मेरी प्रिय मित्र मंडली

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

लिख दो कुछ शब्द -



लिख दो ! कुछ शब्द
नाम मेरे ,
अपने होकर ना यूँ 
बन बेगाने रहो तुम !
हो दूर भले पर पास मेरे .
इनके ही बहाने रहो तुम !

कोरे कागज पर उतर कर .
ये अमर हो जायेंगे ;
जब भी छन्दो में ढलेंगे ,
गीत मधुर हो जायेंगे ;
ना भूलूँ जिन्हें उम्र भर
बन प्रीत के तराने रहो तुम !

जब तुम ना पास होंगे
इनसे ही बातें करूँगी .
इन्हीं में मिलूंगी तुमसे
जी भर मुलाकातें करूँगी
शब्दों संग मेरे भीतर बस
मेरे साथी रूहाने रहो तुम !

जीवन की
ढलती साँझ में
ये दुलारेंगे मुझे ,
तुम्हारे ही प्रतिरूप में
स्नेहवश निहारेंगे मुझे ;
रीती पलकों पर मेरी
बन सपने सुहाने रहो तुम !

कौन जाने कब कहाँ
हो आखिरी पल इस मिलन का
शब्दों की अनुगूँज ही
होगी अवलंबन विकल मन का
पुकार सुनो
विचलित मन की
ना  दर्द से अंजाने रहो तुम !!
  
स्वरचित  -- रेणु
धन्यवाद शब्दनगरी 
 ==========================

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - ( लिख दो कुछ शब्द -- ) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

53 टिप्‍पणियां:

  1. कौन जाने कब कहाँ
    हो आखिरी पल इस मिलन का
    शब्दों की अनुगूँज ही
    होगी अवलंबन विकल मन का
    पुकार सुनो
    विचलित मन की
    ना इस दर्द से अंजाने रहो तुम !!
    --पुकार तो ईश्वर भी नहीं सुनता है रेणु दी फिर मानव क्या सुनेगा। वह तो बस अपने सुविधानुसार स्नेह की एक और नया परिभाषा गढ़ देगा।
    मन को छू लेने वाली है हर पंक्ति..
    परंतु सत्य यही है कि इस नश्वर संसार में कोई नहीं अपना है !
    चाहे जितना प्रति कर लें अथवा वफादार रहे। परन्तु ग्राहक आते ही कसाई अपनी पालतू बकरी के गर्दन पर छूरा चलाने से पीछे न हटेगा।

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    1. शशि भाई आभार । 🙏🙏🙏

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    2. क्षमा करिएगा आदरणीय सर पर इस नश्वर संसार में भी वो नारायण अपना है और प्रेम रूप में सब में विद्यमान है। तो बस प्रेम से देखिए तो मित्र हो या शत्रु सब अपने है।
      सादर नमन 🙏

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 30 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. प्यार की व्याकुलता को बहुत ही सुंदर टटीकर से व्यक्त किया हैं आपने।

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (31-08-2019) को " लिख दो ! कुछ शब्द " (चर्चा अंक- 3444) पर भी होगी।

    ---
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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  5. वाह रेणु बहन बहुत सुंदर एहसास शब्दों में पिरोये
    आपने लगता है दिल खोलकर रख दिया।
    सुंदर काव्यात्मक अभिव्यक्ति गहरे उतरती।
    मां शारदा सदा आप पर अपना वरद हस्त रखें रहे।
    सस्नेह।

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    1. प्रिय कुसुम बहन , आप बहनों का स्नेह मेरे लिए मा शारदे की आशीष से कम नहीं । आभार 🙏🙏🙏

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  6. वाह!विरह की पीड़ा का मार्मिक एहसास कराती रचना पाठक को वियोग के समुंदर में डुबकी लगवा देती है. आपका बेजोड़ सृजन अत्यंत प्रभावशाली है. लिखते रहिए.

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  7. कोरे कागज पर उतर कर .

