
'पावन , निर्मल प्रेम सदा ही -- रहा शक्ति मानवता की , जग में ये नीड़ अनोखा है - जहाँ जगह नहीं मलिनता की ;; मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है |
मेरी प्रिय मित्र मंडली
गुरुवार, 7 सितंबर 2017
सोमवार, 4 सितंबर 2017
मेरी वे अंग्रेजी शिक्षिका -------- संस्मरण ---
छात्र जीवन में शिक्षकों का महत्व किसी से छुपा नहीं | इस जीवन में अनेक शिक्षक हमारे जीवन में ज्ञान का आलोक फैलाकर आगे बढ़ जाते है पर वे हमारे लिए प्रेरणा पुंज बने हमारी यादों से कभी ओझल नहीं होते | एक शिक्षक के जीवन में अनगिन छात्र - छात्राएं आते हैं तो विद्यार्थी भी कई शिक्षकों से ज्ञान का उपहार प्राप्त कर अपने भविष्य को संवारता है | इनमे से कई समर्पित शिक्षक हमारे जीवन का आदर्श बन हमारी यादों में हमेशा के लिए बस जाते हैं |
शिक्षक दिवस के अवसर पर मुझे भी अपने छात्र जीवन के एक अविस्मरनीय प्रसंग को सांझा करने का मन हो आया है | बात तब की है - जब मै अपने गाँव के कन्या हाई स्कूल में दसवी में पढ़ती थी |यह स्कूल लडकियों का होने के कारण यहाँ पढ़ाने वाला सारा स्टाफ भी महिलाओं का ही था | बहुधा सभी अध्यापिकाएं पास के शहर चंडीगढ़ व पंचकूला इत्यादि से आती थीं | यूँ तो सारी अध्यापिकाएं अपने -अपने विषयों के प्रति समर्पित थी, पर हमारी अंग्रेजी विषय की अध्यापिका श्रीमती निर्मल महाजन का हमारी तीस लड़कियों वाली कक्षा के प्रति विशेष स्नेह था , क्योंकि वे जानती थी कि ग्रामीण परिवेश होने की वजह से हम सभी लड़कियों का अंग्रेजी ज्ञान अपेक्षाकृत बहुत कम था , उस पर पढ़ाने वाले स्टाफ की भी बहुधा कमी रहती थी | उस वर्ष वैसे भी आने वाले मार्च में हमारी दसवीं की बोर्ड की परीक्षाएं होनी थी | उन दिनों हरियाणा में अंग्रेजी भाषा स्कूलों में छठी कक्षा से पढाई जाती थी --एक ये भी कारण था कि बच्चे बोर्ड की क्लास में पहुँच कर भी अंग्रेजी में प्रायः बहुत अच्छे नहीं होते थे |श्री मति महाजन को बखूबी पता था कि हमारी अंग्रेजी भाषा की नींव अच्छी नहीं है अतः उन्होंने भाषा के समस्त नियम समझाकर हमें भाषा में पारंगत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी | वे अक्सर रविवार या किसी अन्य छुट्टी के दिन भी हमें अंग्रेजी पढ़ाने हमारे स्कूल पहुँच जाया करती !यहाँ तक कि दिसंबर महीने में जब सर्दकालीन अवकाश घोषित हुए तो उन्होंने हमारी कक्षा में आकर कहा कि वे अवकाश के दौरान भी हमें पढ़ने आया करेंगी , क्योंकि वे हमारे सलेबस की दुहराई करवाना चाहती हैं | उनकी यह बात सुनकर उनके पास खड़ी एक अन्य अध्यापिका बोल पड़ी-- ' कि इस कक्षा के साथ -साथ आपको अपनी बिटिया की पढाई का भी ध्यान रखना चाहिए ' तो वे बड़ी ही निश्छलता व स्नेह के साथ बोलीं -'' कि यहाँ मेरी तीस बेटियों को मेरी जरूरत है तो मैं अपनी एक बेटी की परवाह क्यों करूं ?'' उनके ये भाव भीने शब्द सुनकर मानों पूरी क्लास अवाक् रह गई !! क्योंकि हमें भी तभी पता चला कि उनकी अपनी बिटिया भी उसी साल मैट्रिक की परीक्षा देने वाली थी !उनके स्नेह से अभिभूत हम सब लड़कियां जी -जान से परीक्षा की तैयारी में जुट गईं ,वे भी दिसम्बर की कंपकंपा देने वाली सर्दी में हमें पढ़ाने चंडीगढ़ से हर-रोज लगभग तीस किलोमीटर का सफ़र करके आती रही | इसी बीच उनकी पदोन्नति हो गई और उनका तबादला जनवरी में ही किसी दूर के स्कूल में हो गया |जाने के दिन तक वे हमारी परीक्षा की तैयारी करवाने में जुटी रही |हम सब लड़कियों ने अश्रुपूरित आँखों से उन्हें भावभीनी विदाई दी | उसके बाद वे हमें कभी नहीं मिली | परीक्षा के बाद जब हमारे परिणाम घोषित हुए तो पूरी कक्षा बहुत ही अच्छे अंक लेकर पास हुई | उस समय हमें अपनी उन माँ तुल्य अध्यापिका की बहुत याद आई और हम सब लड़कियां उनको याद कर रो पड़ीं ! हमें ये मलाल रहा कि अपनी करवाई मेहनत का परिणाम देखने और हमारी ख़ुशी बाँटने के समय वे हमारे साथ नहीं थी | इतने साल बीत गए पर उनका दिया अंग्रेजी भाषा का वो ज्ञान जीवन में मेरे बड़ा काम आया , उसी ढंग से मैंने भी अपने बच्चों को अंग्रेजी पढाई |आज भी उन के उस निश्छल स्नेह को यादकर मेरा मन भर आता है और मन से यही दुआ निकलती है कि वे जहाँ भी हों स्वस्थ व सुखी हों |उन्हें मेरा विनम्र सादर नमन |
बुधवार, 30 अगस्त 2017
लम्पट बाबा ----- कविता
कहाँ से आये ये लम्पट बाबा ?
धर सर कथित ' ज्ञान ' का झाबा !!
गुरु ज्ञान की डुगडुगी बजायी -
विवेक हरण कर जनता लुभाई ,
श्रद्धा , अन्धविश्वास में सारे डूबे -
हुई गुम आडम्बर में सच्चाई ;
बन बैठे भगवान समय के
खुद बन गये काशी काबा !!
धन बटोरें दोनों हाथों से -
कलयुग के ये कुशल लुटेरे ,
खुद तृष्णा के पंक में डूबे
पर दे देते उपदेश बहुतेरे ;
खूब चलायें दूकान धर्म की
सुरा - सुंदरी में मन लागा!!
