मेरी प्रिय मित्र मंडली

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

अपराजिता ----------- कहानी --

   संघर्ष की धूप ने  गौरवर्णी   तारो को ताम्रवर्णी   बना  दिया था  |   लगता था  , नियति ने ऐसा कोई वार नहीं छोड़ा  -जिससे   तारो  को घायल न किया हो, पर तारो थी कि नियति के हर वार को सहती - निडरता से जीवन की राह पर चलती  ही जा रही थी   |  लोग कहते थे ,बड़ी अभागी है तारो – क्या कभी तारो  के जीवन में   कोई  ख़ुशी आएगी ? ये देखते –देखते बरस के बरस बीते जा रहे थे   | पर जिस तारो से खुशियाँ  वर्षों  से रूठी थी - उस तारो के घर के दरवाजे पर आज खुशियों ने दस्तक  दे दी थी | छवि को याद आया   ------------------------------
  जब उसने वर्षों पहले   नई नवेली दुल्हन के रूप में पहली बार तारो को देखा था, तो वह बार -बार अपनी पलकें झपका  रही थी , कि कहीं ये सपना तो नहीं |मोटी-  मोटी  आँखों वाली गोरी  चिट्टी ,लम्बी  , पतली लाल जोड़े में  सजी तारो किसी परी  या अप्सरा  से कम नहीं लग रही थी |  जगतार के  साथ उसकी  जोड़ी इतनी  खूब  लग रही थी     कि  मानो  ईश्वर ने दोनों  को एक दूसरे के लिए ही बनाया  हो !   सेना का बांका जवान जगतार  भी आकर्षण में तारो से  किसी  तरह  कम न था |  बहुत दिनों तक गाँव  भर में उनकी  बेमिसाल जोड़ी के चर्चे होते  रहे | तारो के सास – ससुर  निहाल थे-- इतनी सुन्दर – सुघड़ व सुशील  बहू पाकर --तो वहीँ तारो भी इतना प्यार  करने वाले , सरलता व सादगी से भरे लोगों को ससुराल में पाकर फूली नहीं  समा रही थी  |   जगतार के पिता ने   मेहनत मजदूरी  कर के  अपने तीनों बेटों को  अच्छी शिक्षा दिलवाई थी | दो बड़े बेटे दूर के शहरों  में सपरिवार  रह अच्छा खा कमा  रहे थे ,सबसे छोटा  जगतार  कबड्डी  का अच्छा खिलाडी और  शारीरिक रूप से स्वस्थ था |वह सेना में भर्ती हो  कर  देश की सेवा करना  चाहता था |  उसकी  लगन का नतीजा  था कि अपने  प्रथम  प्रयास  में ही वह सेना में भर्ती होने में  सफल हो गया |   इसके  लगभग  तीन साल बाद ही जगतार की शादी  तारो से हो गई |  जगतार  शादी के बाद   तक छह वर्षों  तक साल में दो बार छुट्टी लेकर घर आता और परिवार व गाँव वालों से मिलकर वापस चला जाता |   इसी बीच तारो एक बेटे व दो जुड़वां  बेटियों  की माँ बन गई |  बेटे के जन्म  के  दो दिन बाद ही जगतार एक महीने की छुट्टी  लेकर घर आया    |  उसने खुशी में खूब ढोल  बजवाया और  मिठाइयाँ  बांटी। ।खुशी की  रौ में अपने बेटे को गोद में लेकर मस्ती में नाचता रहा और चिल्लाता  रहा ‘’अरे  अपने बेटे को तो मैं फ़ौज  में अपने  जैसा  फौजी    बनाऊंगा जी  --जो मेरी तरह  देश  की सेवा करेगा  -------------''!   !    
जगतार  का घर   छवि के स्कूल  के रास्ते में पड़ता  था ,जहाँ तारो अपने सास –ससुर के साथ रहती थी ,जिसमें दो छोटे कमरे व बड़ा सा कच्चा आँगन था |  स्कूल आते- जाते  छवि तारो के घर में झाँकने  से खुद  को रोक न पाती  थी -  तो घर के कामों में लगी तारो भी  उसके झाँकने पर और सामने दिख  जाने पर   उसे  निराश न  करती और निश्छलता  व स्नेह से मुस्कुरा उठती |  सफ़ेद धवल दांतों की पंक्ति जगमगा उठती  ,  तो नन्ही छवि शर्मा कर भाग  जाती |    तारो  सास -ससुर की सेवा व बच्चों  की देख भाल जी जान से करती    |   कुछ दिनों के बाद सुना गया  कि जगतार की पोस्टिंग पंजाब के एक शहर में हो   गई   है  , जहाँ  उसके उल्लेखनीय कार्यों व कर्मठता के लिए सेना ने उसे पदोन्नति  दे कर हवलदार बना दिया  है   | इसके   थोड़े  दिन  बाद  ही  जगतार छुट्टी लेकर घर आया और कुछ दिन गाँव में रहने  के बाद  अपने माता- पिता  की अनुमति लेकर तारो व  बच्चों को कुछ  दिनों के लिए घूमाने -फिराने अपने साथ पंजाब ले गया    |  लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था    |  तारो को  जगतार  के पास गए  कुछ ही दिन हुए थे  कि एक दिन अपनी  ड्यूटी  से घर लौटते वक़्त जगतार को किसी  वाहन ने टक्कर मार दी    - जिससे वह बेहोश होकर सड़क पर गिर  पड़ा   |  राह चलते  लोगों ने सेना के इस घायल  जवान  को तुरंत  ही अस्पताल  पहुँचाया , जहाँ उपचार के बाद उसे होश तो आ गया , पर उसके सिर में गंभीर चोट लगने की वजह से उसके  दिमाग  को भारी क्षति  पहुंची  थी - जिससे वह कुछ भी सोचने-  समझने लायक न रह गया था, यद्यपि वह शारीरिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ था  |अब जो जगतार था वह नाम का जगतार  था -  न वह  तारो को  पहचानता था न अपने  बच्चों को -- अपनी  ही दुनिया  में खोया  जगतार कभी अंग्रेजी  के कुछ शब्द  बोलता या फिर फौजी स्टाइल में लेफ्ट राईट –लेफ्ट राईट करने लग जाता 
  |  मिलिट्री अस्पताल के कई  डाक्टरों ने जगतार का सूक्ष्म  मुआयना किया और इस निष्कर्ष  पर पहुंचे   कि जगतार  अब कभी  सामान्य  नहीं हो सकता | उनके दिए प्रमाण- पत्रों  के आधार  पर सेना ने  नाम की  पेंशन  देकर अपने  इस जवान को समय पूर्व ही  सेवानिवृत   कर दिया    |  रोती- बिलखती  तारो जगतार को एक जिन्दा  लाश के रूप  में लेकर  घर लौट आई थी  | उसकी दुनिया  निराशा  के अंधेरों  से घिर चुकी  थी |  उसकी हँसती - खेलती  जिन्दगी को न जाने किस की  नज़र लग चुकी थी  कि  उसकी जिन्दगी  में अप्रत्याशित  दुखों व संघर्ष  ने डेरा डाल लिया था   |   जगतार ही पूरे  परिवार की खुशियों  का केंद्र  था   | उसके  इस हाल ने  उसके माता – पिता को गहरा  आघात   पहुँचाया    जिससे  वे ज्यादा दिनों  तक  न जी  पाए |  तारो के पिता नहीं थे और भाई  भी आर्थिक  रूप से  कमजोर थे  अतः मायके की तरफ से कुछ भी आशा  रखना  व्यर्थ था | हाँ  जगतार के दोनों  भाई यदा- कदा कुछ  मदद अवश्य कर देते  पर अपने  खर्चे बढ़ जाने पर उन्होंने भी  हाथ खीँच लिया |   शुरू  में तारो की आँखों  में आंसू  भरे  रहते थे  |  जगतार  का यह रूप उसके  लिए असहनीय था   |   जो जगतार उसकी एक   हँसी पर अपना  सर्वस्व      न्यौछावर  करने  को तैयार  रहता  था  -आज उसके दिन- रात आंसू  बहाने  का भी उस पर कोई असर न  था | तारो ने  एक दो  परिचितों की  सलाह पर अपने  गहने इत्यादि  बेच कर जगतार को  अलग -अलग  शहरों  के कई डॉक्टरों  को  दिखाया  पर  नतीजा शून्य   ही रहा   ! 

