
'पावन , निर्मल प्रेम सदा ही -- रहा शक्ति मानवता की , जग में ये नीड़ अनोखा है - जहाँ जगह नहीं मलिनता की ;; मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है |
मेरी प्रिय मित्र मंडली
बुधवार, 25 अक्टूबर 2017
कल सपने में ------------- नवगीत ---

कल सपने में हम जैसे
फिर से हमने चुनी सीपियाँ
ठहर गई थी वहाँ हवाएँ
कल सपने में हम जैसे
गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017
ओ! शरद पूर्णिमा के शशि नवल !! ----------- कविता ----

तुम्हारी आभा का क्या कहना !
ओ! शरद पूर्णिमा के शशि नवल !!
कौतूहल हो तुम सदियों से
श्वेत , शीतल , नूतन धवल !!!
रजत रश्मियाँ झर - झर झरती ,
अवनि - अम्बर में अमृत भरती.
कौन न भरले झोली इनसे ?
तप्त प्राण को शीतल करती ;
थकते ना नैन निहार तुम्हें
तुम निष्कलुष , पावन और निर्मल |
ओ ! पूर्णिमा के शशि नवल !
तुमने रे ! महारास को देखा
सुनी मुरली मधुर मोहन की ,
कौन रे ! महाबडभागी तुम सा ?
तुम में सोलह कला भुवन की ;
स्वर्ण - थाल सा रूप तुम्हारा -
अंबर का करता. भाल उज्जवल !
ओ!शरद पूर्णिमा के शशि नवल !
ले आती शरद को हाथ थाम -
निर्बंध बहे मधु बयार ,
गोरी के तरसे नयन पिया बिन -
धीरज पाते तुझसे अपार ;
तुझमे छवि पाती श्याम - सखा की
खिल खिल जाता रे मन का कमल !!
ओ शरद पूर्णिमा के शशि नवल !!!!!!!!
सोमवार, 2 अक्टूबर 2017
माँ ज्यों ही गाँव के करीब आने लगी है--- कविता ---------

माँ ज्यों ही गाँव के करीब आने लगी है
माँ की आँख डबडबाने लगी है !
चिरपरिचित खेत -खलिहान यहाँ हैं ,
माँ के बचपन के निशान यहाँ हैं ;
कोई उपनाम - ना आडम्बर -
माँ की सच्ची पहचान यहाँ है ;
गाँव की भाषा सुन रही माँ -
खुद - ब- खुद मुस्कुराने लगी है !
माँ की आँख डबडबाने लगी है !!
भावातुर हो लगी बोलने गाँव की बोली
अजब - गजब सी लग रही माँ बड़ी ही भोली ,
अजब - गजब सी लग रही माँ बड़ी ही भोली ,
छिटके रंग चेहरे पे जाने कैसे - कैसे -
आँखों में दीप जले - गालों पे सज गयी होली ;
जाने किस उल्लास में खोयी -
मधुर गीत गुनगुनाने लगी है !
माँ की आँख डबडबाने लगी है !
अनगिन चेहरों ढूंढ रही माँ -
चेहरा एक जाना - पहचाना सा ,
चुप सी हुई किसी असमंजस में
भीतर भय हुआ अनजाना सा ;
खुद को समझाती -सी माँ -
बिसरी गलियों में कदम बढ़ाने लगी है !
माँ की आँख डबडबाने लगी है !!
शहर था पिंजरा माँ खुले आकाश में आई -
थी अपनों से दूर बहुत अब पास में आई ,
उलझे थे बड़े जीवन के अनगिन धागे
सुलझाने की सुनहरी आस में आई
यूँ लगता है माँ के उग आई पांखें-
लग अपनों के गले खिलखिलाने लगी है
माँ की आँख डबडबाने लगी है !!!
माँ की आँख डबडबाने लगी है !!!