खुद को बताये आत्मज्ञानी -
तत्वदर्शी और गुरु महाज्ञानी ,
मन के काले और कपटी -
लोभी क्रोधी , कुटिल और कामी ;
'गुरु ' शब्द की घटाई महिमा -
बने संत समाज पे धब्बा !!
बुद्ध , राम, कृष्ण की पावन धरा पर
नानक , कबीर ,रहीम के देश में ,
बन हमदर्द , मसीहा लोगों के -
बैठे बगुले हंस वेश में
छद्म हरी -नाम बांसुरी तान चढ़ाई
करी मलिन हरि- भूमि की आभा !!
कहाँ से आये ये लम्पट बाबा ?
धर सर कथित 'ज्ञान ' का झाबा !!
सोमवार, 28 अगस्त 2017
बीते दिन लौट रहे हैं -------- नवगीत

- ये सुनकर उमंग जागी है ,
- कि बीते दिन लौट रहे हैं ;
- उन राहों में फूल खिल गए -
- जिनमे कांटे बहुत रहे है !
- चिर प्रतीक्षा सफल हुई -
- यत्नों के फल अब मीठे हैं ,
- उतरे हैं रंग जो जीवन में-
- वो इन्द्रधनुष सरीखे हैं
- मिटी वेदना अंतर्मन की --
- खुशियों के दिन शेष रहे हैं -!!
- वो एक लहर समय की थी साथी -
- आई और आकर चली गई,
- कसक है इक निश्छल आशा -
- हाथ अपनों के छली गई ;
- छद्म वैरी गए पहचाने -
- जिनके अपनों के भेष रहे हैं !!
- पावन , निर्मल प्रेम सदा ही -
- रहा शक्ति मानवता की ,
- जग में ये नीड़ अनोखा है -
- जहाँ जगह नहीं मलिनता की ;
- युग आये - आकर चले गए ,
- पर इसके रूप विशेष रहे हैं !!
- उन राहों में फूल खिल गए
- जिनमे कांटे बहुत रहे हैं !!!!!!!
शनिवार, 19 अगस्त 2017
सुनो मनमीत ------------ नवगीत -------

प्रेम - पगे मन से आ मिल कर
इक अमर - गीत लिखें हम -तुम !
हार के भी सदा जीती है
जग में प्रीत लिखें हम - तुम !
तन पर अनगिन जख्म सहे
तब जाकर साकार हुई ,
मंदिर में रखी मूर्त यूँ हुई
पूज्य -पुनीत लिखें हम -तुम !
हार के भी सदा जीती है -
जग में प्रीत लिखे हम तुम !
तब जाकर साकार हुई ,
मंदिर में रखी मूर्त यूँ हुई
पूज्य -पुनीत लिखें हम -तुम !
हार के भी सदा जीती है -
जग में प्रीत लिखे हम तुम !
जो उलझ गई तूफानों से
वो भवसागर से पार हुई ,
उल्टी लहरों पर कश्ती ने
रचा जीवन - संगीत लिखें हम- तुम !
हार के भी सदा जीती है
जग में प्रीत लिखे हम तुम !!
वो भवसागर से पार हुई ,
उल्टी लहरों पर कश्ती ने
रचा जीवन - संगीत लिखें हम- तुम !
हार के भी सदा जीती है
जग में प्रीत लिखे हम तुम !!
जब राह ना मिलती इस जग से
तो चुनके राह सितारों की ,
मिलते जीवन के पार कहीं
वो मन के मीत लिखें हम -तुम !!
हार के भी सदा जीती है
जग में प्रीत लिखे हम तुम !!
तो चुनके राह सितारों की ,
मिलते जीवन के पार कहीं
वो मन के मीत लिखें हम -तुम !!
हार के भी सदा जीती है
जग में प्रीत लिखे हम तुम !!
सोमवार, 14 अगस्त 2017
सूर के श्याम ---------- जन्माष्टमी पर विशेष
भारतवर्ष के सांस्कृतिक ,सामाजिक और धार्मिक जीवन का एक अक्षुण अंग हैं राम और कृष्ण | राम जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम है - तो वही कृष्ण के ना जाने कितने रूप है | श्री कृष्ण को सम्पूर्णता का दूसरा नाम कहा गया है| वे चौसठ कला सम्पूर्ण माने गए हैं |सभी ललित कलाओं के केंद्र बिंदु श्री कृष्ण ही रहे हैं | वे योगेश्वर हैं- तो रसेश्वर भी हैं | | श्री कृष्ण के व्यक्तितव का विराट दिव्य तत्व - जन मानस को सदियों से आंदोलित करता आया है| उस की दिव्य आभा में ना जाने कितने भटके पथिको ने अपनी मंजिल पायी है | श्री कृष्ण एक चंचल बालक से लेकर एक कुटनीतिक परामर्शदाता से के साथ- साथ एक अच्छे मित्र , समर्पित प्रेमी , एक उत्तम गृहस्थ , विरल योद्धा और सामाजिक चिन्तक आदि अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैं | एक माता - पिता से जन्म का संबध तो दुसरे पालक माता - पिता के साथ वात्सल्य का अनूठा रिश्ता !!
