मेरी प्रिय मित्र मंडली

रविवार, 5 नवंबर 2017

अमरुद चुराने आ गई बच्चों की टोली --- बाल कविता |




अमरुद चुराने आ गई बच्चों की टोली ,
 रह- रह पेड़ को ताक रही  - उनकी  नजरें भोली ! 

 हरे भरे पेड़ पर लदे   -फल आधे कच्चे -आधे पक्के  ,
बड़ी ललचाई नजरों से ताके जाते हैं बच्चे ;
कई तिडकम भिड़ा रहे भीतर ही भीतर-
होगे सफल -लग रहे  बड़े   धुन के पक्के ;
देख -समझ ले ना कोई उनकी बाते –
   संकेतों में बतियाते   हमजोली  ! !

कुछ गली में खड़े- दीवार से टेक लगाये ,
एक झुका -- दूजे को  कांधे पे चढ़ाए ;
बाकि   पहरा दे रही चौकन्नी निगाहें –
ज़रा सी आहट पे भाग ले पैर सर पे उठाये ;
बस कुछ पल की बात है काम निपट जाये-
हैं कोशिश में फलों से भर जाये झोली ! !

एक नन्हा बच्चा चढ़ बैठा -मोटी टहनी के ऊपर –
फैक रहा अमरुद तोड़ - नीचे वालों के ऊपर ;
पाया मानों पल में जग भर का खजाना –
लगे समेटने फल बच्चे बडे खुश होकर ;
बड़ी कशमकश में हैं कुछ ज्यादा मिल जाये
जल्द ख़त्म हो जाए ये आंखमिचौली ! !

चुपके से बाहर झाँका तो मेरी आँखें भर आईं -
शुक्र है बच्चों में बचा है बचपन -ये बात मन भाई -
किताबों के बोझ तले दबे थे नन्हे बच्चे -
बाहर निकले कुछ  - इनकी दुनिया मुस्काई ;
चोरी के फल पाकर खिल गए सबके चेहरे -
छोटी सी ख़ुशी ने नन्हे मनों की गांठे खोली !!!!!!!!!!!!!!
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सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

माँ अब समझी हूँ प्यार तुम्हारा---------- कविता ---------

माँ अब समझी  हूँ प्यार  तुम्हारा ------  कविता
माँ अब समझी हूँ प्यार तुम्हारा !

बिटिया की माँ बनकर मैंने
तेरी ममता को पहचाना है ,
माँ -बेटी का दर्द का रिश्ता 
क्या होता है ये जाना है ;
बिटिया की माँ बनी हूँ जबसे 
पर्वत ये तन बना है मेरा ,
उसका  हँसना , रोना और खाना  
यही अब जीवन बना है मेरा
जब - जब उसको सहलाती हूँ ,
रोये तो  हँस बहलाती हूँ 
उसकी  हँसी में खो जाती हूँ  
तो याद आता दुलार तुम्हारा ! !

तुम जो  रोज़ कहा करती थी  
धरती और माँ एक हैं दोनों ,
अपने लिए नहीं जीती  
अन्नपूर्णा और नेक हैं दोनों ;
माँ बनकर मैंने जाना है  
 औरों की खातिर जीना कैसा है ,
जीवन - अमृत पीने की खातिर  
मन के  आँसू पीना कैसा है  ,

और  टूटा मन सीना कैसा है -?
खुद को मिटाया तो जाना है -
अम्बर सा विस्तार तुम्हारा ! !

खिड़की से देखा करती हूँ 
पल - पल राह तका करती हूँ ,
बिटिया पढ़कर घर आयेगी  
आकर गले से लग जायेगी ,
उस पल याद तुम्हारी आती है  
एक छवि मुखर हो जाती है  
जब थकी - थकी मेरी प्रतीक्षा में तू  
 आँगन में बैठी होती थी ,
देख के मेरा मुखड़ा माँ तू
ख़ुशी के  आँसू रो देती थी ;
 मेरी एक  हँसी की खातिर माँ
कोई कमी न तू रखती थी ;
मेरा वो रूठ जाना यूँ ही माँ 
और ना बंद होना मनुहार तुम्हारा ! !