चित्र -- गूगल से साभार --
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बुधवार, 27 सितंबर 2017
तुलसी के राम -------- ------

श्री राम कृष्ण भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग और परिचायक हैं |कहते हैं यदि भारतीय संस्कृति और समाज में से राम और कृष्ण को निकाल दिया जाये तो वह शून्य नहीं तो शून्यप्राय अवश्य हो जायेगी | दोनों ही भारतीय समाज के जननायक नहीं बल्कि युग नायक हैं | जहाँ श्री कृष्ण के बालपन , किशोरावस्था व युवावस्था के अनेक सन्दर्भ उन्हें एक चंचल बालक , अप्रतिम प्रेमी व् कुटनीतिक नायक के रूप में परिभाषित करते हैं ,वहीँ श्री राम मर्यादा , शील व धीरज के शिखर पुरुष कहे जा सकते हैं | एक सभ्य समाज को सदैव ही ऐसे व्यक्ति पसंद आते हैं जो हर प्रकार से लोक हितैषी हो | श्री राम ऐसे ही लोक नायक हैं जो ना केवल पौरुष सौन्दर्य से भरपूर हैं बल्कि स्वाभिमान व जनहित के लिए एक समर्थ योद्धा भी हैं | श्री राम को करुणानिधान भी कहकर पुकारा गया है, वे ना केवल मानव जाति बल्कि संसार के सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखते हैं | श्री राम भगवान् विष्णु के त्रेता युगीन अवतार माने जाते हैं | श्री राम की कहानी भारतीय समाज में इस तरह से व्याप्त है कि उसके बिना नैतिकता के समस्त मापदंड अधूरे है अर्थात राम आलौकिक - दिव्य पुरुष नहीं हैं--- वे पुरुष हैं पर नैतिकता , शिष्टाचार और मर्यादा के शिखर पुरुष भी हैं कोई आम जन नहीं | उन्होंने रामावतार के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम बन मानव जीवन जिया और गाय, ब्राहमण , देवता और संतजनों आदि का हित किया | श्री राम का जो रूप जन – जन में लोकप्रिय है उसे लोगों के अंतस में बसाने का काम भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने बखूबी किया है | क्योकि तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य रामचरितमानस में प्रभु श्री राम के अनेक रूपों का अपनी सरल व सरस भाषा में वर्णन कर उन्हें जन जन के ह्रदय में बसा दिया है | उनके नायक राम के विभिन्न रूप है | ऐसा माना जाता है कि संसार में अवतारों का अवतरण का कारण लोककल्याण है | जब - जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म का बोलबाला होता है तभी भगवान् कोई अवतार धारण कर संसार को इस अधर्म की पीड़ा से मुक्ति दिलाते हैं | वे जब संसार में प्रकट होते हैं – तब उनका रूप दिव्य होता है -- | तुलसीदास जी ने भगवान् के इस दिव्य रूप को अपनी सरस वाणी में यूँ शब्दांकित किया है ---
भये प्रकट कृपाला दीनदयाला – कौशिल्या हितकारी |
हर्षित महतारी मुनिमनहारी -अद्भुत रूप निहारी | |
लोचनअभिरामा तनु घनश्यामा –निज आयुध भुजचारी |
भूषण वनमाला नयन विशाला शोभासिंधू करारी | |
अर्थात जब कृपालु , दीनों पर दया रखने वाले और कौशल्या माँ के हितकारी भगवान् राम प्रकट हुए तब उनका उनका अनुपम रूप निहारकर माँ दंग रह गई ! ! प्रभु के नेत्र सुंदर है और शरीर का रंग सांवला , चारो भुजाओं में शस्त्र अर्थात शंख , गदा पद्म चक्र आदि धारण किये हुए हैं | सारे अंग आभूषणों और वन माला से सुशोभित हैं | जिनके विशाल नेत्र हैं , जो शोभा के सागर और खर नामक राक्षस के शत्रु हैं जिनकी शोभा को देखकर मुनि लोगों के मन भी मोहित हो जाते हैं | तुलसी दास जी की ने इसके बाद श्री राम के अनेक रूपों का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है , जिनमे माँ दवारा राम को निहारकर अपना भाग्य सराहना और पालने में झुलाने के साथ – साथ उनके बचपन के अनेक रीती - संस्कारों के चित्र मानस में खींचे हैं | एक संस्कारी पुत्र हैं जो प्रातकाल उठकर माता – पिता और गुरु को सिर नवाकर प्रणाम करते हैं ----