जन्म से पहले ही अनेक षड्यंत्रों की छाया में जन्म कहीं- तो जन्म के बाद पालन पोषण कहीं और !! ना जाने कितने कवियों , साहित्यकारों और इतिहासकारों ने श्री कृष्ण को प्रेरणा मान कर अनेक ग्रन्थ रचे | भक्तिकाल के कवियों में सूरदास ने तो श्री कृष्ण के जीवन के अनेक रूपों का अपनी रचनाओं में अत्यंत सजीव वर्णन किया है | कहा जाता है कि सूरदास जी जन्म से देख पाने में असमर्थ थे , फिर भी उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से श्री कृष्ण के जीवन को निहार कर अपनी रचनाओं में उनके जीवन की अनेक सुंदर सजीव झांकियां प्रस्तुत की | उनका बाल - रूप वर्णन तो बेजोड़ है ही - साथ ही गोपियों के विरह को जो उन्होंने शब्द प्रदान किये उनका साहित्य में कोई सानी नहीं है | सूर की रचनाओं में कृष्ण के जीवन की अनुपम झांकी सजी है | उनके साहित्य में मधुरता की धारा बहती है क्यो कि श्री कृष्ण उनके परम आराध्य है और वे अपने इस इष्ट देव के अनन्य भक्त !! बाल कान्हा के सहज सुदर रूप का वर्णन करते उनके अनेक पद साहित्य की कालजयी धरोहर है |
उनके पदों में वर्णित कान्हा अपनी अनूठी बाल सुलभ चेष्टाओं के कारण एक सुंदर छवि धारण कर हर व्यक्ति के मन में ऐसी जगह बना लेते हैं कि हर कोई सृष्टि के इस विलक्षण बालक के साथ सदैव के लिए अपनेपन के सूत्र में बांध जाता है |माखन चोरी करते , माँ से रुठते ,शिकायत करते , गोपियों के साथ रास रचाते कान्हा के अनगिन मनोहारी चित्र सजे हैं | सूरदास श्रृंगार रस के कवि थे | उन्होंने संयोग और वियोग दोनों तरह के भावों को बड़ी मधुरता के साथ प्रस्तुत किया है | सूर के बालकृष्ण के जीवन के कुछ चित्र देखिये ----------------
जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै।
तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै॥
कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावैं।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनि पावै॥
सुर दास जी ने बालक कृष्ण को पालने में झुलाती माँ यशोदा के साथ बाल कृष्ण की शयनावस्था का मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया है| वे कहते हैं;;कि हरि को माँ यशोदा पालने में झुलाती है --पालना हिलाती है -- नन्हे कान्हा को दुलारती है --कभी उनका मुख चूमती कुछ गाने लगती हैं | फिर शिकायत करती हैं कि क्यों नींद मेरे लाल को सुलाने नहीं आती अर्थात माँ की इतनी चेष्ठाओं के बाद भी कान्हा अभी तक जगे हैं | फिर कह्ती हैं - कि अरी निदिया तुझे कान्हा बुलाता है-- तू आ क्यों नहीं जाती ? कन्हैया अभी भी कभी पलके मूंद लेते हैं - तो कभी होंठ हिलाने लगते हैं | हरि को सोया जानकर वे चुपचाप संकेतों से बात करती हैं, फिर भी कान्हा अकुलाकर उठ जाते हैं और माँ यशोदा फिर से मधुर स्वर में गाने लगती हैं | सूरदास जी माँ यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते हैं कि नन्द की पत्नी अर्थात यशोदा को जो सुख मिला है वह तो देवों और मुनियों के लिए भी दुर्लभ है |
एक अन्य पद में सूरदास जी लिखते है कि--------
सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥
चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए।
लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥
कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।
धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥
अर्थात हरि हाथ में मक्खन लिए शोभायमान हो रहे हैं | अभी बस घुटनों के बल ही चल पाते हैं अर्थात बड़े छोटे हैं | उनका तन धूल में लिपटा है तो मुंह दही में सना है | गाल बड़े सुंदर और आँखे बड़ी चंचल हैं | वहीँ माथे पर गोरोचन का तिलक लगा है | बालों की लट कपोल को छूकर इस तरह निकल रही है मानों भँवरे रस पीकर मतवाले हो गए हों | उस पर गले में पड़े सिंह नख का कंठहार - प्रभु के बाल रूप के सौन्दर्य को कई गुना बढ़ा रहा है | अंत में सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु के इस रूप को निहारने का एक पल का सुख भी कई सौ कल्प जीने के सुख से कहीं बढ़कर है |
एक और पद में भक्त शिरोमणि सूरदास जी ने बालक कृष्ण के बेजोड़ रूप का चित्र खींचा है जिसमे हरि माँ यशोदा दे बड़ी ही बाल सुलभ शिकायत करते नजर आते हैं -- पूछते हैं कि
मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी ?
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।
काढ़त ,गुहत ,न्हवावत -जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥
अर्थात ' 'मैया ये मेरी चोटी कब बड़ी होगी ? कितनी बार तू मुझे दूध पिलाती है पर ये है कि अब तक छोटी की छोटी ही है | तू तो कहती थी कि ये बलराम की चोटी जैसी खूब लम्बी मोटी हो जायेगी , इसके लिए तू नित्य प्रति मुझे नहलाकर बालों को संवारती है चोटी में गुंथती है ताकि ये बड़ी होकर भूमि पर नागिन जैसी लोटने लगे -इसी लिए तू मुझे रोज कच्चा दूध पिलाती है और माखन रोटी खाने को नहीं देती है '' [ जो कि श्री कृष्ण का प्रिय आहार है ]सूरदास जी कहते हैं कि तीनों लोकों में कृष्ण - बलराम की जोड़ी मन को हर अनंत सुख देने वाली है | इस पद में बाल कृष्ण का सरस वार्तालाप मन को आलौकिक सुख प्रदान करता है |
अन्य पद में भी सूरदास जी बाल मन का मनोवैज्ञानिक चित्रण कर कन्हैया की माँ से शिकायत को बड़े ही मीठे शब्दों में पिरोया है | बाल कृष्ण माँ को कहते हैं कि---
मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।
मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो॥
कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात।
पुनि पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात
चुटकी दै दै ग्वाल नचावत हंसत सबै मुसुकात॥
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं जसुमति सुनि सुनि रीझै॥
सुनहु कान बलभद्र चबाई जनमत ही को धूत।
सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥
अर्थात '' माँ मुझे दाऊ अर्थात बलराम बहुत चिढाता है | मुझसे कहता है कि तुझे माँ यशोदा ने जन्म नहीं दिया बल्कि मोल लिया है | क्या कहूँ इसीदुःख के कारण मैं खेलने भी नहीं जाता हूँ | वो मुझसे बार बार पूछता है कि कौन तुम्हारी माता है और कौन पिता ? वह कहता है , कि नन्द बाबा और माँ यशोदा दोनों गोरे रंग के हैं फिर तू कहाँ से सांवले शरीर वाला है ? जब सब ग्वालों के आगे वह यह बात पूछता है तो वे सब भी चुटकी देकर हँस| ते , नाचते हैं और मुस्कुराते हैं | तू भी मुझी को मारना सीखी है , इस बलराम पर कभी भी नहीं खीजती '| ' माँ यशोदा कान्हा की ये रोष भरी बातें सुनकर उस पर रीझती हुई कहती हैं --'' कि सुनों कान्हा ! बलराम तो जन्म से ही चुगलखोर और धूर्त है अर्थात वो झूठ बोलता है | '' सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु को विश्वास दिलाने के लिए माँ यशोदा कहती है की उन्हें गोधन की सौगंध है - कि वे कृष्ण की जननी और वे उनके पुत्र हैं |
सूरदासजी अपने एक अन्य प्रसिद्ध पद में बालक कृष्ण के माखन चोरी में पकडे जाने पर उनकी बाल सुलभ सफाई को बहुत ही भाव स्पर्शी शब्दों में पिरोया है| नन्हे कान्हा द्वारा दी गयी इस सफाई को सुनकर सुनने वाले नन्हे कन्हैया के भोलेपन के प्रति अनायास ही आकर्षित हो जाते हैं | सुरदास जी लिखते है -------
मैया! मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥
देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो।
हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥
मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो।
डारि सांटि मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥
बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो।
सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो॥
कान्हा बड़ी ही मासूमियत से स्वयं को निर्दोष बताते हैं ''कि मेरी मैया मैंने माखन नहीं खाया है | ये बाल सखा मेरे बैरी हो गए हैं जिन्होंने मेरे मुख पर जबरदस्ती ये माखन लगा दिया है| तू ही देख तूने छींका कितने ऊपर लटकाया है
| तू बता मेरे इन नन्हे हाथों से मैं ये सब कैसे कर सकता हूँ ? '' ये कहकर अपने मुंह से माखन पोंछ कर कान्हा -माखन का दोना अपने पीछे छिपा लेते हैं | माँ यशोदा- जो कान्हा को पीटने के लिए छड़ी लिए खड़ी हैं --ने छडी फैंक दी और कान्हा के भोले उद्गारों को सुन मुस्कुराते हुए नन्हे श्याम को गले से लगा लेती हैं | सूरदास जी कहते हैं कि जो सुख यशोदा को मिला है उसे शिव और ब्रह्मा भी नहीं पा सकते |
बाल लीला के साथ साथ सूरदास जी ने गोपियों के विरह को बहुत ही गहराई से समझ उनके अंतस की पीड़ा को बड़े ही मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया
| जब बलराम के श्री कृष्ण मथुरा च ले गए तो विरह में डूबी गोपियों को समझाने के लिए उधो जी को भेजा जाता है -- उस समय रोष से भरी गोपियाँ उन्हें खरी खरी सुनाती है और कह उठती हैं -----
उधो मन नाहि दस बीस -
एक हुतो सो गयो श्याम संग
को अवराधै ईस॥
आगे वे कहती हैं
निशदिन बरसात नैन हमारे
सदा रहत पावस ऋतू हम पर
जब ते श्याम सिधारे |
असल में सूरदास ने ज्ञान और वैराग्य तत्व से कहीं अधिक महत्व प्रेम तत्व को दिया है | भले ही उन्होंने अपने काव्य में विरहणी गोपियों की वेदना को शब्द दिए हैं पर उनका उद्देश्य श्याम के प्रति प्रेम का ऊँचा मूल्याङ्कन करना ही था- जिसमे वे सफल हुए हैं | सच तो ये है कि सूरदास और श्याम सलोने एक मजबूत डोर से बंधे हैं - और अपनि रचनाओं के माध्यम से वे अपने आराध्य को मानव स्वरूप में ढालने में सफल हुये हैं |
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गुरुवार, 10 अगस्त 2017
अपराजिता ----------- कहानी --
संघर्ष की धूप ने गौरवर्णी तारो को ताम्रवर्णी बना दिया था | लगता था , नियति ने ऐसा कोई वार नहीं छोड़ा -जिससे तारो को घायल न किया हो, पर तारो थी कि नियति के हर वार को सहती - निडरता से जीवन की राह पर चलती ही जा रही थी | लोग कहते थे ,बड़ी अभागी है तारो – क्या कभी तारो के जीवन में कोई ख़ुशी आएगी ? ये देखते –देखते बरस के बरस बीते जा रहे थे | पर जिस तारो से खुशियाँ वर्षों से रूठी थी - उस तारो के घर के दरवाजे पर आज खुशियों ने दस्तक दे दी थी | छवि को याद आया ------------------------------
जब उसने वर्षों पहले नई नवेली दुल्हन के रूप में पहली बार तारो को देखा था, तो वह बार -बार अपनी पलकें झपका रही थी , कि कहीं ये सपना तो नहीं |मोटी- मोटी आँखों वाली गोरी चिट्टी ,लम्बी , पतली लाल जोड़े में सजी तारो किसी परी या अप्सरा से कम नहीं लग रही थी | जगतार के साथ उसकी जोड़ी इतनी खूब लग रही थी कि मानो ईश्वर ने दोनों को एक दूसरे के लिए ही बनाया हो ! सेना का बांका जवान जगतार भी आकर्षण में तारो से किसी तरह कम न था | बहुत दिनों तक गाँव भर में उनकी बेमिसाल जोड़ी के चर्चे होते रहे | तारो के सास – ससुर निहाल थे-- इतनी सुन्दर – सुघड़ व सुशील बहू पाकर --तो वहीँ तारो भी इतना प्यार करने वाले , सरलता व सादगी से भरे लोगों को ससुराल में पाकर फूली नहीं समा रही थी | जगतार के पिता ने मेहनत मजदूरी कर के अपने तीनों बेटों को अच्छी शिक्षा दिलवाई थी | दो बड़े बेटे दूर के शहरों में सपरिवार रह अच्छा खा कमा रहे थे ,सबसे छोटा जगतार कबड्डी का अच्छा खिलाडी और शारीरिक रूप से स्वस्थ था |वह सेना में भर्ती हो कर देश की सेवा करना चाहता था | उसकी लगन का नतीजा था कि अपने प्रथम प्रयास में ही वह सेना में भर्ती होने में सफल हो गया | इसके लगभग तीन साल बाद ही जगतार की शादी तारो से हो गई | जगतार शादी के बाद तक छह वर्षों तक साल में दो बार छुट्टी लेकर घर आता और परिवार व गाँव वालों से मिलकर वापस चला जाता | इसी बीच तारो एक बेटे व दो जुड़वां बेटियों की माँ बन गई | बेटे के जन्म के दो दिन बाद ही जगतार एक महीने की छुट्टी लेकर घर आया | उसने खुशी में खूब ढोल बजवाया और मिठाइयाँ बांटी। ।खुशी की रौ में अपने बेटे को गोद में लेकर मस्ती में नाचता रहा और चिल्लाता रहा ‘’अरे अपने बेटे को तो मैं फ़ौज में अपने जैसा फौजी बनाऊंगा जी --जो मेरी तरह देश की सेवा करेगा -------------''! !