    ये अमर हो जायेंगे ;

    जब भी छन्दो में ढलेंगे ,

    गीत मधुर हो जायेंगे ;

    वाह 👏 👏. अद्भुत

    जवाब देंहटाएं
  8. कोरे कागज पर उतर कर .
    ये अमर हो जायेंगे ;
    जब भी छन्दो में ढलेंगे ,
    गीत मधुर हो जायेंगे ;
    ना भूलूँ जिन्हें उम्र भर
    बन प्रीत के तराने रहो तुम !वाहहह बेहतरीन रचना सखी

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  9. प्रेम को आधार देती हुई ,उसको जिंदा रखने की कोशिश करती हुई रचना बहुत बढ़िया ,बधाई हो

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  10. सच है, कोई साथ हो न हो लेकिन अपने लिखे शब्द हमेशा साथ होते है,.. दुनिया भ्रमजाल जो है
    बहुत सुन्दर

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  11. जब भी छन्दो में ढलेंगे ,
    गीत मधुर हो जायेंगे ;
    ना भूलूँ जिन्हें उम्र भर
    बन प्रीत के तराने रहो तुम बहुत ही सुन्‍दर भावमय करती पंक्तियां

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  12. कुछ शब्दों का अमूल्य उपहार जीवन को उम्र भर का अवलंबन देता है ... ये शब्द हर पल, हर सांस किसी के होने का एहसास किसी के प्रेम का टच और तन्हाई के सुनहरे पल की यादों का भार उठा लेते हैं ...
    बहुत ही सुन्दर शब्दों में मन के भाव अविरल धारा की तरह बह रहे हैं ... बहुत सुन्दर रचना ...

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    1. सादर आभार दिगम्बर जी। आपकी सराहना से रचना सार्थक हुई। 🙏🙏🙏

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  13. कौन जाने कब कहाँ
    हो आखिरी पल इस मिलन का
    शब्दों की अनुगूँज ही
    होगी अवलंबन विकल मन का... भावनाओं का आलम्ब शब्द होते है और शब्दों का आलम्ब अक्षर जिनका कभी क्षरण नहीं होता। वह अनुराग के चैतन्य के चिरंतन वाहक होते हैं। बहुत सुंदर रचना!!!

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  14. जब तुम ना पास होंगे
    इनसे ही बाते करूँगी .
    इन्हीं में मिलूंगी तुमसे
    जी भर मुलाकाते करूँगी
    शब्दों संग मेरे भीतर बस
    मेरे साथी रूहाने रहो तुम !
    वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर मनमोहक रचना रेणु जी !
    सच में शब्द वह भी प्रेम के ......अब कहाँ मिलते हैं पहले चिट्ठी पत्री के दौर में मन के जज्बात शब्दों में ढ़ल दिल की गहराइयों में उतर जाया करते थे तन्हाइयों के साथी बनकर
    बहुत ही खूबसूरत अल्फाज दिये आपने उन जज्बातों को...
    कौन जाने कब कहाँ
    हो आखिरी पल इस मिलन का
    शब्दों की अनुगूँज ही
    होगी अवलंबन विकल मन का
    वाह!!!!
    बहुत ही लाजवाब अविस्मरणीय रचना के लिए बधाई जवं शुभकामनाएं सखी!

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    उत्तर
    1. प्रिय सुधा बहन, आपकी स्नेहिल बेबाक प्रतिक्रिया मेरी रचना को बहुत ही अनोखे ढंग से परिभाषित कर देती है जिसके लिए आपकी आभारी रहूंगी | सचमुच चिठ्ठी पत्र का महत्व इसीलिये था वे कागज़ पर उतर कर दीर्घजीवी हो जाते थे जबकि मौखिक शब्द कहीं ना कहीं विस्मृत हो जाते हैं |

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  15. अप्रतिम सृजन प्रिय रेणु बहन !
    कोरे कागज पर उतर कर .
    ये अमर हो जायेंगे ;
    जब भी छन्दो में ढलेंगे ,
    गीत मधुर हो जायेंगे ;
    ना भूलूँ जिन्हें उम्र भर
    बन प्रीत के तराने रहो तुम !
    मन्त्रमुग्ध हूँ ... हर अवतरण हृदयस्पर्शी ।

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    1. हार्दिक स्नेह और आभार सखी इस भावपूर्ण सराहना के लिए |

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  16. जज्बात जज्बात जज्बात
    रेणु जी
    मेरा ब्लॉग जगत पर काफी दिनों बाद आना हुआ है.. आपकी ये रचना पढ़कर दिल बाग़ बाग़ हो गया है. इतनी प्यारी रचना के लिए आपको बधाई.
    आजकल लिखना तो जारी है लेकिन माध्यम बदल गये हैं
    पहले दूर से चिठ्ठियाँ आया करती थी और चिठ्ठियों को पढ़ते पढ़ते लिखने वाले का चेहरा दिखाई देने लगता था मानों वोही बोल के बतिया रहा हो. जैसा कई पुराणी फिल्मों में दिखाया भी गया है.
    कितने ही दिनों बाद जब भी चिठ्ठी पढोगे तो पाओगे बतियाने वाला कभी वृद्ध नहीं होता, वो हमेशा तरोताज़ा रहता है... तभी तो ये वो पुकार है जो कभी नहीं बदलती, इसका लहजा नहीं बदलता, इसमें छलकती चाहत नहीं बदलती.