तारो   नियति  के जाल में उलझ चुकी थी |   बच्चों के साथ –साथ  जगतार  को संभालना  एक  दुष्कर कार्य था   |वह जब - तब कंही बाहर भाग  जाता   तब उसे पकड कर लाना बड़ा कठिन था |  कई बार  अपने गाँव या फिर पास के गाँव के जान- पहचान  वाले लोग  उसे पकड़ कर लाते व उसे समझाने  की कोशिश  करते  पर  हर बात उसकी समझ से बाहर थी ,यंहा तक कि उसे  अपनी भूख प्यास व   अन्य कामों का कोई आभास न था |  तारो को ही उसकी हर बात का ख्याल रखना पड़ता    |  धीरे  -धीरे तारो सब घटनाक्रम  को  रब का लिखा मान कर सारे कामों की अभ्यस्त हो गई | जब तक सास –ससुर  रहे , तारो - घर की दहलीज  के भीतर ही रही   - पर सास –ससुर के न रहने पर  उसे आजीविका  के लिए मजदूरी  करने  घर से बाहर  निकलना ही पड़ा ,  क्योंकि  जगतार की नाम की पेंशन  से उसका  गुजारा  नामुमकिन  था |   पहले –पहले  उसकी नज़र  शर्म से झुक जाती और वह  असहज  हो जाती   पर बाद में गाँव  में     उसे जो कोई भी कोई  काम  सौंपता  वह बड़ी लगन से उसे करती |  बच्चे कुछ बड़े हुए - वे  भी  घर के कामों में उसकी  मदद  करने लगे | तारो  के तीनों बच्चे  पढने  में बहुत  अच्छे थे   अतः  तारो  उन्हे   उच्च  शिक्षा  दिलाने  के लिए  हर संभव   प्रयास कर  रही  थी  -खासकर  उसका  बेटा निहाल पढाई  के साथ –साथ खेलों  में भी  बहुत  अच्छा था   |  उसके  स्कूल  के सभी  अध्यापक  उसकी प्रतिभा  से प्रभावित हो,  पढाई में उसकी हर मदद करने को तैयार  रहते |  गाँव वाले भी  जरूरत  पड़ने पर हर  मदद  करते   | छवि  ने देखा  तारो  उस  दुल्हन वाले रूप लावण्य को  न  जाने  कहाँ  छोड़ कर असमय एक अधेड़  महिला  के रूप में परिवर्तित  हो गई थी   !! लोगों  के बर्तन  मांजने  व  सफाई  करने  में  उसके  सुकोमल  हाथ बदरंग  व  पत्थर  जैसे  कठोर  हो गए  थे |  अपनी  शादी  में जब  छवि  ने उसे  लगातार  कई दिन बर्तन  मांजते  देखा  तो उसका दिल खून  के आंसू  रो पड़ा |  पर  तारो का चेहरा  न जाने कैसा  भावहीन  व सपाट हो गया  था   |  उसे  कोई  फर्क  नहीं पड़ रहा  था कि वह  कहाँ   व कैसा  काम कर  रही  थी   | छवि के बुलाने  पर वह  उसके पास  आई और  भावभीना  आशीर्वाद  देकर चली  गई   |