महल में रहकर भी नहीं भूली हूँ 
वो धूल भरा  अँगना तेरा ,
पिता से सम्पूर्णता तेरी 
बिंदिया , पायल , वो कंगना तेरा ;
बड़ों का सफल बुढ़ापा माँ  
 नन्हें   बच्चों की किलकारी ,
दीवाली के हँसते दीप कहीं  
 होली की रंगीली पिचकारी ;
संध्या - वंदन ,  दिया बाती 
वो छोटा सा संसार तुम्हारा ! !
माँ अब समझी हूँ प्यार तुम्हारा ! ! !

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

कल सपने में ------------- नवगीत ---



कल  सपने  में ---- नव  गीत

कल सपने में हम जैसे 
इक सागर -तट पर निकल पड़े  , 
 हाथ में लेकर हाथ चले
और निर्जन पथ पर निकल पड़े !!
 
जहाँ फैली थी मधुर  चाँदनी
शीतल जल के धारों पे , 
कुंदन जैसी रात थमी थी  
मौन  स्तब्ध आधारों  पे ;
फेर के आँखे जग -भर से 
दो प्रेमी नटखट निकल पड़े !!

फिर से हमने चुनी सीपियाँ
और नाव डुबोई कागज की ,
वहीँ रेत के महल बना बैठे -
भूली थी सब पीड़ा जग की ; 
हम मुस्काये तो मुस्काते
तारों के झुरमुट निकल पड़े ! 

ठहर गई थी  वहाँ हवाएँ
 सुनने बातें  कुछ छुटपन की ,
दो मन थे अभिभूत प्यार से 
 ना बात थी कोई अनबन की ;
कोई भूली कहानी याद आई
 कईं  बिसरे किस्से निकल पड़े  ! 

कभी राधा थे - कभी कान्हा थे 
मिट हम -तुम के सब भेद गए ;
 कुछ लगन मनों में थी ऐसी 
हर चिंता , कुंठा छेद गए , 
मन के रिश्ते सफल हुए   
और तन के रिश्ते शिथिल पड़े   ! 

कल सपने में हम जैसे 
इक सागर तट पर निकल पड़े  , 
 हाथ में लेकर हाथ चले 
और निर्जन पथ पर निकल पड़े !!
चित्र -- गूगल से साभार -----------------------------------------------------------------------------------


गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

ओ! शरद पूर्णिमा के शशि नवल !! ----------- कविता ----





तुम्हारी  आभा  का  क्या  कहना !
ओ! शरद पूर्णिमा के शशि नवल !!
कौतूहल हो तुम  सदियों से 
श्वेत , शीतल , नूतन धवल !!! 

 रजत रश्मियाँ  झर - झर  झरती ,
अवनि  - अम्बर     में  अमृत   भरती.
कौन न भरले  झोली  इनसे ? 
तप्त प्राण को  शीतल   करती ;
थकते ना नैन निहार तुम्हें 
तुम निष्कलुष , पावन   और निर्मल |
  ओ ! पूर्णिमा के शशि नवल !

तुमने रे ! महारास को देखा  
 सुनी मुरली मधुर  मोहन की ,
कौन  रे !  महाबडभागी  तुम  सा  ? 
तुम में   सोलह   कला    भुवन   की ;
  स्वर्ण  - थाल  सा रूप तुम्हारा  -
 अंबर का करता.  भाल   उज्जवल !

ओ!शरद पूर्णिमा के शशि नवल !

  ले  आती   शरद को हाथ  थाम -
निर्बंध  बहे  मधु  बयार ,
गोरी के  तरसे   नयन  पिया  बिन -
धीरज  पाते   तुझसे अपार ; 
तुझमे छवि पाती श्याम - सखा की 
खिल खिल  जाता  रे मन का  कमल !!
ओ शरद पूर्णिमा के शशि नवल !!!!!!!!









  


सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

माँ ज्यों ही गाँव के करीब आने लगी है--- कविता ---------



माँ  ज्यों ही   गाँव के करीब  आने लगी  है  --------- कविता |
माँ ज्यों ही गाँव के करीब आने लगी है 
माँ की आँख डबडबाने लगी है !

