मेरी प्रिय मित्र मंडली

शनिवार, 22 सितंबर 2018

तृष्णा मन की - कविता

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 मिले  जब  तुम अनायास  
 मन मुग्ध    हुआ  तुम्हें  पाकर  ;
 जाने थी कौन तृष्णा  मन की  
जो छलक गयी अश्रु बनकर   ? 

 हरेक     से मुंह मोड़ चला  
  मन तुम्हारी  ही   ओर चला,
 अनगिन    छवियों में उलझा  
  तकता   हो भावविभोर चला 
 जगी भीतर  अभिलाष  नई-
 चली ले उमंगों की नयी डगर  ! !

प्राण स्पंदन हुए कम्पित,
जब सुने स्वर तुम्हारे सुपरिचित ;
जाने ये भ्रम था या तुम  वो  ही थे 
 सदियों से  थे  जिसके   प्रतीक्षित;
 कर  गये शीतल, दिग्दिगंत   गूंजे  
 तुम्हारे ही    वंशी- स्वर मधुर !!



 डोरहीन   ये  बंधन  कैसा ?
यूँ अनुबंधहीन     विश्वास  कहाँ ?
  पास नही    पर  व्याप्त मुझमें
 ऐसा जीवन  -  उल्लास  कहाँ ?
 कोई गीत  कहाँ मैं  रच पाती ? 
तुम्हारी रचना ये शब्द प्रखर !
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धन्यवाद शब्दनगरी 

रेणु जी बधाई हो!,

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धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

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शनिवार, 8 सितंबर 2018

तुम्हें समर्पित सब गीत मेरे--

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मीत कहूं,मितवा कहूं ,
क्या  कहूँ  तुम्हें   मनमीत मेरे ?
 नाम तुम्हारे ये शब्द  मेरे
 तुम्हें समर्पित सब गीत मेरे !!


 हर बात  कहूं  तुमसे मन की  

 कह अनंत सुख पाऊँ मैं ,
 निहारूं नित मन- दर्पण में  
 तुम्हें  स्व -सम्मुख   पाऊँ मैं;
सजाऊँ  ख्वाब नये  तुम संग -
 भूल, ये  गीत -अतीत मेरे  !!

सृष्टि में जो ये प्रणय का
अदृश्य  सा महाविस्तार है ,
जो युगों से है अपना 
 वही इसका दावेदार है ,
बंधने नियत थे तुम संग 
जन्मों के बंध पुनीत मेरे !!
  
अनुराग बन्ध में सिमटी मैं 
यूँ ही पल- पल जीना   चाहूँp ,
सपन- वपन कर डगर पे साथी 
संग तुम्हारे चलना  चाहूँ  ,
तुम्हारे प्यार  से हुए हैं जगमग 
ये नैनों के दीप मेरे  !!
 नाम तुम्हारे हर  शब्द  मेरे
 तुम्हें  समर्पित सब गीत मेरे !!

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 धन्यवाद शब्दनगरी --------

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शनिवार, 25 अगस्त 2018

भैया तुम हो अनमोल ! ---कविता --

 Image result for रक्षा बंधन के चित्र
जग में हर वस्तु का मोल 
पर भैया तुम हो अनमोल  !

रहे हमेशा कायम तू 
माँगूं यही  विधाता से  , 
तुम सा कहाँ कोई  स्नेही -सखा मेरा  
मेरा  तो  गाँव तेरे दम से ;
सुख- दुःख  साझा  कर  लूँ अपना  
रख   दूँ  तेरे  आगे मन  खोल !!

बचपन में जब तुमने गिर -गिर  
 जब ऊँगली पकड चलना सीखा ,
 नीलगगन  में चंदा भी  
  तेरे आगे   लगता  फ़ीका ;
 धरती पर  मानों  देव  उतरे  
 सुनकर तेरे तुतलाते बोल !

 बाबुल की बैठक की तुम शोभा 
 तुमसे  माँ का उजला  अँगना ,
 भाभी की  माँग सजी तुमसे 
 हो तुम उसकी प्रीत का गहना ,
 ना   धन मेरा 
तुमसे बढ़कर 
 चाहे जग दे तराजू  तोल ! 

लेकर राखी के दो तार ,
 आऊँ स्नेह का पर्व मनाने ,
 घूमूँबचपन की गलियों में  
 पीहर   देखूँ तेरे बहाने ,
 बहना   माँगे प्यार तेरा बस 
 ना  माँगे राखी का मोल !
जग में हर वस्तु का मोल 
पर भैया तुम हो अनमोल  !

 
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शनिवार, 18 अगस्त 2018

क्या तुमसे लिखूँ परिचय मेरा ?-- कविता



क्या  तुमसे  लिखूँ परिचय मेरा ?
 तुम  पावन स्नेह प्रश्रय मेरा !!

कब स्वर में मुखरित हो पाते हो !
शब्दों  में  कहाँ समाते हो ? 
मैं     हँसूं   ,   हँसी में  हँस जाते   
बन घन नैना छलकाते  हो !
सपनों से  भर  जाते    कैसे   
 ये सूना  -सा ,पलक- निलय मेरा  !!