जगतार का घर छवि के स्कूल के रास्ते में पड़ता था ,जहाँ तारो अपने सास –ससुर के साथ रहती थी ,जिसमें दो छोटे कमरे व बड़ा सा कच्चा आँगन था | स्कूल आते- जाते छवि तारो के घर में झाँकने से खुद को रोक न पाती थी - तो घर के कामों में लगी तारो भी उसके झाँकने पर और सामने दिख जाने पर उसे निराश न करती और निश्छलता व स्नेह से मुस्कुरा उठती | सफ़ेद धवल दांतों की पंक्ति जगमगा उठती , तो नन्ही छवि शर्मा कर भाग जाती | तारो सास -ससुर की सेवा व बच्चों की देख भाल जी जान से करती | कुछ दिनों के बाद सुना गया कि जगतार की पोस्टिंग पंजाब के एक शहर में हो गई है , जहाँ उसके उल्लेखनीय कार्यों व कर्मठता के लिए सेना ने उसे पदोन्नति दे कर हवलदार बना दिया है | इसके थोड़े दिन बाद ही जगतार छुट्टी लेकर घर आया और कुछ दिन गाँव में रहने के बाद अपने माता- पिता की अनुमति लेकर तारो व बच्चों को कुछ दिनों के लिए घूमाने -फिराने अपने साथ पंजाब ले गया | लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था | तारो को जगतार के पास गए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन अपनी ड्यूटी से घर लौटते वक़्त जगतार को किसी वाहन ने टक्कर मार दी - जिससे वह बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़ा | राह चलते लोगों ने सेना के इस घायल जवान को तुरंत ही अस्पताल पहुँचाया , जहाँ उपचार के बाद उसे होश तो आ गया , पर उसके सिर में गंभीर चोट लगने की वजह से उसके दिमाग को भारी क्षति पहुंची थी - जिससे वह कुछ भी सोचने- समझने लायक न रह गया था, यद्यपि वह शारीरिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ था |अब जो जगतार था वह नाम का जगतार था - न वह तारो को पहचानता था न अपने बच्चों को -- अपनी ही दुनिया में खोया जगतार कभी अंग्रेजी के कुछ शब्द बोलता या फिर फौजी स्टाइल में लेफ्ट राईट –लेफ्ट राईट करने लग जाता
| मिलिट्री अस्पताल के कई डाक्टरों ने जगतार का सूक्ष्म मुआयना किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जगतार अब कभी सामान्य नहीं हो सकता | उनके दिए प्रमाण- पत्रों के आधार पर सेना ने नाम की पेंशन देकर अपने इस जवान को समय पूर्व ही सेवानिवृत कर दिया | रोती- बिलखती तारो जगतार को एक जिन्दा लाश के रूप में लेकर घर लौट आई थी | उसकी दुनिया निराशा के अंधेरों से घिर चुकी थी | उसकी हँसती - खेलती जिन्दगी को न जाने किस की नज़र लग चुकी थी कि उसकी जिन्दगी में अप्रत्याशित दुखों व संघर्ष ने डेरा डाल लिया था | जगतार ही पूरे परिवार की खुशियों का केंद्र था | उसके इस हाल ने उसके माता – पिता को गहरा आघात पहुँचाया जिससे वे ज्यादा दिनों तक न जी पाए | तारो के पिता नहीं थे और भाई भी आर्थिक रूप से कमजोर थे अतः मायके की तरफ से कुछ भी आशा रखना व्यर्थ था | हाँ जगतार के दोनों भाई यदा- कदा कुछ मदद अवश्य कर देते पर अपने खर्चे बढ़ जाने पर उन्होंने भी हाथ खीँच लिया | शुरू में तारो की आँखों में आंसू भरे रहते थे | जगतार का यह रूप उसके लिए असहनीय था | जो जगतार उसकी एक हँसी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहता था -आज उसके दिन- रात आंसू बहाने का भी उस पर कोई असर न था | तारो ने एक दो परिचितों की सलाह पर अपने गहने इत्यादि बेच कर जगतार को अलग -अलग शहरों के कई डॉक्टरों को दिखाया पर नतीजा शून्य ही रहा !
तारो नियति के जाल में उलझ चुकी थी | बच्चों के साथ –साथ जगतार को संभालना एक दुष्कर कार्य था |वह जब - तब कंही बाहर भाग जाता तब उसे पकड कर लाना बड़ा कठिन था | कई बार अपने गाँव या फिर पास के गाँव के जान- पहचान वाले लोग उसे पकड़ कर लाते व उसे समझाने की कोशिश करते पर हर बात उसकी समझ से बाहर थी ,यंहा तक कि उसे अपनी भूख प्यास व अन्य कामों का कोई आभास न था | तारो को ही उसकी हर बात का ख्याल रखना पड़ता | धीरे -धीरे तारो सब घटनाक्रम को रब का लिखा मान कर सारे कामों की अभ्यस्त हो गई | जब तक सास –ससुर रहे , तारो - घर की दहलीज के भीतर ही रही - पर सास –ससुर के न रहने पर उसे आजीविका के लिए मजदूरी करने घर से बाहर निकलना ही पड़ा , क्योंकि जगतार की नाम की पेंशन से उसका गुजारा नामुमकिन था | पहले –पहले उसकी नज़र शर्म से झुक जाती और वह असहज हो जाती पर बाद में गाँव में उसे जो कोई भी कोई काम सौंपता वह बड़ी लगन से उसे करती | बच्चे कुछ बड़े हुए - वे भी घर के कामों में उसकी मदद करने लगे | तारो के तीनों बच्चे पढने में बहुत अच्छे थे अतः तारो उन्हे उच्च शिक्षा दिलाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी -खासकर उसका बेटा निहाल पढाई के साथ –साथ खेलों में भी बहुत अच्छा था | उसके स्कूल के सभी अध्यापक उसकी