    पधारें- अंदाजे-बयाँ कोई और

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    1. आपने ये भावपूर्ण शब्द लिखकर मेरा लिखना सार्थक कर दिया रोहितास जी | सादर आभार है आपका |

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  17. "रीती पलकों पर मेरी
    बन सपने सुहाने रहो तुम !"...
    एक संवेदनशील मनुहार ...

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    1. मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है सुबोध जी | आपकी सार्थक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार और शुक्रिया |

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  18. जीवन की
    ढलती साँझ में
    ये दुलारेंगे मुझे ,
    तुम्हारे ही प्रतिरूप में-
    स्नेहवश निहारेंगे मुझे ;
    रीती पलकों पर मेरी
    बन सपने सुहाने रहो तुम

    अति सुंदर सखी ,एक एक शब्द प्रीत में डूबी हुई ,स्नेह

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    1. प्रिय कामिनी तुम्हारी प्रतिक्रिया मनोबल बढाती है | किसी तकनीक खराबी के कारण बहुत सी टिप्पणियों से अनजान रही |आज अंदर से देखा तो कई टिप्पणियाँ मिली | सस्नेह आभार सखी | तुंहारा प्यार अनमोल है |

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  19. जीवन की
    ढलती साँझ में
    ये दुलारेंगे मुझे ,
    तुम्हारे ही प्रतिरूप में-
    स्नेहवश निहारेंगे मुझे। बेजोड़ कविता।

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    उत्तर
    1. गोपाल जी मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है | रचना पर आपकी भावपूर्ण प्रतिक्रिया अनमोल है ,जिसके लिए हार्दिक आभार |

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  20. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 14 अक्टूबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. हार्दिक आभार मुखरित मौन और यशोदा दीदी |

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  21. कौन जाने कब कहाँ
    हो आखिरी पल इस मिलन का
    शब्दों की अनुगूँज ही
    होगी अवलंबन विकल मन का

    बहुत ही सुंदर रचना, अविस्मरणीय ! बहुत-बहुत बधाई आदरणीया रेणु जी।

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    1. आदरणीय पुरुषोत्तम जी , सादर आभार और शुक्रिया |

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  22. वाह वाह
    विरह पीर की सुंदरता लिए लाजवाब,मनभावन,हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ आदरणीया दीदी जी। बहुत सुंदर 👌
    बहुत समय बाद आपको पढ़ने का सौभाग्य मिला
    कैसी हैं आप?
    सादर नमन

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    उत्तर
    1. प्रिय आँचल , आज बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर तुम्हारी उपस्थिति ने मुझे निहाल कर दिया | स्वागत है तुम्हारा ब्लॉग पर | मैं बिलकुल ठीक हूँ | तुमने जो आधा दिन ब्लॉग के लिए दिया मेरे लिए अविस्मरणीय है | खुश रहो और ये स्नेह यूँ ही बना रहे |

      हटाएं
    2. सस्नेह आभार प्रिय रितु जी |

      हटाएं
  23. कौन जाने कब कहाँ
    हो आखिरी पल इस मिलन का
    शब्दों की अनुगूँज ही
    होगी अवलंबन विकल मन का
    पुकार सुनो
    विचलित मन की
    ना इस दर्द से अंजाने रहो तुम !...विकल मन की संवेदना का इतना गढियाया पाग अन्यत्र दुर्लभ है। सराहना से परे।

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  24. जब तुम ना पास होंगे
    इनसे ही बाते करूँगी .
    इन्हीं में मिलूंगी तुमसे
    जी भर मुलाकाते करूँगी
    शब्दों संग मेरे भीतर बस
    मेरे साथी रूहाने रहो तुम !

    आह ! मन की तलहटी में उतर जाने वाले और फिर वहीं ठहर जाने वाले अल्फ़ाज़ निकले हैं आपकी कलम से या यूं कहूं कि आपके जज़्बात से रेणु जी । दिल भर आया पढ़कर ।

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    1. जितेंद्र जी, मुझे पता नहीं आप कविता लिखते हैं या नहीं, पर आप कविताओं का मर्म भली भाँति जानने में सक्षम हैं ।आपको रचना पसंद आई , जानकर बहुत संतोष हुआ ! हार्दिक आभार आपका 🙏🙏💐🙏🙏

      हटाएं

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