प्रातकाल उठके रघुनाथा – मात –पिता , गुरु नावहिं माथा |
प्रातकाल उठके रघुनाथा – मात –पिता , गुरु नावहिं माथा |
वे ना केवल आज्ञाकारी पुत्र हैं बल्किकिशोरावस्था में भी एक कुशल योद्या हैं जो खर – दूषण और ताड़का आदि राक्षसों का संहार करते हैं | वे एक दिव्य पुरुष भी हैं जिनके पैर के स्पर्श मात्र के पत्थर की शापित अहिल्या अपने पूर्व मानवी रूप में वापस आ जाती है | आगे चलकर सीता को देख प्रथम दृष्टि में ही उन पर मोहित हो वे अपने अनन्य प्रेमी होने का प्रमाण देते हैं वे कहते हैं ---
जासु विलोकि आलौकिक शोभा –सहज पुनीत मोर मन छोभा|
अर्थात सीता की आलौकिक रूप संपदा को निहार कर वे अपने मन में उपजे क्षोभ की स्वीकारोक्ति बड़ी शिष्टता और व्यावहारिक रूप से करते हैं |यानि अपने सहज पवित्र मन को सीता के प्रति आकृष्ट होने पर वे इसे अपने छोटे भाई लक्षमण से छुपाना नहीं चाहते पर बड़ी ही शिष्टता से बताकर अपने सहज स्वभाव की पारदर्शिता को दिखाते हैं | श्री राम आजीवन एक पत्नीव्रत ले कर समस्त नारी जाति के आदर्श पुरुष कहलाये | श्री राम का अपने तीनों भाइयों के साथ स्नेह अपार है | जीवन से अनंत में समाने तक वे अपने भाइयों के प्रति अतुलनीय स्नेह का प्रदर्शन कर समाज में सहोदरों के आपसी प्रेम की नई गाथा लिखते है ,जो कि भारतीय समाज में युगों से प्रेरणा बिंदु है |जब श्री राम सौतेली माँ कैकयी की आज्ञा से वनगमन के लिए तापस वेश धारण का निकल पड़ते हैं और उनके भाई भरत ननिहाल से वापस आते है तो कौशल्या माँ से राम के वन गमन के विषय में प्रश्न कर अपने प्रति संशय प्रकट करते हैं कि कही राम उन्हें सारे घटनाक्रम के लिए दोषी तो नहीं मान रहे | तब माँ कौशल्या राम के वन गमन का इन शब्दों में वर्णन कर भारत को सांत्वना देती हैं -------
‘ मुख प्रसन्न मन राम न रोषु -सब कर सब विधि कर परितोषु
‘ मुख प्रसन्न मन राम न रोषु -सब कर सब विधि कर परितोषु
अर्थात जब राम वन के लिए चले तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता थी , कोई राग , द्वेष या किसी भी प्रकार का रोष नहीं | सब को सब प्रकार से संतुष्ट करने बाद ही वे वन गए | यहाँ राम के आंतरिक संतुलन से भरे वैरागी रूप अर्थात ‘ जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये ‘ के दर्शन होते हैं | श्री राम को सुबह अयोध्या के राजा के रूप में राज तिलक होना था , पर उस साम्राज्य के राजा बनने के स्थान पर उन्हें अप्रत्याशित रूप से वनवास के लिए जाना पड़ा इस बात को वे रोकर या आक्रोश निकालकर सहन नहीं करते बल्कि नियति के इस रंग को प्रसन्नता और सहजता से शिरोधार्य करते हैं और अपने परम वैरागी रूप में दिखाई पड़ते हैं | राम के पिता रूप का भले ही तुलसीदास जी ने अधिक वर्णन नहीं किया पर ‘’मिले तनय दोनों उर लाई ‘’ लिख कर वे राम जी के पिता रूप का सजीव वर्णन करते हैं | तुलसीदास जी ने श्री राम के एक और रूप को बड़ी की भावप्रणवता से अपनी कालजयी कृति में शब्दांकित किया है | वह है श्री राम का श्रम जीवी रूप यानि सांवल वर्ण | उनके संघर्षशील व्यक्तित्व में इस श्याम अथवा नील वर्ण का बहुत महत्व है | सदियों से