मेरे संग मेरे  सखा तुम्हीं 
मन की पीड़ा की दवा तुम्हीं
बसे  रोम रोम तुम ही प्रियवर
रही शब्द शब्द सँवार तुम्हें 
  दूं प्रिय! उपहार तुम्हें?
जब सर्वस्व पे है अधिकार तुम्हें 
 


16 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १८ नवंबर २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. हार्दिक आभार प्रिय श्वेता।अनगिन पाठकों तक रचना पहुँचाने के लिये पाँच लिंकों के भागीरथ प्रयासों को नमन है।

    जवाब देंहटाएं
  3. जी ! रेणु जी ! नमन संग आभार आपका .. इस तरह सूफ़ियाना अंदाज़ को हिंदी भाषा में रूबरू कराने के लिए .. "प्रियवर" शब्द .. अपने आप में गहन गूढ़ता समेटे हर पाठक की अपनी-अपनी मानसिकता के अनुरूप प्रतिबिम्बित होता प्रतीत हो रहा .. यशोदा जी की भाषा में कहूँ तो .. "साधुवाद" आपको .. बस यूँ ही ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुबोध जी आपकी इस भावपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ ।ये सच है रचनाकार अपने भाव लिखता है तो प्रबुद्ध पाठक उसे अपनी दृष्टि से आँकते हैं।वैसे ये रचना अमृता तन्मय जी की रचना पर काव्यात्मक प्रतिक्रिया के रूप में लिखी गई थी।एक बार फिर से आपका आभार ।सादर 🙏

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  4. दूं प्रिय! उपहार तुम्हें?
    जब सर्वस्व पे है अधिकार तुम्हें

    उम्दा लेखन

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय दीदी, आपकी स्नेहिल उपस्थिति और प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 🙏

      हटाएं
  5. मेरे संग मेरे सखा तुम्हीं
    मन की पीड़ा की दवा तुम्हीं
    बसे रोम रोम तुम ही प्रियवर
    रही शब्द शब्द सँवार तुम्हें
    दूं प्रिय! उपहार तुम्हें?
    जब सर्वस्व पे है अधिकार तुम्हें
    ... प्रेम पर जीवन दर्शन का सुंदर प्रतिबिंब । निःस्वार्थ भाव से लिखी गई प्रेम पर सुंदर रचना ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय जिज्ञासा , आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार।

      हटाएं
  6. मेरी हर प्रार्थना में तुम हो,
    निर्मल अभ्यर्थना में तुम हो!
    तुम्हें समर्पित हर प्रण मेरा,
    माना जीवन आधार तुम्हें!
    इस समर्पण से बेहतर और क्या उपहार होता प्रिय रेणु ! किसी विशेष अवसर पर लिखी गई है शायद यह रचना.....

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय मीना, आपकी ब्लॉग पर वापसी और इस रचना पर प्रतिक्रिया से बहुत खुशी हुई।ये रचना अमृता जी की रचना पर काव्यात्मक प्रतिक्रिया स्वरूप लिखी गई थी सस्नेह!

      हटाएं
  7. दूं प्रिय! उपहार तुम्हें?
    जब सर्वस्व पे है अधिकार तुम्हें
    अप्रतिम समर्पण भाव से सृजित सुन्दर कृति !!

    जवाब देंहटाएं
  8. प्रिय रेणु दी, क्या दू उपहार तुम्हें?
    जब सर्वस्व पे है अधिकार तुम्हें?
    कितने कम शब्दों में पूर्ण समर्पण का एहसास करवाया है आपने। बहुत सुंदर।

    जवाब देंहटाएं

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