शादी  के बाद  भी छवि  तारो के बारे  में जानने  को उत्सुक  रहती |पिछली  बार जब  तारो  उससे  मिली  तो उसने  बताया कि उसका बेटा निहाल पास के शहर  के सरकारी  कालेज  से बी.ए. कर रहा है   व   बेटियां  बारहवीं  कलास में  पढ़  रही हैं    |   जगतार की हालत  बरसों  से जस की तस  थी - हाँ ,समय ने सेना के इस जांबाज  सिपाही को हड्डियों  का ढांचा  बना  कर रख  छोड़ा  था जो  अब  किसी  बूढ़े  आदमी जैसा  दिखने  लगा  था और समाज व परिवार  से बेखबर वह अपनी ही दुनिया  में विचरता  रहता --  पर अब ज्यादा  दूर  जाने  व भागने  की ताकत  अब उसमें  नहीं  बची  थी अतः वह घर के आसपास  या घर में ही घूमता  रहता था ------------------


आज  तारो के घर का रास्ता फिर से खुशियों ने देख  लिया था कारण  था तारो का बेटा सेना में सीधे हवलदार  भर्ती हुआ था --जहाँ से जगतार ने अपना मकसद  अधूरा छोड़ा  था --वहां के लिए बेटे को तैयार  करने के लिए तारो एक तपस्विनी की भांति  लगी रही ,जो एक ऐसे  पति का सपना था   -  आज  जिसे न अपना होश था न अपने सपने का  --- हाँ  अपनी  शादी  के  बाद छह साल तक   जगतार  से  मिले  प्रेम की  कृतज्ञता  उसके  साथ  थी   !  !  तारो के आँगन में बजता ढोल व पंजाबी गीतों पर मस्ती में झूमते- नाचते लोगों के पैरों से उडती धूल आसमान तक  जा रही थी --------  मानों  ईश्वर को चिढ़ा  रही थी    कि तुमने  कितनी ही  बाधाएं  खड़ीं  कीं  -  कितना  रास्ते में भटकाया पर एक अपराजिता  ने आज अंततः  अपनी  मंजिल  ढूँढ ही ली थी  ! !   सदा  चेहरे पर घूँघट  रखने  वाली तारो  आज घूंघट  छोड़ व  लोकलाज भूल आँगन में मस्त हो  पंजाबी  बोलियों पर गिद्दा  कर रही थी   |आज उसके  जीवन के कांटे फूलों में बदल  गए थे  |छवि की आँखे उसे  खुशी  में झूमते  देख   नम  हो गईं   |  मुद्दत  के बाद उसने  तारो  को खुल  कर हँसते  देखा !!   अचानक  जगतार की  हुंकार   सुन कर उसने  पीछे  मुड़कर देखा -  सब खुशियों से बेखबर जगतार लेफ्ट-  राईट ,लेफ्ट - राईट  करता  गली में छोटे  बच्चों  के आकर्षण  का केंद्र  बना हुआ था |

स्व लिखित -- रेण------------
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गूगल  प्लस से अनमोल टिप्पणी साभार 
Harsh Wardhan Jog's profile photo
कहानी अच्छी लगी.
पंजाब हिमाचल और गढ़वाल जैसे क्षेत्रों में इस तरह के किस्से अक्सर सुनने में आते हैं.
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मंगलवार, 8 अगस्त 2017

हिमालय वंदन ------------ कविता --

हिमालय -  वंदन   ----------- - कविता
सुना है हिमालय हो तुम !
सुदृढ़ , अटल और अविचल  
जीवन का विद्यालय हो तुम ! ! 