सांवले व्यक्ति को श्रम प्रधान छवि के रूप में देखा गया है और राम भी ज्यादातर जीवन मानवता के लिए त्याग ,युद्ध , आदर्शों की प्रतिस्थापना के लिए वनवास के रूप में बाहर खुले प्रकृति की गोद में गुजारते हुए अनथक श्रम का विधान रचते हैं , यही कारण है कि तुलसीदास जी राम के पौरुष सौदर्य का वर्णन करते समय उनके सांवले माथे पर पनपी पसीने की बूंद का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं और और उसे ‘ श्रमबिंदु सोहाए ‘ की उपमा से अलंकृत करते हैं | यानि पसीने को मेहनत का अद्भुत प्रतीक मान कर श्री राम के सन्दर्भ में श्रम को महत्व दिया है | अर्थात श्रम किसी भी सभ्यता की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक है -ये माना गया है -- साथ ही इंगित किया गया है जो कौम श्रम की अवहेलना करती है उसका विलुप्त होना तय है | तुलसी के राम सम भाव वाले है निषाद हों या शबरी , जटायु हो या केवट अथवा बन्दर भालू -- श्री राम की दृष्टि सबको एक सामान आत्मीयता से निहारती है | हनुमान को वे अपने भाई भरत तुल्य मानते हैं और
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई –-- कहकर अपना अनन्य स्नेह प्रदर्शित करते हैं | यही आभार वे सुग्रीव - विभीषण , जामवन्त अंगद , नल नील आदि के साथ प्रकट करते हैं और बताते हैं कि उनके सहयोग के बिना लंका विजय हरगिज संभव नहीं थी | राम के आराध्य भोलेनाथ शिव हैं तो शिव जी हर समय श्री राम के चिंतन में अपना समय बिताते हैं | इन दोनों के एक दुसरे को अपना अभिन्न अंग बताते तुलसीदास जी ने राम जी को शिव के अनन्य आराधक के रूप में परिभाषित किया है | और रामायण में शक्ति पूजा के रूप में राम की नारी शक्ति के प्रति आस्था को दर्शाया गया है | श्री राम जी के रूप में कौशल राज्य को ऐसा आदर्श प्रजा वत्सल और कल्याणकारी शासक मिला , जिसका ' रामराज्य '' युगों के लिए समस्त मानवता के लिए आदर्श का प्रतीक बन गया | जिसकी प्रासंगिकता हमेशा रही है | गोस्वामी जी रामराज्य के बारे में लिखते हैं कि उसमे ना केवल मानव बल्कि पक्षी , पशु ,वनस्पति , धरती , अम्बर , नदियाँ .समन्दर इत्यादि भी अपने आदर्श और मर्यादित रूप में आपसी सामंजस्य के साथ जीवनयापन करते हैं | उसमे किसी को दैहिक , दैविक और भौतिक दुःख नहीं सताते और ना ही अल्प आयु में मृत्यु का भय सताता है | | सारी प्रजा निरोग , बुद्धिमान और धर्मपरायण हैं | सबके नायक श्री राम समस्त प्रजा के प्रति संतानवत प्रीति रखते हैं | तभी तो ---
हर्षित रहन्हि नगर के लोगा -करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा |-- अर्थात नगर के लोग प्रसन्न रहते हैं और देवताओं को भी दुर्लभ सभी भोग भोगते हैं |
भूमि सप्त सागर मेखला एक भूप रघुपति कोसला
|अर्थात अयोध्या में श्री राम सात समुद्रो की मेखला वाली भूमि के एकमात्र राजा है | इस प्रकार हम देखते हैं कि तुलसी के राम अपने जीवन में अनेक आदर्श रूपों को जीते हुए आराध्य और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में हर भारतवासी के अतःकरण में सदैव विराजते हैं | सब से मुख्य सन्देश गोसाई जी इन पंक्तियों के रूप में देते हैं -----\सिया राम मय सब जग जानि --- करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी | |
चित्र ------------- गूगल से साभार ||