प्रतिभा से प्रभावित हो, पढाई में उसकी हर मदद करने को तैयार रहते | गाँव वाले भी जरूरत पड़ने पर हर मदद करते | छवि ने देखा तारो उस दुल्हन वाले रूप लावण्य को न जाने कहाँ छोड़ कर असमय एक अधेड़ महिला के रूप में परिवर्तित हो गई थी !! लोगों के बर्तन मांजने व सफाई करने में उसके सुकोमल हाथ बदरंग व पत्थर जैसे कठोर हो गए थे | अपनी शादी में जब छवि ने उसे लगातार कई दिन बर्तन मांजते देखा तो उसका दिल खून के आंसू रो पड़ा | पर तारो का चेहरा न जाने कैसा भावहीन व सपाट हो गया था | उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि वह कहाँ व कैसा काम कर रही थी | छवि के बुलाने पर वह उसके पास आई और भावभीना आशीर्वाद देकर चली गई |
शादी के बाद भी छवि तारो के बारे में जानने को उत्सुक रहती |पिछली बार जब तारो उससे मिली तो उसने बताया कि उसका बेटा निहाल पास के शहर के सरकारी कालेज से बी.ए. कर रहा है व बेटियां बारहवीं कलास में पढ़ रही हैं | जगतार की हालत बरसों से जस की तस थी - हाँ ,समय ने सेना के इस जांबाज सिपाही को हड्डियों का ढांचा बना कर रख छोड़ा था जो अब किसी बूढ़े आदमी जैसा दिखने लगा था और समाज व परिवार से बेखबर वह अपनी ही दुनिया में विचरता रहता -- पर अब ज्यादा दूर जाने व भागने की ताकत अब उसमें नहीं बची थी अतः वह घर के आसपास या घर में ही घूमता रहता था ------------------
आज तारो के घर का रास्ता फिर से खुशियों ने देख लिया था कारण था तारो का बेटा सेना में सीधे हवलदार भर्ती हुआ था --जहाँ से जगतार ने अपना मकसद अधूरा छोड़ा था --वहां के लिए बेटे को तैयार करने के लिए तारो एक तपस्विनी की भांति लगी रही ,जो एक ऐसे पति का सपना था - आज जिसे न अपना होश था न अपने सपने का --- हाँ अपनी शादी के बाद छह साल तक जगतार से मिले प्रेम की कृतज्ञता उसके साथ थी ! ! तारो के आँगन में बजता ढोल व पंजाबी गीतों पर मस्ती में झूमते- नाचते लोगों के पैरों से उडती धूल आसमान तक जा रही थी -------- मानों ईश्वर को चिढ़ा रही थी कि तुमने कितनी ही बाधाएं खड़ीं कीं - कितना रास्ते में भटकाया पर एक अपराजिता ने आज अंततः अपनी मंजिल ढूँढ ही ली थी ! ! सदा चेहरे पर घूँघट रखने वाली तारो आज घूंघट छोड़ व लोकलाज भूल आँगन में मस्त हो पंजाबी बोलियों पर गिद्दा कर रही थी |आज उसके जीवन के कांटे फूलों में बदल गए थे |छवि की आँखे उसे खुशी में झूमते देख नम हो गईं | मुद्दत के बाद उसने तारो को खुल कर हँसते देखा !! अचानक जगतार की हुंकार सुन कर उसने पीछे मुड़कर देखा - सब खुशियों से बेखबर जगतार लेफ्ट- राईट ,लेफ्ट - राईट करता गली में छोटे बच्चों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था |
स्व लिखित -- रेण------------
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गूगल प्लस से अनमोल टिप्पणी साभार

जब उसने वर्षों पहले नई नवेली दुल्हन के रूप में पहली बार तारो को देखा था, तो वह बार -बार अपनी पलकें झपका रही थी , कि कहीं ये सपना तो नहीं |मोटी- मोटी आँखों वाली गोरी चिट्टी ,लम्बी , पतली लाल जोड़े में सजी तारो किसी परी या अप्सरा से कम नहीं लग रही थी | जगतार के साथ उसकी जोड़ी इतनी खूब लग रही थी कि मानो ईश्वर ने दोनों को एक दूसरे के लिए ही बनाया हो ! सेना का बांका जवान जगतार भी आकर्षण में तारो से किसी तरह कम न था | बहुत दिनों तक गाँव भर में उनकी बेमिसाल जोड़ी के चर्चे होते रहे | तारो के सास – ससुर निहाल थे-- इतनी सुन्दर – सुघड़ व सुशील बहू पाकर --तो वहीँ तारो भी इतना प्यार करने वाले , सरलता व सादगी से भरे लोगों को ससुराल में पाकर फूली नहीं समा रही थी | जगतार के पिता ने मेहनत मजदूरी कर के अपने तीनों बेटों को अच्छी शिक्षा दिलवाई थी | दो बड़े बेटे दूर के शहरों में सपरिवार रह अच्छा खा कमा रहे थे ,सबसे छोटा जगतार कबड्डी का अच्छा खिलाडी और शारीरिक रूप से स्वस्थ था |वह सेना में भर्ती हो कर देश की सेवा करना चाहता था | उसकी लगन का नतीजा था कि अपने प्रथम प्रयास में ही वह सेना में भर्ती होने में सफल हो गया | इसके लगभग तीन साल बाद ही जगतार की शादी तारो से हो गई | जगतार शादी के बाद तक छह वर्षों तक साल में दो बार छुट्टी लेकर घर आता और परिवार व गाँव वालों से मिलकर वापस चला जाता | इसी बीच तारो एक बेटे व दो जुड़वां बेटियों की माँ बन गई | बेटे के जन्म के दो दिन बाद ही जगतार एक महीने की छुट्टी लेकर घर आया | उसने खुशी में खूब ढोल बजवाया और मिठाइयाँ बांटी। ।खुशी की रौ में अपने बेटे को गोद में लेकर मस्ती में नाचता रहा और चिल्लाता रहा ‘’अरे अपने बेटे को तो मैं फ़ौज में अपने जैसा फौजी बनाऊंगा जी --जो मेरी तरह देश की सेवा करेगा -------------''! !