क्यों  विकल कर जाता  मन को
अरूप , अनाम   सा ये  नाता ?
जैसे  भाये  तुम   अनायास
कहाँ  यूँ   मन को कोई  भाता ?
पा तुम्हें    सब कुछ भूल गया है  
  बौराया    ह्रदय मेरा !!

 पुलकित  सी इस प्रीत - प्रांगण में
हो कर निर्भय मैं  विचरूँ ?
भर विस्मय में  तुम्हें  निहारूं 
रज बन पथ में बिखरूं ;
हुई खुद से अपरिचित सी मैं -
यूँ तुझमें  हुआ विलय मेरा !! 
 
क्या   तुमसे लिखूँ परिचय मेरा ?  
 तुम  पावन स्नेह प्रश्रय मेरा !!! 

चित्र और विषय -- पांच लिंकों से साभार |
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शनिवार, 11 अगस्त 2018

अमर शहीद के नाम -- कविता

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जब तक हैं  सूरज चाँद   --
अटल   नाम तुम्हारा है ,
 ओ ! माँ भारत  के लाल !
 अमर    बलिदान तुम्हारा  है !!-

आनी ही थी मौत तो  इक दिन --
  जाने किस मोड़ पे आ जाती.-
 कैसे पर गर्व से   फूलती , -
  मातृभूमि  की छाती ;-
दिग -दिंगत में    गूंज  रहा आज     --
यशोगान तुम्हारा है !!
ओ ! माँ भारत  के लाल !
 अमर   बलिदान तुम्हारा  है !!

 धन्य हुई आज वो जननी -  
तुम जिसके बेटे हो ,-
 बना दिया मौत को उत्सव --
 तिरंगे में  लिपट घर लौटे हो ;-
कल  थे एक   गाँव - शहर   के --
 अब    हिंदुस्तान   तुम्हारा  है !!-

ओ ! माँ भारत  के लाल !-
 अमर  बलिदान तुम्हारा  है !!

अत्याचारी  कपटी दुश्मन   
छिपके  घात  लगाता ,-
नामों  निशान मिटा देते उसका --
जो आँख से आँख मिलाता ;-
 पराक्रम से   फिर भी   सहमा  --
दुश्मन हैरान तुम्हारा है  -

-ओ ! माँ भारत  के लाल !-
 अमर   बलिदान तुम्हारा  है !!!!!!!!!!!

नमन ! नमन ! नमन !!!!!!!!!!! 
चित्र -- गूगल से साभार---
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धन्यवाद शब्द नगरी -----

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गुरुवार, 2 अगस्त 2018

सुनो बादल !--- कविता


नील गगन में उड़ने वाले 
ओ ! नटखट आवारा बादल ,
मुक्त हवा संग मस्त हो तुम
किसकी धुन में पड़े निकल ?


उजले दिन काली रातों में 
अनवरत घूमते रहते हो ,
उमड़ - घुमड़ कहते जाने क्या 
और किसको ढूंढते रहते हो ?
बरस पड़ते किसकी याद में जाने -
 सहसा  नयन तरल !!


तुम्हारी अंतहीन खोज में 
क्या  तुम्हें  मिला साथी कोई ?
या फिर नाम तुम्हारे आई
प्यार भरी पाती कोई ?
क्या ठहर कभी मुस्काये हो
या रहते सदा यूँ ही विकल !!


जब पुकारे संतप्त धरा  
बन फुहार  आ जाते हो  
धन - धान्य को समृद्ध करते
सावन को जब  संग लाते हो ,
सुरमई घटा देख नाचे मोरा 
पंचम सुर में गाती कोकिल !!

मेघ तुम जग के पोषक
तुमसे सृष्टि पर सब वैभव ,
तुमसे मानवता हरी - भरी 
और जीवन बन जाता उत्सव ;
धरती का तपता दामन
तुम्हारे स्पर्श से होता शीतल !!
 

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

जो ये श्वेत,आवारा , बादल -- कविता

जो ये  श्वेत,आवारा , बादल -कविता
 जो ये श्वेत,आवारा , बादल  
रंग -श्याम रंग ना आता  ,
कौन सृष्टि के पीत वसन को  
रंग के हरा कर पाता ?

ना सौंपती इसे जल- संपदा  
कहाँ सुख से
 नदिया सोती ?
इसी जल को अमृत घट सा भर 
नभ से कौन छलकाता ?

किसके रंग- रंगते कृष्ण सलोने 
घनश्याम कहाने खातिर ?
इस सुधा रस बिन कैसे  
चातक अपनी प्यास बुझाता ?

पी   छक, तृप्त धरा ना होती  
सजती कैसे नव सृजन की बेला ?
 कौन करता   जग को पोषित 
अन्न धन कहाँ से आता ?

किसकी छवि पे मुग्ध मयूरा
सुध -बुध खो नर्तन करता ?
कोकिल  सु -स्वर दिग्दिगंत में
आनंद कैसे भर पाता ?