पाठकों के लिए विशेष ----------मेरा विनम्र आग्रह जरुर सुने -- मेरी सबसे ज्यादा पसंद , भजन सम्राट आदरणीय भीमसेन जोशी जी द्वारा गाई गयी गोस्वामी तुलसीदास जी की अद्भुत श्री राम वन्दना , | सदी का सबसे खूबसूरत भजन जिसकी प्रशंसा के लिए शब्द नहीं मेरे पास | ना जाने किन दिव्य पलों में तुलसीदास जी ने इसे लिखा होगा ,क्योकि उनकी अपनी ही लिखी श्री राम की स्तुतियों में ये श्रेष्ठतम है ऐसा मुझे लगता है और जिन पलों में इसकी रूहानी धुन और भीमसेन जोशी जी के स्वर पहली बार गूंजे होंगे शायद समय थम गया होगा !!!!!!! कोटि -- कोटि नमन गोसाई जी और इसको सुर -लय में बांधने वाले कलाकारों को और सुर- संगीत पंडित भीमसेन जोशी जी को !!!!!!!!!!!! |
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रचना पर अनमोल टिप्पणी -------गूगल प्लस से साभार
' तुलसी ' के राम का सर्वांगीण चित्र इतनी संजीदगी से आपने परोसा मानो तुलसी स्वयं अपने मानस की गद्यात्मक व्याख्या करने बैठे हो। हालांकि तुलसी के परमात्म स्वरूप मर्यादा पुरुषोत्तम मेरी दृष्टि में भटकते जीव मात्र हैं:- धन्य जनक धन जानकी तोरी। और धन्य! वसुधा का भ्रूण।। अशोक वाटिका कलुषित कारा। जग जननी पावन अक्षुण्ण।। प्रतीक बिम्ब सब राम कथा में। कौन है हारा और कौन जीता।। राम भटकता जीव मात्र है। परम ब्रह्म माँ शक्ति सीता।। अपनी अपनी व्याख्या! हालांकि मूल बात ये है के समाज की सभ्यता के निर्माण का यह उद्भव काल था जब नए मूल्य गढे जाने थे। क्रोंच के कामातुर प्रेमी नर जोड़े के वध से वेदना का जो ज्वार वाल्मिकी के मन मे फूटा उस करुणा से प्रसूत श्लोक में नारद ने राम की कथा को बांध दिया।यह संभवतः नए निर्मित होते समाज को मर्यादाओं में उत्कीलित करने का पुनीत प्रयास था।वाल्मिकी ने इसे अपने सुसंस्कृत देव् छन्दों में सजाकर राम को उन मर्यादाओ का प्रतीक संकेत बना दिया तो फिर तुलसी ने अपनी लोक भाषा मे इस मर्यादा पुरुष को लोकनायक बना दिया। आपकी विलक्षण प्रस्तुति के लिए साधुवाद और शुभ कामनाएं!!
-'
सोमवार, 18 सितंबर 2017
सुनो गिलहरी --------- कविता

पेड़ की फुनगी के मचान से
क्या खूब झांकती शान से ,
देह इकहरी काँपती ना हाँफती
निर्भय हो घूमती स्वाभिमान से !
पूँछ उठाये ,चौकन्नी निगाहें ,
चल देती जिधर मन आये
छत , दीवार , तार या खंबा --
बड़ी सरल हैं तुम्हारी राहें !
जहाँ जी चाहे आँख मूँद सो लेती
मसला पानी है ना रोटी ;
भूख में फल पेट भर खाती
माँ की रखी कुजिया से
झटपट पानी पी जाती !
घूमती डाल - डाल और पात - पात
मलाल नहीं कोई नहीं है साथ ,
आज की चिंता ना कल की फ़िक्र
देख लिए हैं पेड़ के सारे फल चखकर ,
फुदकती मस्ती में
हो बड़ी सयानी
बन बैठी हो पूरी
बगिया की महारानी ,
सुबह ,शाम ना देखती दुपहरी
दुनिया में तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!!
स्वरचित --रेणु
चित्र -- गूगल से साभार --
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गूगल से साभार -- अनमोल टिप्पणी --
स्वरचित --रेणु
चित्र -- गूगल से साभार --
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गूगल से साभार -- अनमोल टिप्पणी --
दुनिया मे तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!
जीवन का दर्शन, तुम जीती हर घड़ी ।
जीवन का दर्शन, तुम जीती हर घड़ी ।
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शनिवार, 16 सितंबर 2017
राह तुम्हारी तकते - तकते---------------- गीत

राह तुम्हारी तकते - तकते
बीते यूँ ही अनगिन पल साथी,
आस हुई मध्यम संग में
और नैना हुए सजल साथी !