जगतार का घर छवि के स्कूल के रास्ते में पड़ता था ,जहाँ तारो अपने सास –ससुर के साथ रहती थी ,जिसमें दो छोटे कमरे व बड़ा सा कच्चा आँगन था | स्कूल आते- जाते छवि तारो के घर में झाँकने से खुद को रोक न पाती थी - तो घर के कामों में लगी तारो भी उसके झाँकने पर और सामने दिख जाने पर उसे निराश न करती और निश्छलता व स्नेह से मुस्कुरा उठती | सफ़ेद धवल दांतों की पंक्ति जगमगा उठती , तो नन्ही छवि शर्मा कर भाग जाती | तारो सास -ससुर की सेवा व बच्चों की देख भाल जी जान से करती | कुछ दिनों के बाद सुना गया कि जगतार की पोस्टिंग पंजाब के एक शहर में हो गई है , जहाँ उसके उल्लेखनीय कार्यों व कर्मठता के लिए सेना ने उसे पदोन्नति दे कर हवलदार बना दिया है | इसके थोड़े दिन बाद ही जगतार छुट्टी लेकर घर आया और कुछ दिन गाँव में रहने के बाद अपने माता- पिता की अनुमति लेकर तारो व बच्चों को कुछ दिनों के लिए घूमाने -फिराने अपने साथ पंजाब ले गया | लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था | तारो को जगतार के पास गए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन अपनी ड्यूटी से घर लौटते वक़्त जगतार को किसी वाहन ने टक्कर मार दी - जिससे वह बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़ा | राह चलते लोगों ने सेना के इस घायल जवान को तुरंत ही अस्पताल पहुँचाया , जहाँ उपचार के बाद उसे होश तो आ गया , पर उसके सिर में गंभीर चोट लगने की वजह से उसके दिमाग को भारी क्षति पहुंची थी - जिससे वह कुछ भी सोचने- समझने लायक न रह गया था, यद्यपि वह शारीरिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ था |अब जो जगतार था वह नाम का जगतार था - न वह तारो को पहचानता था न अपने बच्चों को -- अपनी ही दुनिया में खोया जगतार कभी अंग्रेजी के कुछ शब्द बोलता या फिर फौजी स्टाइल में लेफ्ट राईट –लेफ्ट राईट करने लग जाता
| मिलिट्री अस्पताल के कई डाक्टरों ने जगतार का सूक्ष्म मुआयना किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जगतार अब कभी सामान्य नहीं हो सकता | उनके दिए प्रमाण- पत्रों के आधार पर सेना ने नाम की पेंशन देकर अपने इस जवान को समय पूर्व ही सेवानिवृत कर दिया | रोती- बिलखती तारो जगतार को एक जिन्दा लाश के रूप में लेकर घर लौट आई थी | उसकी दुनिया निराशा के अंधेरों से घिर चुकी थी | उसकी हँसती - खेलती जिन्दगी को न जाने किस की नज़र लग चुकी थी कि उसकी जिन्दगी में अप्रत्याशित दुखों व संघर्ष ने डेरा डाल लिया था | जगतार ही पूरे परिवार की खुशियों का केंद्र था | उसके इस हाल ने उसके माता – पिता को गहरा आघात पहुँचाया जिससे वे ज्यादा दिनों तक न जी पाए | तारो के पिता नहीं थे और भाई भी आर्थिक रूप से कमजोर थे अतः मायके की तरफ से कुछ भी आशा रखना व्यर्थ था | हाँ जगतार के दोनों भाई यदा- कदा कुछ मदद अवश्य कर देते पर अपने खर्चे बढ़ जाने पर उन्होंने भी हाथ खीँच लिया | शुरू में तारो की आँखों में आंसू भरे रहते थे | जगतार का यह रूप उसके लिए असहनीय था | जो जगतार उसकी एक हँसी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहता था -आज उसके दिन- रात आंसू बहाने का भी उस पर कोई असर न था | तारो ने एक दो परिचितों की सलाह पर अपने गहने इत्यादि बेच कर जगतार को अलग -अलग शहरों के कई डॉक्टरों को दिखाया पर नतीजा शून्य ही रहा !
तारो नियति के जाल में उलझ चुकी थी | बच्चों के साथ –साथ जगतार को संभालना एक दुष्कर कार्य था |वह जब - तब कंही बाहर भाग जाता तब उसे पकड कर लाना बड़ा कठिन था | कई बार अपने गाँव या फिर पास के गाँव के जान- पहचान वाले लोग उसे पकड़ कर लाते व उसे समझाने की कोशिश करते पर हर बात उसकी समझ से बाहर थी ,यंहा तक कि उसे अपनी भूख प्यास व अन्य कामों का कोई आभास न था | तारो को ही उसकी हर बात का ख्याल रखना पड़ता | धीरे -धीरे तारो सब घटनाक्रम को रब का लिखा मान कर सारे कामों की अभ्यस्त हो गई | जब तक सास –ससुर रहे , तारो - घर की दहलीज के भीतर ही रही - पर सास –ससुर के न रहने पर उसे आजीविका के लिए मजदूरी करने घर से बाहर निकलना ही पड़ा , क्योंकि जगतार की नाम की पेंशन से उसका गुजारा नामुमकिन था | पहले –पहले उसकी नज़र शर्म से झुक जाती और वह असहज हो जाती पर बाद में गाँव में उसे जो कोई भी कोई काम सौंपता वह बड़ी लगन से उसे करती | बच्चे कुछ बड़े हुए - वे भी घर के कामों में उसकी मदद करने लगे | तारो के तीनों बच्चे पढने में बहुत अच्छे थे अतः तारो उन्हे उच्च शिक्षा दिलाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी -खासकर उसका बेटा निहाल पढाई के साथ –साथ खेलों में भी बहुत अच्छा था | उसके स्कूल के सभी अध्यापक उसकी प्रतिभा से प्रभावित हो, पढाई में उसकी हर मदद करने को तैयार रहते | गाँव वाले भी जरूरत पड़ने पर हर मदद करते | छवि ने देखा तारो उस दुल्हन वाले रूप लावण्य को न जाने कहाँ छोड़ कर असमय एक अधेड़ महिला के रूप में परिवर्तित हो गई थी !! लोगों के बर्तन मांजने व सफाई करने में उसके सुकोमल हाथ बदरंग व पत्थर जैसे कठोर हो गए थे | अपनी शादी में जब छवि ने उसे लगातार कई दिन बर्तन मांजते देखा तो उसका दिल खून के आंसू रो पड़ा | पर तारो का चेहरा न जाने कैसा भावहीन व सपाट हो गया था | उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि वह कहाँ व कैसा काम कर रही थी | छवि के बुलाने पर वह उसके पास आई और भावभीना आशीर्वाद देकर चली गई |
शादी के बाद भी छवि तारो के बारे में जानने को उत्सुक रहती |पिछली बार जब तारो उससे मिली तो उसने बताया कि उसका बेटा निहाल पास के शहर के सरकारी कालेज से बी.ए. कर रहा है व बेटियां बारहवीं कलास में पढ़ रही हैं | जगतार की हालत बरसों से जस की तस थी - हाँ ,समय ने सेना के इस जांबाज सिपाही को हड्डियों का ढांचा बना कर रख छोड़ा था जो अब किसी बूढ़े आदमी जैसा दिखने लगा था और समाज व परिवार से बेखबर वह अपनी ही दुनिया में विचरता रहता -- पर अब ज्यादा दूर जाने व भागने की ताकत अब उसमें नहीं बची थी अतः वह घर के आसपास या घर में ही घूमता रहता था ------------------
आज तारो के घर का रास्ता फिर से खुशियों ने देख लिया था कारण था तारो का बेटा सेना में सीधे हवलदार भर्ती हुआ था --जहाँ से जगतार ने अपना मकसद अधूरा छोड़ा था --वहां के लिए बेटे को तैयार करने के लिए तारो एक तपस्विनी की भांति लगी रही ,जो एक ऐसे पति का सपना था - आज जिसे न अपना होश था न अपने सपने का --- हाँ अपनी शादी के बाद छह साल तक जगतार से मिले प्रेम की कृतज्ञता उसके साथ थी ! ! तारो के आँगन में बजता ढोल व पंजाबी गीतों पर मस्ती में झूमते- नाचते लोगों के पैरों से उडती धूल आसमान तक जा रही थी -------- मानों ईश्वर को चिढ़ा रही थी कि तुमने कितनी ही बाधाएं खड़ीं कीं - कितना रास्ते में भटकाया पर एक अपराजिता ने आज अंततः अपनी मंजिल ढूँढ ही ली थी ! ! सदा चेहरे पर घूँघट रखने वाली तारो आज घूंघट छोड़ व लोकलाज भूल आँगन में मस्त हो पंजाबी बोलियों पर गिद्दा कर रही थी |आज उसके जीवन के कांटे फूलों में बदल गए थे |छवि की आँखे उसे खुशी में झूमते देख नम हो गईं | मुद्दत के बाद उसने तारो को खुल कर हँसते देखा !! अचानक जगतार की हुंकार सुन कर उसने पीछे मुड़कर देखा - सब खुशियों से बेखबर जगतार लेफ्ट- राईट ,लेफ्ट - राईट करता गली में छोटे बच्चों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था |
स्व लिखित -- रेण------------
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गूगल प्लस से अनमोल टिप्पणी साभार
कहानी अच्छी लगी.
