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शनिवार, 13 जनवरी 2018

अलाव दर्द का -- कविता --

जलता रहा अलाव दर्द का  
 भीतर यूँ ही कहीं  मन में ; 
 शापित  से   कब से  भटक रहे   
हम जीवन के  वीराने  वन   में !

 आस के  मोती चुन -चुन कर  
 सदियों सी हर रात बितायी हमने ,
 ये दोष  भरोसे  का  था  अपने 
जो यूँ ठोकर खायी हमने  ;
 बरबस     ऑंखें बरस रही 
 सूखा  बदला  सावन में   !!


अपनेपन  के दावे उनके 
हकीक़त नहीं फ़साने थे  ,
सब अपनों को लिए थे साथ 
बस एक  हमीं बेगाने थे ;
पर जाने क्यों  वो  झाँकने लगते   
मेरे मन के उजले दर्पण में  ?


कहाँ किसी को कभी   
 इन्तजार हमारा  था  ?
 एक भ्रम सुहाना सा था   कोई  
 कब उनपे  अधिकार   हमारा था ?
फिर भी रह -रह  छा जाते हैं 
वो  ही मेरे शब्द सृजन में !!

जलता रहा अलाव दर्द का  
 भीतर यूँ ही कहीं  मन में !! 




54 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ किसी को कभी, इन्तजार हमारा था ?
    एक भ्रम सुहाना सा था कोई, कब उनपे अधिकार हमारा था ?
    फिर भी रह -रह छा जाते हैं, वो ही मेरे शब्द सृजन में !!
    जलता रहा अलाव दर्द का, भीतर यूँ ही कहीं मन में .....
    भावनाओं का यह अलाव, जलन बहुत देता है पर मरहम नहीं। जल जाते हैं प्रेमी इनमें, तड़प मन के कोई जान भी पाता नही यह अलाव है वो, निशाँ जख्मों के कहाँ छोड़ जाता है।
    आदरणीय रेणु जी, सुंदर भावपूर्ण रचना हेतु बधाई।

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    1. आदरणीय पुरुषोत्तम जी -- आपके भावपूर्ण शब्दों से मन को अपार उत्साह मिला है -- सादर आभार |

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  2. बहुत सुंदर,भाव प्रवाह से उमड़ती हुई यह रचना मन में एक टीस सी उठाती है। दर्द का अलाव तो हर ऋतु में जलता रहता है । ना जाने क्या क्या जलकर राख हो जाता है उसमें ...

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    1. आदरणीय मीना जी -- भावपूर्ण शब्दों के लिए सस्नेह आभार |

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  3. निमंत्रण पत्र :
    मंज़िलें और भी हैं ,
    आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद है आपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं।
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    1. आदरणीय रविन्द्र जी -- सादर आभार आपका |

      हटाएं
  5. बहुत बढिया भाव प्रवीण रचना..

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  6. बहुत खूब...बहुत ही अच्‍छा लिखती हैं आप .. आभार ।

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    1. प्रिय संजय--- आपके प्रेरक शब्द अनमोल हैं

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  7. उत्तर
    1. आदरणीय रोशन जी -- हार्दिक स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर | आपका सादर आभार |

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  8. ये अलाव जलते रहना भी तो जरूरी है ...
    आशा न हो तो जीवन भी कहाँ रहेगा ... प्रभावी रचना ...

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    1. आदरणीय दिगम्बर जी -- सदैव प्रेरक होते हैं आपके शब्द -- सादर आभार

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  9. बहुत बहुत बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ती जलता रहा अलाव का दर्द

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    1. आदरणीय हार्दिक स्वागत है आपका ब्लॉग पर -- रचना की सराहना के लिए आभारी हूँ |

      हटाएं
  10. कहाँ किसी को कभी -
    इन्तजार हमारा था ?
    एक भ्रम सुहाना सा था कोई -
    कब उनपे अधिकार हमारा था ?
    फिर भी रह -रह छा जाते हैं
    वो ही मेरे शब्द सृजन में !!

