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सोमवार, 7 मार्च 2022

रहने दो कवि!(नारी विमर्श पर रचना )

 

🙏🙏

प्रस्तुत रचना,किसी अन्य कवि की शोषित नारी के लिए लिखी गई रचना पर,काव्यात्मक प्रतिक्रिया स्वरुप लिखी गई थी।

ना उघाड़ो  ये   नंगा सच  
ढका ही रहने दो , कवि!
 दर्द  भीतर का  चुपचाप 
 आँखों से बहने दो कवि!//

  
 
ये व्यथा लिखने में,  
कहाँ लेखनी  सक्षम कोई ?
लिखी गयी  तो  ,पढ़ इन्हें 
 कब  आँख हुई नम कोई ?
संताप सदियों से सहा है 
 यूँ ही सहने दो कवि!

डरती रही घर में भी 
 ना बची खेत - क्यार में !
कहाँ- कहाँ ना लुटी अस्मत,
बिकी बीच बाज़ार में !
 मचेगा शोर  जग -भर में 
 ये जिक्र जाने दो ,कवि!
 
 लिखने से  ना होगा तुम्हारे  
 कहीं इन्कलाब कोई 
रूह के जख्मों का मेरे 
ना दे पायेगा  हिसाब कोई
मौन रह ये रीत जग की 
 निभ ही जाने दो, कवि !  
 दर्द  भीतर का  चुपचाप 
 आँखों से बहने दो कवि!/
 

20 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ८ मार्च २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. लिखने से ना होगा तुम्हारे
    कहीं इन्कलाब कोई
    रूह के जख्मों का मेरे
    ना दे पायेगा हिसाब कोई
    मौन रह ये रीत जग की
    निभ ही जाने दो, कवि !
    बात तो सच है प्रिय रेणु !
    क्या होगा लिखकर ? द्रोपदी की पीड़ा पर कितना लिखा गया, उससे क्या आज तक स्त्रियों के साथ होनेवाला वहशीपन रुक सका ? हमारे लेखन की विडंबना ही यही है। हम स्त्री का दर्द, उसकी व्यथा, उसके साथ होनेवाले अत्याचार को लिखते रहे,यह तो उनके जख्मों पर नमक छिड़कना ही हुआ । हमने उन दरिंदों की बखिया उधेड़नेवाले, उनको लताड़नेवाले, उनका सामाजिक बहिष्कार करनेवाले, जन जन की आत्मा को झकझोर देनेवाला साहित्य कम लिखा।
    अब स्त्रियों के दर्द पर मत लिखो, उनकी हालत पर मत लिखो, उनके साथ होनेवाले अत्याचारों पर लिखो ही मत। स्त्रियों की तकलीफों पर अब मत लिखो। मैं भी यही कहती हूँ कि स्त्री पर कुछ लिखो ही मत। कुछ नहीं बदलेगा लिखने विखने से।
    मन में आक्रोश जगाती है आपकी यह कविता।

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    1. बहुत सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ प्रिय मीना।सच है जमीनी स्तर पर आज भी नारी चेतना के स्वर बहुत मध्यम हैं। शायद मैं भी खुद को अक्षम पाती हूँ लिखने के लिए।ध्रुव सिंह 'एकलव्य 'जी की नारी विमर्श पर आधारित रचना पर काव्यात्मक प्रतिक्रिया ये रचना लिखी गई।पुन स्वागत और आभार।

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  3. नारी की अंतर्वेदना और समाज के प्रति की उसकी घोर निराशा का अद्भूत काव्यमय चित्रण।
    सादर।

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    1. हार्दिक आभार आदरनीय अयंगर जी।आपकी उपस्थिति और प्रतिक्रिया अनमोल है मेरे लिए 🙏🙏

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  4. बहुत बहुत सुन्दर सशक्त रचना।

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    उत्तर
    1. हार्दिक आभार और प्रणाम आदरनीय आलोक जी🙏🙏

      हटाएं
  5. नारी ही नहीं बल्कि समस्त मानवता की अंतर्वेदना के हाहाकार को स्वर मिला है इस अद्भुत रचना में।
    काश! कृष्ण ही होता, कोई कवि नहीं,
    तप्त मार्तंड होता, मद्धिम रवि नहीं!
    कर दुर्योधन का दहन प्रचंड पीर देता,
    पाँचाली को चिरंतन चीर देता।
    हर अहुर, हर माहुर हो जाता हवि,
    किंचित न गूँजता 'यूँ ही सहने दो कवि'!

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    उत्तर
    1. आदरनीय विश्वमोहन जी,आपकी प्रतिक्रिया स्वरुप लिखी गई अनमोल पंक्तियाँ मेरी साधारण रचना के लिए एक उपहार से कम नहीं।गहन संवेदनाओं से भरे ये उद्गार अत्यंत उत्कृष्ट और भावपूर्ण हैं।पुन आभार और प्रणाम 🙏🙏

      हटाएं
  6. सच को उजागर करती प्रभावी रचना

    सादर

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  7. लिखने से ना होगा तुम्हारे
    कहीं इन्कलाब कोई
    रूह के जख्मों का मेरे
    ना दे पायेगा हिसाब कोई
    मौन रह ये रीत जग की
    निभ ही जाने दो, कवि !
    दर्द भीतर का चुपचाप
    आँखों से बहने दो कवि!/
    दर्द देने वाले राक्षसों को दर्द भाता होगा
    दिया दर्द पढ़कर नरपिशाच सुख ही पाता होगा
    सही कहा कवि उस दर्द को मत लिखो। नारीविमर्श पर आधारित यह काव्य सृजन बहुत ही हृदयस्पर्शी एवं उत्कृष्ट है
    बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं रेणु जी!

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    उत्तर
    1. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ सुधा जी 🙏❤

      हटाएं
  8. उग्र से उग्रतर प्रतिक्रियाएँ भी नारी विमर्श के नाम पर रोटी जलाने वाले को वो सच देखने वाली आँखें कहाँ दे पाती है? शायद ईंट का जवाब पत्थर से देने पर ही कुछ हो। विद्रोही स्वरों को अब गगनभेदी होने की आवश्यकता है। अत्यंत सशक्त एवं प्रभावी स्वर।

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    उत्तर
    1. हार्दिक आभार प्रिय अमृता जी।आपकी उपस्थिति बहुत सन्तोष देती है 🙏❤

      हटाएं
  9. मौन रह ये रीत जग की
    निभ ही जाने दो, कवि !
    दर्द भीतर का चुपचाप
    आँखों से बहने दो कवि!/

    न जाने कितनी सदियों से यही होता आया है और होता रहेगा .... नारी विमर्श के नाम पर कुछ बदलने वाला नहीं .... मानसिकता आज भी वही है जो महाभारत काल में थी .... बल्कि और विद्रुप हुई है .... कडवे सच को शब्द देने में पूरी तरह समर्थ रही हो ....

    जवाब देंहटाएं
  10. जी प्रिय दीदी,आपकी प्रतिक्रिया से रचनाका मर्म स्पष्ट हुआ है।हार्दिक आभार आपकी आत्मीयता भरी उपस्थिति के लिए 🙏❤

    जवाब देंहटाएं

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