शिव के तुम्हीं कैलाश हो - 
माँ जगदम्बा का वास हो , 
निर्वाण हो महावीर का 
ऋषियों का चिर - प्रवास हो ; 
 ज्ञान  - भक्ति से भरा - 
बुद्ध का करुणालय हो तुम ! !

युगों से अजेय हो  
वीरों की विजय हो तुम , 
लालसा में शिखर की 
साहस का गन्तव्य हो तुम ; 
संघर्ष का उत्कर्ष हो  
नीति का न्यायालय हो तुम ! ! 

कवियों का मधुर गान हो  
मुरली की मीठी तान हो , 
शीतल उच्छवास  सृष्टि का 
राष्ट्र का अभिमान हो ; 
नभ के संदेशे बांटता - 
मेघों का पत्रालय हो तुम ! ! 

हिम - शिखरों से सजा 
माँ भारत का उन्नत भाल हो , 
टेढ़ी नजर से ताकते  
शत्रु का महाकाल हो ; 
 बसा भारत कण -कण में जिसके 
कश्मीर से मेघालय हो तुम ! ! 

सुदृढ़ , अटल और अविचल -
जीवन का विद्यालय हो तुम ! ! 
सुना है हिमालय हो तुम !!! 


चित्र ------- गूगल से साभार --   ----------------------------------------------------------------------------------------

अनमोल टिप्पणी -- गूगल से साभार --
जननी के हिम किरीट की अभ्यर्थना में गाये गए गीत की भाषा भी सागरमाथा की तरह दिव्य , विराट! आपकी लेखनी से भाव प्रवणता उसी कल कल गति से प्रवाहित हो रही है जैसे हिमालय की गोद से निःसृत गंगा! आपकी लेखनी की प्रांजलता अमर हो. बधाई!
  • amansingh charan's profile photo
    बहुत खूबसुरत कविता है, मित्र
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गुरुवार, 3 अगस्त 2017

शुक्र है गाँव में ------------- कविता --










 शुक्र  है  गाँव में   
इक  बरगद  तो  बचा  है ,
जिसके  नीचे  बैठते    
  रहीम  चचा  हैं !!  
हर आने -जाने वाले को सदायें  देते  हैं   
चाचा  सबकी  बलाएँ  लेते हैं  ,
 धन कुछ  पास  नहीं  उनके   
बस   खूब  दुआएं   देते  हैं   ;  
नफरत   से  कोसों  दूर  है   
चाचा  का  दिल  सच्चा   है   !!  
सिख  - हिन्दू  या  हो  मुसलमान  
चाचा  के  लिए  सब  एक  समान   , 
माला  में मोती  - से   गुंथे  रहें  सब  
यही  चाचा   का  है  अरमान  ;  
समझाते  सबको - एक है वो  मालिक -  
जिसने  संसार   रचा है   !! 
   
बरगद   से  चाचा   हैं  -  
 चाचा   सा   बरगद    है  , 
  दोनों   की    छांव  --   
गाँव  की सांझी विरासत  है ;  
दोनों  ने  गाँव  के  उपवन   को - 
अपने  स्नेह  से सींचा है  !!   
 
शुक्र  है  गाँव में  इक  
 बरगद  तो  बचा  है 
जिसके  नीचे  बैठते   -
  रहीम  चचा  हैं !!  !!!!!!!!!  

सोमवार, 31 जुलाई 2017

गा रे जोगी ! ----- कविता --


     

  गा रे! कोई ऐसा गीत जोगी ,
  बढ़े हर  मन  में  प्रीत  जोगी !  

ना  रहा अब  वैसा  गाँव   जोगी, 
जहाँ   थी  प्यार   ठाँव   जोगी ; 
भूले पनघट के  गीत  प्यारे   
खो  गई   पीपल की  छाँव जोगी ,
 बढ़ी दूरी   ऐसी  मनों में 
 बिछड़े मन के  मीत  जोगी  !! 

बैठ फुर्सत में गाँव टीले  
 कस  सारंगी   के  तार  ढीले ,
 छेड़   कोई  तान  प्यारी 
 सजें    उल्फत  के  रंग सजीले ;
पनपे  प्यार हर     दिल  में 
सुन   मस्त संगीत जोगी !