    जलता रहा अलाव दर्द का -जी सुंदर भावों से
    भीतर यूँ ही कहीं मन में !!!!!!!!!!!.....बहुत उत्तम रचना ।रेनू जी
    सुंदर भावों से सजी सुंदर रचना के लिए बधाई ।

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    उत्तर
    1. प्रिय दीपा जी -- आपके स्नेहासिक्त सहयोग की आभारी हूँ |

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  11. जलता रहा अलाव दर्द का -
    भीतर यूँ ही कहीं मन में ;
    शापित से कब से भटक रहे -
    हम जीवन के वीराने वन में....बहुत ही सुन्दर सृजन आदरणीया
    लाजबाब
    सादर

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  12. अपनेपन के दावे उनके -
    हकीक़त नहीं फ़साने थे ,
    सब अपनों को लिए थे साथ -
    बस एक हमीं बेगाने थे ;
    पर जाने क्यों वो झांकने लगते -
    मेरे मन के उजले दर्पण में ?
    वाह बहुत ही बेहतरीन रचना रेणु जी

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  13. जलता रहा अलाव दर्द का -
    भीतर यूँ ही कहीं मन में ;

    बहुत ही उत्कृष्ट रचना
    बहुत खूब आदरणीया

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  14. हुए हरे हिया के घाव
    थके, हारे जीवन का दाव
    दरके दर्रा दर्रा दिल का
    जला अबूझ मन का अलाव!

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    1. सादर आभार विश्वमोहन जी आपकी इस सुंदर काव्यात्मक टिप्पणी का |

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  15. जलता रहा अलाब दर्द का
    इस कविता को पढ़ कर बहुत अच्छा लगा
    🙂😊

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    1. प्रिय नेहा जी -- आपका स्वागत है मेरे ब्लॉग पर | सस्नेह आभार |

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  16. कुछ ऐसी ही रचनाएँ पढ़ कर ब्लोग पढना सार्थक हो जाता है

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    उत्तर
    1. आप जैसे पाठक रचना को सार्थक कर देते हैं | पुनः आभार नेहा जी |

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  17. कब उनपे अधिकार हमारा था ?
    फिर भी रह -रह छा जाते हैं
    वो ही मेरे शब्द सृजन में
    लाजबाब...... अंतर् पीड़ा को दर्शाता तुम्हारी ये रचना हर एक दिल के आलाव को जरूर जला दिया होगा बहुत खूब ..... सादर स्नेह सखी

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    उत्तर
    1. अत्यंत स्नेहिल उद्गारों के लिए स्नेह भरा आभार सखी कामिनी |

      हटाएं
  18. रेणु दी,कहते हैं न कि कोई हमें प्यार करले झूठा ही सही। हर इंसान प्यार का भुखा हैं। अंतर पीड़ा को व्यक्त करती बहुत ही सुंदर रचना।

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  19. बदलते रिश्तों के गीत में
    कुछ नए शब्द जुट जाते हैं
    गीत के नए साज गुनगुनाकर
    कुछ नए अपनें साथ आ जाते हैं

    रेणु दी, आपका एक नया अनुज -प्रकाश।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रिय अनुज प्रकाश --हार्दिक स्वागतम और अभिनन्दन है आपका इन महकते उम्मीद भरे शब्दों के साथ | सचमुच निराशा के साथ आशा की कदमताल जीवन में नये रंग भरती है | आपको सस्नेह आभार और प्यार मेरे अनुज |

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  20. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति, रेणु! बिनम्ब भी बहुत प्यारा है।

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  21. उत्तर
    1. मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है प्रिय कोकिला जी | आपके मधुर शब्दों के लिए सादर , सस्नेह आभार |

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  22. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    १६ दिसंबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  23. वाह!!क्या बात है प्रिय सखी रेनू !!शब्दों को इतनी खूबसूरती से पिरोती हैं आप ,भावनाएँ व्यक्त करने के लिए ।

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    1. आपके स्नेह के लिए हार्दिक आभार शुभा जी 🙏🙏🙏

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  24. ये दर्द का अलाव हर दिल में जलता हैं ,कभी तो इसकी हल्की गर्माहट अच्छी भी लगती हैं पर कभी वो जलन असहनीय पीड़ा देती हैं ,सुंदर ,भावपूर्ण रचना सखी

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    1. प्रिय कामिनी, अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आभार सखी 🙏🙏

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  25. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति प्रिय रेणु जी।बहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण प्रस्तुति।सादर नमन।

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    1. प्रिय सुजाता जी, आपके शब्द अनमोल हैं। हार्दिक आभार सखी 🙏🙏

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  26. बहुत सुंदर और भाव पूर्ण सृजन रेणु बहन, हर शब्द एहसास से लिपटा है ।
    पहले पढ़ने से छूट गई अब पढ़कर बहुत अच्छा लगा ।
    मनभाई आपकी रचना।

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    उत्तर
    1. आपका स्वागत है प्रिय कुसुम बहन। ये पुरानी रचना है। आपने पढ़ी बहुत खुशी हुई। सस्नेह आभार आपका 🙏🙏

      हटाएं

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