बीते यूँ ही अनगिन पल साथी,
आस हुई मध्यम संग में
और नैना हुए सजल साथी !
दुनिया को बिसरा दिल ने
बस एक तुम्हें ही याद किया ,
हो चली दूभर जब तन्हाई
तुमसे मन ने संवाद किया ;
पल को भी मन की नम आँखों से
ना हो पाये तुम ओझल साथी ! !
बस एक तुम्हें ही याद किया ,
हो चली दूभर जब तन्हाई
तुमसे मन ने संवाद किया ;
पल को भी मन की नम आँखों से
ना हो पाये तुम ओझल साथी ! !
अप्राप्य से अनुराग ये मन का
क्यों हुआ ? कहाँ उत्तर इसका ?
इस राह की ना मंजिल कोई
फिर भी क्यों सुखद सफ़र इसका ?
प्रश्नों के भंवर में डूबे- उबरे
हुआ समय बड़ा बोझिल साथी !!
क्यों हुआ ? कहाँ उत्तर इसका ?
इस राह की ना मंजिल कोई
फिर भी क्यों सुखद सफ़र इसका ?
प्रश्नों के भंवर में डूबे- उबरे
हुआ समय बड़ा बोझिल साथी !!
था धूल सा निरर्थक ये जीवन
छू रूह से किया चन्दन तुमने ,
अंतस का धो सब ख़ार दिया
किया निष्कलुष और पावन तुमने ;
निर्मलता के तुम मूर्त रूप -
कोई तुम सा कहाँ सरल साथी !!!
छू रूह से किया चन्दन तुमने ,
अंतस का धो सब ख़ार दिया
किया निष्कलुष और पावन तुमने ;
निर्मलता के तुम मूर्त रूप -
कोई तुम सा कहाँ सरल साथी !!!
राह तुम्हारी तकते - तकते
यूँ ही बीते अनगिन पल साथी
आस हुई मध्यम संग में
ये नैना हुए सजल साथी !!.,
यूँ ही बीते अनगिन पल साथी
आस हुई मध्यम संग में
ये नैना हुए सजल साथी !!.,
चित्र--- गूगल से साभार !
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मंगलवार, 12 सितंबर 2017
पेड़ ने पूछा चिड़िया से- कविता
पेड़ ने पूछा चिड़िया से .
तेरी ‘ चहक’ का फल कहाँ लगता है ?
जिसको चख सृष्टि के कण - कण में
आनंद चहुँ ओर विचरता है !
जो फूल में गंध बन कर बसता,
करुणा से तार मन के कसता !
जो अनहद नाद-सा गुँजित हो
जड़ - प्रकृति में चेतन भरता !
वही साँसों में अमृत सा घुल
प्राणों में शक्ति भरता है !
यही कलरव सुन कर के
गोरी का अंतर्मन पुलक जाता !
कोई श्याम सखा चुपके से
कोरे मन में रंग भर जाता !
इससे निःसृत रस चाँद रात में
रास प्रेम का रचता है ।
माधुर्य का पर्याय बन
तू चहके मीठी पाग भरी !
कण - कण में स्पंदन भर देती
जब तू गूँजे आह्लाद भरी !
पात -पात बौराता अवनि पे
नवजीवन का सृजन करता है ! !
चिड़िया बोली-
'' जीवनपथ की मैं अनंत यायावर !
तृप्ति - अमृत घट लाती भर-भर,
अम्बर की विहंगमता नापूँ नन्हे पंखों से,
छूती विश्व का परम शिख्रर !
काल के माथे पर लिखा
ये कलरव अजर-अमर है
कविता , वाणी , वीणा में जो
नित नए स्वर रचता है !
मन बैरागी , आत्मगर्वा
और आत्माभिमानी कहाऊँ !
नन्हे पाखी को सौंप गगन को
मैं कर्तव्य निभाऊँ !
आजन्म मुक्त और निर्बंध मैं
मन चाहे जिधर उड़ जाऊँ !