सुना है , तेरी  दुआ पुरअसर जोगी 
जो  जाती खुदा  के दर  जोगी ,
तू  पढ़    कलमा  मुहब्बत  का  
 उतरे  नफरत का  जहर  जोगी ;
हारे  हर  बुरी फितरत  
प्यार की हो  जीत  जोगी !!
गारे कोई ऐसा गीत जोगी 
 बढ़े   हर   मन   में  प्रीत  जोगी ! ! 

शनिवार, 29 जुलाई 2017

तुम्हारे दूर जाने से ---------- कविता


तुम्हारे  दूर जाने से साथी ---  कविता --

 तुम्हारे   दूर जाने  से  साथी   
 बरबस    ये   एहसास   हुआ ,
दिन  का  हर  पहर  था  खोया-सा 
मन का जैसे  वनवास   हुआ   ! 

अनुबंध  नहीं कोई  तुमसे ,
जीवन - भर साथ  निभाने  का !
.फिर  भी भीतर भय व्याप्त  है,   
 तुम्हें  पाकर  खो  जाने  का  !
समझ ना  पाया  दीवाना मन  
अपरिचित  कोई क्यों  ख़ास  हुआ ?

तुमने जो दी सौगात  हमें ,
ना कोई आज तलक दे पाया साथी!
सबने  भरे आँख में   आँसूं ,
पर  तुमने   खूब   हँसाया  साथी !
भर  दिया   खुशियों   से आँचल   
सिकुड़ा  मन   अनंत   आकाश  हुआ !!

हम दर्द की राह के राही थे,  
था  खुशियों से  कहाँ नाता अपना ?
तुम बन के   मसीहा ना  मिलते,   
कब सोया नसीब जग पाता अपना !
खिली  मन  की  मुरझाई   कलियाँ 
 हर  पल जैसे  मधुमास  हुआ !! 

आज तुम्हारे   दूर जाने  से साथी  
 बरबस      ये   एहसास   हुआ 
दिन  का  हर  पहर  था  खोया-सा 
मन का  जैसे  वनवास    हुआ   !! 
चित्र -------- गूगल से साभार --
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 गूगल प्लस से साभार --रचना पर अनमोल टिप्पणी --
sonu bns's profile photo
आदरणीया रेणु जी,
आपकी रचना पढ़ा।इसके एक एक शब्द मन को छू गया।कितनी अच्छी पंक्ति"अनुबंध नही कोई तुमसे जीवन भर साथ निभाने का,फिर भी भीतर भय व्याप्त है तुमको पाकर खो जाने का"।बहुत बहुत धन्यवाद आपका इतनी अच्छी रचना के लिए।

Renu's profile photo
+sonu जी बहुत बहुत आभार कि आपने रचना की आत्मा सरीखी पंक्तियाँ चुनी | आपको पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ | एक बार फिर से आभार और नमन इस उत्साहवर्धन के लिए |
REPLY
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रविवार, 23 जुलाई 2017

आई आँगन के पेड़ पे चिड़िया --- कविता

आई  आँगन  के  पेड़  पे  चिड़िया ------- कविता

आई आँगन के पेड़ पे चिड़िया ,
उड़ती जाती फुर्र - फुर्र  ,
 चाल  चले मस्त  लहरिया !

राह  भूली थी  शायद 
 तब इधर आई , 
देख हरे नीम ने भी 
बाहें फैलाई !
फुदके पात- पात ,
 हर डाल पे घूमें , 
कभी सो जाती 
बना डाली का तकिया ! 
उल्लास में खोई --
 फिरे शोर मचाती , 
मीठा गाना गाती -
थोड़ा दाना चुग जाती , 
देख हँसे  खिल-खिल मुन्ना ,
उदास थी अब  मुस्काई मुनिया ! 

हुआ भरा- भरा सा ,
सूना था आँगन, 
घर का हर कोना 
पुलक बना है मधुबन ,
तुम्हारे कारण आई 
ये  नन्ही   चिड़िया !
 ओ नीम ! 
तुम्हारा  बहुत शुक्रिया ! 

चित्र -- निजी संग्रह -- -----------------------------------------------------------


मेरे गाँव ------ कविता


मेरे  गाँव  ------------ कविता --
तेरी  मिटटी  से बना   जीवन  मेरा -
तेरे  साथ  अटूट  है  बंधन   मेरा ,
 तुझसे  अलग कहाँ कोई  परिचय मेरा ?
 तेरे संस्कारों  में पगा तन -मन मेरा !!

नमन  तेरी सुबह  और  शाम  को-
तेरी धरती, तेरे  खेत -  खलिहान  को ,
तेरी गलियों , मुंडेरों  का  कहाँ  सानी कोई  ?
 वंदन  मेरा  तेरे  खुले  आसमान को  ;
तेरे   उदार परिवेश  की  पहचान मैं-
तेरी  यादें अनमोल  संचित  धन  मेरा !!