चिरपरिचित खेत -खलिहान यहाँ हैं ,
माँ के बचपन के निशान यहाँ हैं ;
कोई उपनाम - ना   आडम्बर -
माँ की सच्ची पहचान यहाँ है ;
गाँव की भाषा सुन रही माँ -
खुद - ब- खुद मुस्कुराने लगी है !
माँ की आँख डबडबाने लगी है !!

भावातुर हो लगी बोलने गाँव की बोली 
अजब - गजब सी लग रही माँ बड़ी ही भोली ,
छिटके रंग चेहरे पे जाने कैसे - कैसे -
आँखों में दीप जले - गालों पे सज गयी होली ;
 जाने किस उल्लास में खोयी   -
 मधुर   गीत गुनगुनाने लगी है !
माँ की आँख डबडबाने लगी है !


अनगिन चेहरों  ढूंढ रही माँ -
चेहरा एक जाना - पहचाना सा ,
चुप सी हुई    किसी असमंजस में
  भीतर भय हुआ अनजाना सा ;
खुद को समझाती -सी माँ -
बिसरी गलियों में कदम बढ़ाने लगी है !
माँ की आँख डबडबाने लगी है !!


शहर था पिंजरा माँ खुले आकाश में आई -
थी अपनों से दूर बहुत अब पास में आई ,
 उलझे थे बड़े जीवन के अनगिन  धागे 
 सुलझाने की सुनहरी आस में आई
यूँ लगता है माँ के उग आई पांखें-
लग अपनों के गले खिलखिलाने लगी है
माँ की आँख डबडबाने लगी है !!! 

चित्र -- गूगल से साभार --
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बुधवार, 27 सितंबर 2017

तुलसी के राम -------- ------


तुलसी के  राम


श्री राम कृष्ण भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग और परिचायक हैं |कहते हैं यदि भारतीय संस्कृति और समाज में से राम और कृष्ण को निकाल दिया जाये तो वह शून्य नहीं तो  शून्यप्राय अवश्य हो जायेगी | दोनों ही भारतीय समाज के जननायक नहीं बल्कि युग नायक हैं | जहाँ श्री कृष्ण के बालपन , किशोरावस्था व युवावस्था के अनेक सन्दर्भ उन्हें एक चंचल बालक , अप्रतिम प्रेमी व् कुटनीतिक नायक के रूप में परिभाषित करते हैं ,वहीँ श्री राम मर्यादा , शील व धीरज के शिखर पुरुष कहे जा सकते हैं | एक सभ्य समाज को सदैव ही ऐसे व्यक्ति पसंद आते हैं जो हर प्रकार से लोक हितैषी हो | श्री राम ऐसे ही लोक नायक हैं जो ना केवल पौरुष सौन्दर्य से भरपूर हैं बल्कि स्वाभिमान व जनहित के लिए एक समर्थ योद्धा भी हैं | श्री राम को करुणानिधान भी कहकर पुकारा गया है, वे ना केवल मानव जाति बल्कि संसार के सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखते हैं | श्री राम भगवान् विष्णु के त्रेता युगीन अवतार माने जाते हैं | श्री राम की कहानी  भारतीय समाज में इस तरह से व्याप्त है कि उसके बिना नैतिकता के समस्त मापदंड अधूरे है अर्थात राम आलौकिक - दिव्य पुरुष नहीं हैं--- वे पुरुष हैं पर नैतिकता , शिष्टाचार और मर्यादा के शिखर पुरुष भी हैं कोई आम जन नहीं | उन्होंने रामावतार के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम बन मानव जीवन जिया और गाय, ब्राहमण , देवता और संतजनों आदि का हित किया | श्री राम का जो रूप जन – जन में लोकप्रिय है उसे लोगों के अंतस में बसाने का काम भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने बखूबी किया है | क्योकि तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य रामचरितमानस में प्रभु श्री राम के अनेक रूपों का अपनी सरल व सरस भाषा में वर्णन कर उन्हें जन जन के ह्रदय में बसा दिया है | उनके नायक राम के विभिन्न रूप है | ऐसा माना जाता है कि संसार में अवतारों का अवतरण का कारण लोककल्याण है | जब - जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म का बोलबाला होता है तभी भगवान् कोई अवतार धारण कर संसार को इस अधर्म की पीड़ा से मुक्ति दिलाते हैं | वे जब संसार में प्रकट होते हैं – तब उनका रूप दिव्य होता है -- | तुलसीदास जी ने भगवान् के इस दिव्य रूप को अपनी सरस वाणी में यूँ शब्दांकित किया है ---