सुन पेड़ सखा ! मेरी ' चहक' का फल
स्वछंद प्राणों में पलता है ,
मुक्त कंठ से हो निसृत जो
सृष्टि में नव -कौतूहल गढ़ता है n
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गुरुवार, 7 सितंबर 2017
तुम्हारी चाहत -------- कविता -----

अनमोल है तुम्हारी चाहत
जो नहीं चाहती मुझसे ,
कि मैं सजूँ , सवरूँ और रिझाऊँ तुम्हें ;
जो नहीं पछताती मेरे
विवादास्पद अतीत पर !
और मिथ्या आशा नहीं रखती
मेरे अनिश्चित भविष्य से ;
व्यर्थ के प्रणय निवेदन नहीं है ,
और न ही मुझे बदलने का कुत्सित प्रयास !
मेरी सीमायें और असमर्थतायें सभी जानते हो तुम ,
सुख में भले विरक्त रहो -
पर दुःख में मुझे संभालते हो तुम ;
ये चाहत नहीं चाहती
कि मैं बदलूं और भुला दूं अपना अस्तित्व !!
सच तो ये है कि --- ----अनंत है तुम्हारा आकाश ,
मेरी कल्पना से कहीं विस्तृत -----
जिस में उड़ रहे तुम और मैं भी स्वछंद हूँ -
सर्वत्र उड़ने के लिये ! !
अनमोल है तुम्हारी चाहत !!
सोमवार, 4 सितंबर 2017
मेरी वे अंग्रेजी शिक्षिका -------- संस्मरण ---
छात्र जीवन में शिक्षकों का महत्व किसी से छुपा नहीं | इस जीवन में अनेक शिक्षक हमारे जीवन में ज्ञान का आलोक फैलाकर आगे बढ़ जाते है पर वे हमारे लिए प्रेरणा पुंज बने हमारी यादों से कभी ओझल नहीं होते | एक शिक्षक के जीवन में अनगिन छात्र - छात्राएं आते हैं तो विद्यार्थी भी कई शिक्षकों से ज्ञान का उपहार प्राप्त कर अपने भविष्य को संवारता है | इनमे से कई समर्पित शिक्षक हमारे जीवन का आदर्श बन हमारी यादों में हमेशा के लिए बस जाते हैं |
शिक्षक दिवस के अवसर पर मुझे भी अपने छात्र जीवन के एक अविस्मरनीय प्रसंग को सांझा करने का मन हो आया है | बात तब की है - जब मै अपने गाँव के कन्या हाई स्कूल में दसवी में पढ़ती थी |यह स्कूल लडकियों का होने के कारण यहाँ पढ़ाने वाला सारा स्टाफ भी महिलाओं का ही था | बहुधा सभी अध्यापिकाएं पास के शहर चंडीगढ़ व पंचकूला इत्यादि से आती थीं | यूँ तो सारी अध्यापिकाएं अपने -अपने विषयों के प्रति समर्पित थी, पर हमारी अंग्रेजी विषय की अध्यापिका श्रीमती निर्मल महाजन का हमारी तीस लड़कियों वाली कक्षा के प्रति विशेष स्नेह था , क्योंकि वे जानती थी कि ग्रामीण परिवेश होने की वजह से हम सभी लड़कियों का अंग्रेजी ज्ञान अपेक्षाकृत बहुत कम था , उस पर पढ़ाने वाले स्टाफ की भी बहुधा कमी रहती थी | उस वर्ष वैसे भी आने वाले मार्च में हमारी दसवीं की बोर्ड की परीक्षाएं होनी थी | उन दिनों हरियाणा में अंग्रेजी भाषा स्कूलों में छठी कक्षा से पढाई जाती थी --एक ये भी कारण था कि बच्चे बोर्ड की क्लास में पहुँच कर भी अंग्रेजी में प्रायः बहुत अच्छे नहीं होते थे |श्री मति महाजन को बखूबी पता था कि हमारी अंग्रेजी भाषा की नींव अच्छी नहीं है अतः उन्होंने भाषा के समस्त नियम समझाकर हमें भाषा में पारंगत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी | वे अक्सर रविवार या किसी अन्य छुट्टी के दिन भी हमें अंग्रेजी पढ़ाने हमारे स्कूल पहुँच जाया करती !