टप-टप गिरती  बूँदों बिन  
कैसे  आँगन में उत्सव सजता ?
दमक -दामिनी संग व्याकुल हो
 मेघ जो राग मल्हार ना गाता  !

कहाँ से खिलते पुष्प सजीले,
कैसे इन्द्रधनुष सजता ?
विकल अम्बर का ले  संदेशा 
कौन धरा तक आता  !!
चित्र गूगल से साभार --- 
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शनिवार, 16 जून 2018

स्मृति शेष पिताजी ----- कविता

स्मृति  शेष  -- पिता  जी
 



कल थे पिता  आज नहीं है ,
माँ का अब वो राज नहीं है !

दुनिया के लिए इंसान थे वो ,
पर माँ के भगवान थे  वो !
बिन कहे उसके दिल तक जाती थी,
खो गई अब वो आवाज नहीं है ! 

माँ के सोलह सिंगार थे वो ,
माँ का पूरा संसार थे वो !
वो राजा थे - माँ रानी थी ,
छिन गया अब वो ताज नहीं है ! 

वो थे हम पर इतराने वाले ,
प्यार से सर सहलाने वाले !
उठा है जब से उनका साया ,
किसी को हम पर  नाज़ नहीं है
कल थे पिता पर आज नहीं है -
माँ का अब वो राज नहीं है!!! 


शनिवार, 9 जून 2018

घर से भागी बेटी के नाम --

इज्जत की चादर ओढ़ के तुम  
 हो गयी किन अंधियारों में गुम ?

ना हो ये चादर  तार- तार  
लौट आओ बस एक बार,
 चौखट  जो लाँघ गई थी तुम
 खुला अभी है उस  का द्वार-
 आ !  पौ फटने से पहले  
 रख दो पिताकी लाज का भ्रम! 

पूछेगा जब कोई कल   
 कहूँगा क्या ?कहाँ है तू ?
 बोलेंगी ना  दीवारें घर की  
 हवा कह देगी जहाँ है तू;
 मिलाऊँगा कैसे  नजर खुद से ?
झुक जायेंगे   मेरे गर्वित नयन !!

मौन  दीवारें ,  है स्तब्ध आँगन,
बस बज  साँसों के   तार रहे , 
 चौकें आहट पे  विकल मन  
 पल- पल   तुम्हें  पुकार   रहे ;
ना जाने   रखे थामे   कैसे 
 ये आँखों के उमड़े सावन !!

  जन्म लिया  जब से तुमने                         -
  माँ ने     सपन संजोये ,
 घर द्वार से   विदा  हो तू
 माँ   ख़ुशी के  आँसू रोये  , 
 बो जाए  आँगन धान  दुआ के
ले जाए आशीषों का मधुबन!!

 तू कोमल फूल है  इस घर   का
 पली  ममता के   आँचल में ;
दुनिया की धूप बड़ी तीखी
झुलसा देगी तुम्हें पल में ;
 भरोसे पे धोखा खा न   जाना 
 ना  कर लेना पलकें नम   !!

गाऊँ   मगलगान  करूँ हल्दी उबटन
 रचा मेहंदी , पहना बिछुवे ,  कंगन . 
 ओढ़ा कर  चुनर शगुनों की  
भेजूँ  तेरे घर, संग साजन ,
 ना बोझिल  होना दुःख से  लाडो !
ना   पछताना पूरा जीवन  !!
इज्जत की चादर ओढ़ के तुम -
 हो गयी किन अंधियारों में गुम ? 

शनिवार, 2 जून 2018

रूहानी प्यार --------- कविता --

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हुए  रूहानी प्यार के
कर्ज़दार  हम ,
रखेगें इसे दिल में
सजा  संवार हम   !!

 बदल जायेंगे जब  
 सुहाने  ये  मन के मौसम , 
 तनहाइयों में साँझ की
 घुटने लगेगा दम,   
खुद को बहलायेंगें 
इसको निहार हम !!

  इस प्यार की क्षितिज पे
  रहेंगी टंकी कहानियां  ,
    लेना ढूंढ   तुम वहीँ     -
 विस्मृत ये निशानियाँ -
   आँखों से  बह उठेगे 
बन अश्रु की  धार  हम !!

 हर शाम हर  सुबह  में -
 मांगेगे हर दुआ में-
ठुकरायेगी जो दुनिया -
 आयेंगे तेरी  पनाह में 
हर  सांस संग रहेंगे 
तेरे तलबगार हम !!!

रहेगी  ये खुमारी -
मिटेगी हर दुश्वारी -
भले ना   जुड़  सके हम  
जुड़ेंगी   रूहें  हमारी
और फिर  मिलेंगे   
 जीवन  के   पार हम! 

स्वरचित -- रेणु--
चित्र -- गूगल से साभार -- 
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रेणु जी बधाई हो!,

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विशेष रचना

आज कविता सोई रहने दो !

आज  कविता सोई रहने दो, मन के मीत  मेरे ! आज नहीं जगने को आतुर  सोये उमड़े  गीत मेरे !   ना जाने क्या बात है जो ये मन विचलित हुआ जाता है ! अना...