भये प्रकट कृपाला दीनदयाला – कौशिल्या हितकारी |
हर्षित महतारी मुनिमनहारी -अद्भुत रूप निहारी | |
लोचनअभिरामा तनु घनश्यामा –निज आयुध भुजचारी |
भूषण वनमाला नयन विशाला शोभासिंधू करारी | |
अर्थात जब कृपालु , दीनों पर दया रखने वाले और कौशल्या माँ के हितकारी भगवान् राम प्रकट हुए तब उनका उनका अनुपम रूप निहारकर माँ दंग रह गई ! ! प्रभु के नेत्र सुंदर है और शरीर का रंग सांवला , चारो भुजाओं में शस्त्र अर्थात शंख , गदा पद्म चक्र आदि धारण किये हुए हैं | सारे अंग आभूषणों और वन माला से सुशोभित हैं | जिनके विशाल नेत्र हैं , जो शोभा के सागर और खर नामक राक्षस के शत्रु हैं जिनकी शोभा को देखकर मुनि लोगों के मन भी मोहित हो जाते हैं | तुलसी दास जी की ने इसके बाद श्री राम के अनेक रूपों का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है , जिनमे माँ दवारा राम को निहारकर अपना भाग्य सराहना और पालने में झुलाने के साथ – साथ उनके बचपन के अनेक रीती - संस्कारों के चित्र मानस में खींचे हैं | एक संस्कारी पुत्र हैं जो प्रातकाल उठकर माता – पिता और गुरु को सिर नवाकर प्रणाम करते हैं ----
प्रातकाल उठके रघुनाथा – मात –पिता , गुरु नावहिं माथा |
वे ना केवल आज्ञाकारी पुत्र हैं बल्किकिशोरावस्था में भी एक कुशल योद्या हैं जो खर – दूषण और ताड़का आदि राक्षसों का संहार करते हैं | वे एक दिव्य पुरुष भी हैं जिनके पैर के स्पर्श मात्र के पत्थर की शापित अहिल्या अपने पूर्व  मानवी  रूप में वापस आ जाती है | आगे चलकर सीता को देख प्रथम दृष्टि में ही उन पर मोहित हो वे अपने अनन्य प्रेमी होने का प्रमाण देते हैं वे कहते हैं ---
जासु विलोकि आलौकिक शोभा –सहज पुनीत मोर मन छोभा|
अर्थात सीता की आलौकिक रूप संपदा को निहार कर वे अपने मन में उपजे क्षोभ की स्वीकारोक्ति बड़ी शिष्टता और व्यावहारिक रूप से करते हैं |यानि अपने सहज पवित्र मन को सीता के प्रति आकृष्ट होने पर वे इसे अपने छोटे भाई लक्षमण से छुपाना नहीं चाहते पर बड़ी ही शिष्टता से बताकर अपने सहज स्वभाव की पारदर्शिता को दिखाते हैं | श्री राम आजीवन एक पत्नीव्रत ले कर समस्त नारी जाति के आदर्श पुरुष कहलाये | श्री राम का अपने तीनों भाइयों के साथ स्नेह अपार है | जीवन से अनंत में समाने तक वे अपने भाइयों के प्रति अतुलनीय स्नेह का प्रदर्शन कर समाज में सहोदरों के आपसी प्रेम की नई गाथा लिखते है ,जो कि भारतीय समाज में युगों से प्रेरणा बिंदु है |जब श्री राम सौतेली माँ कैकयी की आज्ञा से वनगमन के लिए तापस वेश धारण का निकल पड़ते हैं और उनके भाई भरत ननिहाल से वापस आते है तो कौशल्या माँ से राम के वन गमन के विषय में प्रश्न कर अपने प्रति संशय प्रकट करते हैं कि कही राम उन्हें सारे घटनाक्रम के लिए दोषी तो नहीं मान रहे | तब माँ कौशल्या राम के वन गमन का इन शब्दों में वर्णन कर भारत को  सांत्वना देती  हैं  -------
 ‘ मुख प्रसन्न मन राम न रोषु -सब कर सब विधि कर परितोषु