जब  कभी  तेरे सानिध्य  में लौट  आती हूँ मैं-
तब  - तब नई उमंग  से भर जाती  हूँ मैं ,
तेरी    गलियों   मे विचर उन्मुक्त  मैं  --
बीता बचपन फिर से  जी  जाती हूँ मैं ;
लौट जाती हूँ फिर  नम  आँखों  से   -
 आँचल  में  भर   अपनापन तेरा !!

मन -आँगन  में  तेरे  रूप का  हरा  सा  कोना है
 मुझ   विकल  का   वही स्नेह भरा  बिछौना है ;
नित   निहारूं   मन की आँखों  से तुझे-
जिन में  बसा  ये  तेरा  रूप  सलोना है-
जब  -जब  आऊँ  तुझे   नजर  भर देखने
पाऊँ महकता  स्नेह भरा  उपवन तेरा  !!
 
ना  आये  बला कोई   तुझपे- ना हो  कभी बेहाल तू,
ले दुआ बेटी की  -सदा रहे    खुशहाल तू  ;
रौशन  रहे  उजालों से   सुबह -शामें   तेरी
 सजा  नित अपनी चौखट पे ख़ुशी   की ताल  तू
लहराती  रहें हरी -  भरी फसलें  तेरी-
 मुरझाये ना कभी - ये हरियाला  सावन  तेरा !!!

तुझसे  अलग कहाँ कोई  परिचय मेरा ?
 तेरे संस्कारों  में पगा तन मन मेरा !!!!!!!!!!!
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गुरुवार, 20 जुलाई 2017

बिटिया ----


 घर  संभालती   बिटिया  
घर संवारती  बिटिया  ,
  स्वर्ग  को धरती पे 
   उतारती  बिटिया ! 

 सुघड़  है  सयानी  है  
बिटिया  तो  घर की रानी  है  ,
उम्र  भले  छोटी है पर 
बातों  में पूरी  नानी  है  ,
सफल  दुआ   जीवन  की 
ईश्वर  की  आरती बिटिया !! 

माँ  की   तो परछाई  है 
पर  गुणों  में सवाई  है ,
उजाला  घर  के  आँगन  का  
स्नेह की  शीतल पुरवाई  है ;
ममता  की   मूर्त  लगती 
जब  स्नेह  से  दुलारती बिटिया !!

तन  से सबल  बहुत  
मन  से  है  सरल  बहुत ,
करुणा से भरी   है  
है भावों से निर्मल  बहुत  ,
 इरादों  की  धनी  है  
करती , जो मन  में  धारती  बिटिया !!

घर -भर  की  दुलारी  है  
सखियों  की  बड़ी  प्यारी  है ,
पिता  का  गर्व    बहुत    ऊंचा
भाई  की   परम हितकारी  है  ;
 अधूरी ममता  पूरी  करती 
 जब  '' माँ ''कह  पुकारती  बिटिया !!

चित्र ---- गूगल से साभार --
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गुरुवार, 13 जुलाई 2017

गाँव में कोई फिर लौटा है -- नवगीत

              

मुद्दत      बाद   सजी   गलियां     रे   
गाँव    में    कोई    फिर   लौटा    है   !
जीवन     बना    है     इक    उत्सव    रे   -
गाँव    में    कोई  फिर  लौटा    है     !  !

रोती  थी    घर    की    दीवारें    
छत    भी    यूँ     ही    चुपचाप      पड़ी  थी  ,
जीवन   न   था    जीने   जैसा  
मौत      से  बढ़कर    एक    घडी    थी
 लेकर   घर    भर    की   खुशियाँ     रे 
गाँव    में  कोई    फिर   लौटा   है   ! !

पनधट  पे   चर्चा  उसकी  
घर  -  घर   में   होती     बात  यही   ,
लौटी     है   गलियों    की   रौनक   -
जो     थी   उसके  साथ   गई    ;
 लेकर  साथ  समय  बीता  रे   
गाँव  में  कोई   फिर   लौटा  है ! !

उसके  साथी  जब  जब करते  थे
उसका जिक्र चौपालों में ,
उसके  आने  की  खातिर -
 नित जुड़ते  थे हाथ   शिवालों  में ;
 बन  पुरवैया  का झोंका रे --
गाँव में कोई फिर लौटा  है

अमृत    बने   किसी  के   आँसू
 रोदन      बदले     शहनाई    में ,
लाज    से  बोझिल      पलकों    पर
सज     गए    सपने    तन्हाई  में ;
बनकर     राधा  का  कान्हा   रे-
 गाँव  में  कोई  फिर  लौटा     है ! 
मुद्दत      बाद   सजी   गलियां     रे  -
गाँव    में    कोई    फिर   लौटा    है   !
जीवन     बना    है     इक    उत्सव    रे
गाँव    में    कोई  फिर  लौटा    है     !! 