पंजाब हिमाचल और गढ़वाल जैसे क्षेत्रों में इस तरह के किस्से अक्सर सुनने में आते हैं.
पंजाब हिमाचल और गढ़वाल जैसे क्षेत्रों में इस तरह के किस्से अक्सर सुनने में आते हैं.
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मंगलवार, 8 अगस्त 2017
हिमालय वंदन ------------ कविता --

सुना है हिमालय हो तुम !
शिव के तुम्हीं कैलाश हो -
चित्र ------- गूगल से साभार -- ----------------------------------------------------------------------------------------
सुदृढ़ , अटल और अविचल
जीवन का विद्यालय हो तुम ! !
शिव के तुम्हीं कैलाश हो -
माँ जगदम्बा का वास हो ,
निर्वाण हो महावीर का
ऋषियों का चिर - प्रवास हो ;
ज्ञान - भक्ति से भरा -
बुद्ध का करुणालय हो तुम ! !
युगों से अजेय हो
वीरों की विजय हो तुम ,
लालसा में शिखर की
साहस का गन्तव्य हो तुम ;
संघर्ष का उत्कर्ष हो
नीति का न्यायालय हो तुम ! !
कवियों का मधुर गान हो
मुरली की मीठी तान हो ,
शीतल उच्छवास सृष्टि का
राष्ट्र का अभिमान हो ;
नभ के संदेशे बांटता -
मेघों का पत्रालय हो तुम ! !
हिम - शिखरों से सजा
माँ भारत का उन्नत भाल हो ,
टेढ़ी नजर से ताकते
शत्रु का महाकाल हो ;
बसा भारत कण -कण में जिसके
कश्मीर से मेघालय हो तुम ! !
सुदृढ़ , अटल और अविचल -
जीवन का विद्यालय हो तुम ! !
सुना है हिमालय हो तुम !!!
अनमोल टिप्पणी -- गूगल से साभार --
जननी के हिम किरीट की अभ्यर्थना में गाये गए गीत की भाषा भी सागरमाथा की तरह दिव्य , विराट! आपकी लेखनी से भाव प्रवणता उसी कल कल गति से प्रवाहित हो रही है जैसे हिमालय की गोद से निःसृत गंगा! आपकी लेखनी की प्रांजलता अमर हो. बधाई!
गुरुवार, 3 अगस्त 2017
शुक्र है गाँव में ------------- कविता --
शुक्र है गाँव में
इक बरगद तो बचा है ,
जिसके नीचे बैठते
रहीम चचा हैं !!
हर आने -जाने वाले को सदायें देते हैं
चाचा सबकी बलाएँ लेते हैं ,
धन कुछ पास नहीं उनके
बस खूब दुआएं देते हैं ;
नफरत से कोसों दूर है
चाचा का दिल सच्चा है !!
सिख - हिन्दू या हो मुसलमान
चाचा के लिए सब एक समान ,
माला में मोती - से गुंथे रहें सब
यही चाचा का है अरमान ;
समझाते सबको - एक है वो मालिक -
जिसने संसार रचा है !!
बरगद से चाचा हैं -
चाचा सा बरगद है ,
दोनों की छांव --
गाँव की सांझी विरासत है ;
दोनों ने गाँव के उपवन को -
अपने स्नेह से सींचा है !!
शुक्र है गाँव में इक
बरगद तो बचा है
जिसके नीचे बैठते -
रहीम चचा हैं !! !!!!!!!!!
सोमवार, 31 जुलाई 2017
गा रे जोगी ! ----- कविता --
बढ़े हर मन में प्रीत जोगी !
जहाँ थी प्यार ठाँव जोगी ;
भूले पनघट के गीत प्यारे
खो गई पीपल की छाँव जोगी ,
बढ़ी दूरी ऐसी मनों में
बिछड़े मन के मीत जोगी !!
बैठ फुर्सत में गाँव टीले
कस सारंगी के तार ढीले ,
छेड़ कोई तान प्यारी
सजें उल्फत के रंग सजीले ;
पनपे प्यार हर दिल में
सुन मस्त संगीत जोगी !
सुना है , तेरी दुआ पुरअसर जोगी
जो जाती खुदा के दर जोगी ,
तू पढ़ कलमा मुहब्बत का
उतरे नफरत का जहर जोगी ;
हारे हर बुरी फितरत
छेड़ कोई तान प्यारी
सजें उल्फत के रंग सजीले ;
पनपे प्यार हर दिल में
सुन मस्त संगीत जोगी !
सुना है , तेरी दुआ पुरअसर जोगी
जो जाती खुदा के दर जोगी ,
तू पढ़ कलमा मुहब्बत का
उतरे नफरत का जहर जोगी ;
हारे हर बुरी फितरत
प्यार की हो जीत जोगी !!
गारे कोई ऐसा गीत जोगी
बढ़े हर मन में प्रीत जोगी ! !
गारे कोई ऐसा गीत जोगी
बढ़े हर मन में प्रीत जोगी ! !
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विशेष रचना
आज कविता सोई रहने दो !
आज कविता सोई रहने दो, मन के मीत मेरे ! आज नहीं जगने को आतुर सोये उमड़े गीत मेरे ! ना जाने क्या बात है जो ये मन विचलित हुआ जाता है ! अना...