अर्थात जब राम वन के लिए चले तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता थी , कोई राग , द्वेष या किसी भी प्रकार का रोष नहीं | सब को सब प्रकार से संतुष्ट करने बाद ही वे वन गए | यहाँ राम के आंतरिक संतुलन से भरे वैरागी रूप अर्थात ‘ जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये ‘ के दर्शन होते हैं |  श्री  राम को सुबह अयोध्या के राजा के रूप में राज तिलक होना था , पर उस साम्राज्य के राजा बनने के स्थान पर उन्हें अप्रत्याशित रूप से वनवास के लिए जाना पड़ा इस बात को वे रोकर या आक्रोश निकालकर सहन नहीं करते बल्कि नियति के इस रंग को प्रसन्नता और सहजता से शिरोधार्य करते हैं और अपने परम वैरागी रूप में दिखाई पड़ते हैं | राम के पिता रूप का भले ही तुलसीदास जी ने अधिक वर्णन नहीं किया पर ‘’मिले तनय दोनों उर लाई ‘’ लिख कर वे राम जी के पिता रूप का सजीव वर्णन करते हैं | तुलसीदास जी ने श्री राम के एक और रूप को बड़ी की भावप्रणवता से अपनी कालजयी कृति में शब्दांकित किया है | वह है श्री राम का श्रम जीवी रूप  यानि  सांवल वर्ण | उनके संघर्षशील व्यक्तित्व में इस श्याम अथवा नील वर्ण का बहुत महत्व है | सदियों से सांवले व्यक्ति को श्रम प्रधान छवि के रूप में देखा गया है और राम भी ज्यादातर जीवन मानवता के लिए त्याग ,युद्ध , आदर्शों की प्रतिस्थापना के लिए वनवास के रूप में बाहर खुले प्रकृति की गोद में गुजारते हुए अनथक श्रम का विधान रचते हैं , यही कारण है कि तुलसीदास जी राम के पौरुष सौदर्य का वर्णन करते समय उनके सांवले माथे पर पनपी पसीने की बूंद का विशेष रूप से  उल्लेख  करते हैं और और उसे ‘ श्रमबिंदु सोहाए ‘ की उपमा से अलंकृत करते हैं | यानि पसीने को मेहनत का अद्भुत प्रतीक मान कर श्री राम के सन्दर्भ में श्रम को महत्व दिया है | अर्थात श्रम किसी भी सभ्यता की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक है -ये माना गया है -- साथ ही इंगित किया गया है जो कौम श्रम की अवहेलना करती है उसका विलुप्त होना तय है | तुलसी के राम सम भाव वाले है निषाद हों या शबरी , जटायु हो या केवट अथवा बन्दर भालू -- श्री राम की दृष्टि सबको एक सामान आत्मीयता से निहारती है | हनुमान को वे अपने भाई भरत तुल्य मानते हैं और  

  तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई –-- कहकर अपना अनन्य स्नेह प्रदर्शित करते हैं | यही आभार वे सुग्रीव - विभीषण , जामवन्त अंगद , नल नील आदि के साथ प्रकट करते हैं और बताते हैं कि उनके सहयोग के बिना लंका विजय हरगिज संभव नहीं थी | राम के आराध्य भोलेनाथ शिव हैं तो शिव जी हर समय श्री राम के चिंतन में अपना समय बिताते हैं | इन दोनों के एक दुसरे को अपना अभिन्न अंग बताते तुलसीदास जी ने राम जी को शिव के अनन्य आराधक के रूप में परिभाषित किया है | और रामायण में शक्ति पूजा के रूप में राम की नारी शक्ति के प्रति आस्था को दर्शाया गया है | श्री राम जी के रूप में कौशल राज्य को ऐसा आदर्श प्रजा  वत्सल  और कल्याणकारी शासक मिला  ,   जिसका  ' रामराज्य ''  युगों के लिए  समस्त  मानवता के लिए  आदर्श का प्रतीक  बन गया | जिसकी प्रासंगिकता हमेशा  रही है |  गोस्वामी  जी  रामराज्य के बारे में  लिखते हैं कि उसमे ना  केवल  मानव  बल्कि  पक्षी , पशु ,वनस्पति ,  धरती , अम्बर , नदियाँ .समन्दर इत्यादि  भी अपने आदर्श और मर्यादित  रूप में  आपसी सामंजस्य  के साथ  जीवनयापन करते हैं | उसमे किसी को दैहिक ,  दैविक और भौतिक  दुःख    नहीं सताते और ना ही अल्प आयु  में मृत्यु  का भय सताता है | | सारी  प्रजा  निरोग   , बुद्धिमान   और धर्मपरायण हैं | सबके नायक श्री राम समस्त प्रजा के प्रति   संतानवत  प्रीति रखते  हैं | तभी तो ---
हर्षित रहन्हि नगर के लोगा -करहिं  सकल सुर  दुर्लभ  भोगा  |-- अर्थात  नगर के लोग प्रसन्न रहते हैं और  देवताओं  को भी दुर्लभ  सभी भोग भोगते हैं | 
 भूमि सप्त सागर मेखला एक भूप रघुपति  कोसला 
|अर्थात अयोध्या में  श्री राम  सात  समुद्रो   की मेखला वाली भूमि  के एकमात्र  राजा है | इस प्रकार हम देखते हैं कि तुलसी के राम अपने जीवन में अनेक आदर्श रूपों को जीते हुए आराध्य और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में हर भारतवासी के अतःकरण में सदैव विराजते हैं | सब से मुख्य सन्देश गोसाई जी इन पंक्तियों के रूप में देते हैं -----\
सिया राम मय सब जग जानि --- करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी | |


चित्र ------------- गूगल से साभार ||


 पाठकों  के लिए विशेष ----------मेरा विनम्र आग्रह जरुर सुने -- मेरी सबसे ज्यादा  पसंद ,   भजन सम्राट  आदरणीय भीमसेन जोशी जी द्वारा  गाई गयी  गोस्वामी तुलसीदास जी की अद्भुत श्री राम वन्दना   , |  सदी का सबसे खूबसूरत भजन जिसकी प्रशंसा के लिए शब्द नहीं मेरे पास | ना जाने किन दिव्य पलों में तुलसीदास जी ने इसे लिखा होगा ,क्योकि उनकी अपनी ही लिखी श्री राम की स्तुतियों में ये श्रेष्ठतम है ऐसा मुझे लगता है और जिन पलों में इसकी रूहानी धुन और भीमसेन जोशी जी के स्वर पहली बार गूंजे होंगे शायद समय थम गया होगा !!!!!!! कोटि -- कोटि नमन गोसाई जी और इसको सुर -लय में बांधने वाले कलाकारों को और सुर- संगीत पंडित भीमसेन जोशी जी को !!!!!!!!!!!! |




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 रचना पर अनमोल टिप्पणी -------गूगल प्लस से साभार 
' तुलसी ' के राम का सर्वांगीण चित्र इतनी संजीदगी से आपने परोसा मानो तुलसी स्वयं अपने मानस की गद्यात्मक व्याख्या करने बैठे हो। हालांकि तुलसी के परमात्म स्वरूप मर्यादा पुरुषोत्तम मेरी दृष्टि में भटकते जीव मात्र हैं:- धन्य जनक धन जानकी तोरी। और धन्य! वसुधा का भ्रूण।। अशोक वाटिका कलुषित कारा। जग जननी पावन अक्षुण्ण।। प्रतीक बिम्ब सब राम कथा में। कौन है हारा और कौन जीता।। राम भटकता जीव मात्र है। परम ब्रह्म माँ शक्ति सीता।। अपनी अपनी व्याख्या! हालांकि मूल बात ये है के समाज की सभ्यता के निर्माण का यह उद्भव काल था जब नए मूल्य गढे जाने थे। क्रोंच के कामातुर प्रेमी नर जोड़े के वध से वेदना का जो ज्वार वाल्मिकी के मन मे फूटा उस करुणा से प्रसूत श्लोक में नारद ने राम की कथा को बांध दिया।यह संभवतः नए निर्मित होते समाज को मर्यादाओं में उत्कीलित करने का पुनीत प्रयास था।वाल्मिकी ने इसे अपने सुसंस्कृत देव् छन्दों में सजाकर राम को उन मर्यादाओ का प्रतीक संकेत बना दिया तो फिर तुलसी ने अपनी लोक भाषा मे इस मर्यादा पुरुष को लोकनायक बना दिया। आपकी विलक्षण प्रस्तुति के लिए साधुवाद और शुभ कामनाएं!! 