चित्र -- निजी संग्रह - 
गूगल प्लस से अनमोल टिप्पणी साभार Kailash Sharma's profile photo
Kailash Sharma

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बहुत सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति...अपने ब्लॉग से रजिस्टर करने की आवश्यकता हटा दें तो कमेंट्स देने में सुविधा रहेगी...
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शनिवार, 8 जुलाई 2017

श्री गुरुवै नमः -------- गुरु पूर्णिमा पर विशेष -

Image result for गुरु पूर्णिमा के चित्र                                                                                                       

भारत  अनंत   काल से  ऋषियों  और मनीषियों   की  पावन   भूमि रहा है  जिन्होंने  समूचे  विश्व और  भटकी  मानवता   का सदैव मार्ग प्रशस्त  कर  उन्हें  सदाचार और सच्चाई  की  राह  दिखाई   है | इसकी अध्यात्मिक   पृष्ठभूमि  ने हर  काल में  गुरुओं  के सम्मान  की    परम्परा  को  अक्षुण रखा  है |  अनादिकाल से ही     आमजन  से  लेकर अवतारों तक  के जीवन  में गुरुओं  का विशेष  महत्व रहा  है | इसी  क्रम  में  गुरुओं  के  प्रति सम्मान  व्यक्त  करने  को परमावश्यक   माना   गया  है  क्योकि  माता -  पिता  के  बाद  यदि  कोई व्यक्ति हमारे जीवन  को  संवारता  है  तो  वह  गुरु  ही  है | इसी  लिए  गुरु  को  ब्रह्म ,विष्णु  , महेश  नहीं  बल्कि  साक्षात  परमब्रह्म  की उपाधि  दी  गई  है ------
'गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा:
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।'

गुरुहमारे  भीतर  के  अन्धकार  को  मिटा वहां  ज्ञान  के  प्रकाश   को       भरते  हैं |  तभी गुरु  को  अंधकार  से  प्रकाश   की   और  ले  जाने  वाला  बताया गया  है  -- अर्थात  गु यानि  अन्धेरा  और  रु   यानि प्रकाश   | अपने  गुरुओं  की  उपासना  पर्व  के  रूप  में आषाढ़  मास  की  पूर्णिमा  को गुरु  पर्व मनाया  जाता  है|  इसे गुरु पूर्णिमा  के  नाम से  भी  जाना  जाता  है | कहते  हैं इसी   पूर्णिमा  के दिन  परम  श्रद्धेय  वेदों  के रचियता  व्यास जी  का  भारतभूमि   पर   अवतरण  हुआ  था |   उन्ही  व्यास  जी    के  नाम  पर  इस  पूर्णिमा  को  व्यास  पूर्णिमा  भी  कहा  जाता  है | भारतवर्ष में कहीं  भी  कथा  हो तो कथावाचक   के  बैठने  के  स्थान को  व्यास  पीठ  कह  कर  सम्मान दिया  जाता है | इन्ही  परम  पूजनीय वेदव्यास   जी   को  प्रथम गुरु  भी कहा  गया  क्योंकि उन्होंने  ही  पहली  बार अपने  मुखारविंद  से  वेदों की महिमा  का  बखान  कर  मानवता  को   धन्य   किया  था | वैसे  तो हर  प्रकार  के  ज्ञान  प्रदाता को  गुरु  कहा  गया  है  पर अध्यात्मिक  ज्ञान  देने  वाले  गुरु  का  जीवन में विशेष  महत्व  है  ,इसी  लिए  उन्हें  सतगुरु  कर कर  पुकारा  गया  है | हिन्दू  धर्म   ,   सिख धर्म  ,  मुस्लिम धर्म  या  फिर  ईसाई  सबमे  परम  ज्ञानी  पथ  प्रदर्शक  की  महता   को  स्वीकारा  गया  है  | गोस्वामी  तुलसीदास जी ने  तो अपनी  भक्ति , अपनी  रचनात्मकता सभी  का  श्रेय  अपने गुरु  को  दे  कर ,    अपना सर्वस्व  अपने  गुरु   के  चरणों में  अर्पण कर  उनके  प्रति अपनी परम  आस्था  को दर्शाया  है  | वे  गुरु  को  कृपा  का सागर और  भगवान् का  मानव  रूप  बताते  हुए  उनके  चरणों  में   वंदना  करते  लिखते  हैं  -------
बदौं गुरु  पद कंज --कृपा  सिन्धु  नर  रूप  हरि |
महा मोह  तम  पुंज , जासु  वचन  रवि  कर  निकर | |
उन्होंने  अपने  रचना  संसार  में  हर  कहीं गुरु को   असीम  महत्व  दे  कर  अपनी  श्रद्धा  उन्हें समर्पित  की  है |सूरदास जी    भी  गुरु  की  महिमा  का बखान कर  लिखते  हैं ---
सब्दहिं-सब्द भयो  उजियारो -- सतगुरु  भेद बतायो |
ज्यौ  कुरंग  नाभि  कस्तूरी  , ढूंढत   फिरत   भुलायो ||