यहाँ तक कि दिसंबर महीने में जब सर्दकालीन अवकाश घोषित हुए तो उन्होंने हमारी कक्षा में आकर कहा कि वे अवकाश के दौरान भी हमें पढ़ने आया करेंगी , क्योंकि वे हमारे सलेबस की दुहराई करवाना चाहती हैं | उनकी यह बात सुनकर उनके पास खड़ी एक अन्य अध्यापिका बोल पड़ी-- ' कि इस कक्षा के साथ -साथ आपको अपनी बिटिया की पढाई का भी ध्यान रखना चाहिए ' तो वे बड़ी ही निश्छलता व स्नेह के साथ बोलीं -'' कि यहाँ मेरी तीस बेटियों को मेरी जरूरत है तो मैं अपनी एक बेटी की परवाह क्यों करूं ?'' उनके ये भाव भीने शब्द सुनकर मानों पूरी क्लास अवाक् रह गई !! क्योंकि हमें भी तभी पता चला कि उनकी अपनी बिटिया भी उसी साल मैट्रिक की परीक्षा देने वाली थी !उनके स्नेह से अभिभूत हम सब लड़कियां जी -जान से परीक्षा की तैयारी में जुट गईं ,वे भी दिसम्बर की कंपकंपा देने वाली सर्दी में हमें पढ़ाने चंडीगढ़ से हर-रोज लगभग तीस किलोमीटर का सफ़र करके आती रही | इसी बीच उनकी पदोन्नति हो गई और उनका तबादला जनवरी में ही किसी दूर के स्कूल में हो गया |जाने के दिन तक वे हमारी परीक्षा की तैयारी करवाने में जुटी रही |हम सब लड़कियों ने अश्रुपूरित आँखों से उन्हें भावभीनी विदाई दी | उसके बाद वे हमें कभी नहीं मिली | परीक्षा के बाद जब हमारे परिणाम घोषित हुए तो पूरी कक्षा बहुत ही अच्छे अंक लेकर पास हुई | उस समय हमें अपनी उन माँ तुल्य अध्यापिका की बहुत याद आई और हम सब लड़कियां उनको याद कर रो पड़ीं ! हमें ये मलाल रहा कि अपनी करवाई मेहनत का परिणाम देखने और हमारी ख़ुशी बाँटने के समय वे हमारे साथ नहीं थी | इतने साल बीत गए पर उनका दिया अंग्रेजी भाषा का वो ज्ञान जीवन में मेरे बड़ा काम आया , उसी ढंग से मैंने भी अपने बच्चों को अंग्रेजी पढाई |आज भी उन के उस निश्छल स्नेह को यादकर मेरा मन भर आता है और मन से यही दुआ निकलती है कि वे जहाँ भी हों स्वस्थ व सुखी हों |उन्हें मेरा विनम्र सादर नमन |
बुधवार, 30 अगस्त 2017
लम्पट बाबा ----- कविता
कहाँ से आये ये लम्पट बाबा ?
धर सर कथित ' ज्ञान ' का झाबा !!
गुरु ज्ञान की डुगडुगी बजायी -
विवेक हरण कर जनता लुभाई ,
श्रद्धा , अन्धविश्वास में सारे डूबे -
हुई गुम आडम्बर में सच्चाई ;
बन बैठे भगवान समय के
खुद बन गये काशी काबा !!
धन बटोरें दोनों हाथों से -
कलयुग के ये कुशल लुटेरे ,
खुद तृष्णा के पंक में डूबे
पर दे देते उपदेश बहुतेरे ;
खूब चलायें दूकान धर्म की
सुरा - सुंदरी में मन लागा!!
खुद को बताये आत्मज्ञानी -
तत्वदर्शी और गुरु महाज्ञानी ,
मन के काले और कपटी -
लोभी क्रोधी , कुटिल और कामी ;
'गुरु ' शब्द की घटाई महिमा -
बने संत समाज पे धब्बा !!
बुद्ध , राम, कृष्ण की पावन धरा पर
नानक , कबीर ,रहीम के देश में ,
बन हमदर्द , मसीहा लोगों के -
बैठे बगुले हंस वेश में
छद्म हरी -नाम बांसुरी तान चढ़ाई
करी मलिन हरि- भूमि की आभा !!
कहाँ से आये ये लम्पट बाबा ?
धर सर कथित 'ज्ञान ' का झाबा !!
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