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सोमवार, 18 सितंबर 2017

सुनो गिलहरी --------- कविता

सुनो    गिलहरी ------------ कविता
पेड़ की फुनगी के मचान से 
क्या खूब झांकती  शान से ,
देह इकहरी काँपती ना  हाँफती
निर्भय हो घूमती  स्वाभिमान से ! 

 पूँछ उठाये ,चौकन्नी निगाहें  ,  
चल देती  जिधर मन आये 
छत , दीवार , तार या खंबा -- 
बड़ी सरल हैं तुम्हारी राहें ! 

जहाँ जी चाहे आँख मूँद सो लेती
मसला पानी है ना रोटी ;
भूख में फल पेट भर खाती
माँ की रखी कुजिया से 
झटपट पानी पी जाती ! 

घूमती डाल - डाल और पात - पात 
मलाल नहीं कोई नहीं है साथ ,
आज की चिंता ना कल की फ़िक्र  
देख लिए हैं पेड़ के सारे फल चखकर ,

फुदकती मस्ती में 
 हो बड़ी सयानी
बन बैठी हो पूरी 
बगिया की महारानी ,
सुबह  ,शाम ना देखती दुपहरी  
दुनिया में तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!! 

स्वरचित --रेणु
चित्र -- गूगल से साभार -- 

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 गूगल से साभार -- अनमोल टिप्पणी --

दुनिया मे तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!
जीवन का दर्शन, तुम जीती हर घड़ी ।
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शनिवार, 16 सितंबर 2017

राह तुम्हारी तकते - तकते---------------- गीत


राह तुम्हारी  तकते  - तकते ----------  कविता --
राह तुम्हारी तकते - तकते 
बीते यूँ ही   अनगिन पल साथी,
आस हुई  मध्यम संग में  
और  नैना हुए सजल साथी !

दुनिया को बिसरा   दिल ने 
 बस एक तुम्हें  ही याद किया ,
हो चली  दूभर जब तन्हाई
तुमसे मन ने संवाद किया ;
 पल   को  भी मन की नम आँखों से 
ना हो पाये तुम ओझल साथी ! !


अप्राप्य से अनुराग ये मन का
क्यों हुआ ? कहाँ उत्तर इसका ?
इस राह की ना मंजिल कोई  
फिर भी क्यों सुखद सफ़र इसका ?
प्रश्नों के भंवर में डूबे- उबरे
हुआ समय बड़ा बोझिल साथी !!



था धूल सा निरर्थक ये जीवन  
छू रूह से किया चन्दन तुमने ,
अंतस का धो सब  ख़ार दिया  
किया निष्कलुष और पावन तुमने ;
निर्मलता के तुम मूर्त रूप -
कोई तुम सा कहाँ सरल साथी !!!

राह तुम्हारी तकते - तकते
यूँ ही बीते अनगिन पल साथी
आस हुई  मध्यम संग में  
ये नैना हुए सजल साथी !!.,
चित्र--- गूगल से साभार !
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विशेष रचना

आज कविता सोई रहने दो !

आज  कविता सोई रहने दो, मन के मीत  मेरे ! आज नहीं जगने को आतुर  सोये उमड़े  गीत मेरे !   ना जाने क्या बात है जो ये मन विचलित हुआ जाता है ! अना...