सहजो  बाई  कहती  हैं  -------
राम तजूं  गुरु  ना  बिसारूँ  ------ गुरु के  सम  हरिको  ना  निहारूं | 

अर्थात   भले  ही   हरि को तजना  पड़े  पर  गुरु को  कभी  नहीं   भुलूं   और  गुरु के  जैसे  हरि  को   कभी  ना  निहारूं  |  मीरा बाई  ने  भी हरि  धन  की प्राप्ति  का   श्रेय  अपने  गुरु  रविदास  जी  को  दिया  ; वे  कह  उठी --------
पायो  जी  मैंने  राम  रतन  धन  पायो
वस्तु  अमोलक  दई  मोरे -  सतगुर  किरपा  कर  अपनायो
 | 

अर्थात  मैंने  राम  के नाम का धन  पा  लिया  है  |   मेरे  सतगुरु  ने  कृपा  करी है जो     मुझे   अपनाकर ये  अनमोल   वस्तु  मुझे  दी  है |
सिख  धर्म  में  तो गुरुओं को सर्वोच्च   स्थान  दिया  गया है  क्योकि  गुरु नानकदेव  जी  ने सिख  धर्म  की नींव  रखी  तो  उनके  बाद  अगले  नौ  गुरुओं  ने सिख  धर्म में  गुरु  परम्परा   को  कायम   रख  इसे   आगे  बढाया  |  पर  दसवें  गुरु  गोविन्द  सिंह  जी ने    सिखोंको  गुरुओं  के स्थान  पर गुरबाणी युक्त पुस्तक  ग्रंथ  साहिब  को  ही   गुरु  का  दर्जा  दे  उसे   अपने  जीवन  में  अपनाने  की  सीख  दी | तब  से  सिख  धर्म  में  ग्रन्थ  साहिब को  गुरु   ग्रंथ  साहिब कहकर   पुकारा  जाता  है   और  इसमें  संग्रहित  अनेक  गुरुओं  की  पवित्र   वाणी  को  सुनना  सभी सिख   अपना सौभाग्य  मानते  हैं  |
 भगवान् श्री  कृष्ण  ओर  श्री  राम  ने  भी  अपने   जीवन  में  गुरुओं   के  सानिध्य में    अध्यात्मिक   ज्ञान प्राप्त  कर   सदमार्ग पर  चलने  की  प्रेरणा  ली | उन्होंने  गुरु को  अपने ह्रदय  में  धारण   कर  उनके  अधीन   रहने  में  जीवन  को  सार्थक  माना | गुरु  के  चरणों  की  सेवा  को  अपना  पूजा  का  मूल  माना |  माना  कि  मोक्ष  का  मूल गुरु की कृपा   का  मिलना  है  उसके  बिना  मोक्ष  मिलना असम्भव  है  |  बिना  गुरु  कृपा  के  जीव  भव सागर  से पार  नहीं  हो  सकता | उन्ही  की  परम  कृपा से  जीवन में  दिव्यता  और   चेतनता  आती  है  | तभी  तो कहा  गया  है  -------------
गुरु  गोविन्द  दोउ  खड़े  काकें   लागूं  पांव ,
बलिहारी  गुरु  आपने  जिन  गोविन्द  दियो  मिलाय||

अर्थात  गुरु  और  भगवान्  दोनों  खड़ें हैं --  किसके  पांव  लगूं?  मैं  तो  अपने  गुरु  पर    बलिहारी  जाऊँ  जिसने    भगवान् से  मुझे  मिलवा  दिया  है | संक्षेप  में  वेदांत  अनेक  हैं संदेह  भी  बहुत  है  और  जानने  योग्य  आत्म  तत्व   भी  अति  सूक्षम  है   पर गुरु  के  बिना  मानव  उन्हें  कभी  जान  नहीं   पाता | वेदों ,उपनिषदों में वर्णित  परमात्मा  का  रहस्य रूप   या  ब्रह्म ज्ञान  हमें  गुरु  ही दे सकते  है  | आज  इन्ही  गुरु जनों  की  उपासना  और  वंदना  का   पावन   दिन  है,   जिसे हम  उनके   पवित्र ज्ञान  का अनुसरण  कर  सार्थक  कर  सकते  हैं -- सभी  को  इस  पावन  दिवस  की  हार्दिक  शुभकामनाएं |

चित्र -- गूगल से साभार --
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  • रेनू बहन तिथि के हिसाब से आपने ब्लॉग जगत पर आज एक साल पुरा किया उसके लिये आपको बहुत बहुत बधाई।
    आज आप ब्लॉग जगत के जाने माने किरदार है, आप को सदा उतरोतर बढोतरी की शुभकामनाएं पेश करती हूं सदैव उच्चता को बढते रहें।

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विशेष रचना

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