संदेश

श्री गुरुवै नमः -------- गुरु पूर्णिमा पर विशेष -

भारत  अनंत   काल से  ऋषियों  और मनीषियों   की  पावन   भूमि रहा है  जिन्होंने  समूचे  विश्व और  भटकी  मानवता   का सदैव मार्ग प्रशस्त  कर  उन्हें  सदाचार और सच्चाई  की  राह  दिखाई   है | इसकी अध्यात्मिक   पृष्ठभूमि  ने हर  काल में  गुरुओं  के सम्मान  की    परम्परा  को  अक्षुण रखा  है |  अनादिकाल से ही     आमजन  से  लेकर अवतारों तक  के जीवन  में गुरुओं  का विशेष  महत्व रहा  है | इसी  क्रम  में  गुरुओं  के  प्रति सम्मान  व्यक्त  करने  को परमावश्यक   माना   गया  है  क्योकि  माता -  पिता  के  बाद  यदि  कोई व्यक्ति हमारे जीवन  को  संवारता  है  तो  वह  गुरु  ही  है | इसी  लिए  गुरु  को  ब्रह्म ,विष्णु  , महेश  नहीं  बल्कि  साक्षात  परमब्रह्म  की उपाधि  दी  गई  है ------
'गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा:
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।'
गुरुहमारे  भीतर  के  अन्धकार  को  मिटा वहां  ज्ञान  के  प्रकाश   को       भरते  हैं |  तभी गुरु  को  अंधकार  से  प्रकाश   की   और  ले  जाने  वाला  बताया गया  है  -- अर्थात  गु यानि  अन्धेरा  और  रु   यानि प्रकाश   | अपने  ग…

सुनी गिलहरी --------- कविता -----

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पेड़ की फुनगी के मचान से - क्या खूब झांकती हो शान से , देह इकहरी काँपती ना हांफती -- निर्भय हो घूमती बड़े स्वाभिमान से ! 
पूंछ उठाये - चौकन्नी निगाहें -  चल देती हो जिधर मन आये  छत , दीवार , तार या खंबा --  बड़ी सरल हैं तुम्हारी राहें ! 
जहाँ जी चाहे आँख मूँद सो लेती मसला पानी है ना रोटी ; भूखी हो फल पेट भर खाती -  माँ की रखी कुजिया से झटपट पानी पी जाती ! 
घूमती डाल - डाल और पात - पात -  मलाल नहीं कोई नहीं है साथ ;  आज की चिंता ना कल की फ़िक्र --  देख लिए हैं पेड़ के सारे फल चखकर ,
फुदकती मस्ती में - हो बड़ी सयानी बन बैठी हो पूरी बगिया की महारानी , सुबह ,शाम ना देखती दुपहरी --  दुनिया में तुम सबसे सुखी हो गिलहरी!!!!!!!!!!

राह तुम्हारी तकते - तकते----------------कविता --

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राह तुम्हारी तकते - तकते- यूँ ही बीते अनगिन पल साथी, आस हुई धूमिल संग में - ये नैना हुए सजल साथी ! !

दुनिया को बिसरा कर दिल ने- सिर्फ तुम्हे ही याद किया , हो चली  दूभर जब तन्हाई तुमसे मन ने संवाद किया ;  पल भर को  भी मन की नम आँखों से ना हो पाये तुम ओझल साथी ! ! अप्राप्य से अनुराग ये मन का क्यों हुआ ? कहाँ उत्तर इसका ? इस राह की ना मंजिल कोई  - फिर भी क्यों सुखद सफ़र इसका ? प्रश्नों के भंवर में डूबे- उबरे हुआ समय बड़ा बोझिल साथी !!
था धूल सा निरर्थक ये जीवन - छू रूह से किया चन्दन तुमने , अंतस का धो सब खार दिया - किया निष्कलुष और पावन तुमने ; निर्मलता के तुम मूर्त रूप - कोई तुम सा कहाँ सरल साथी !!!
राह तुम्हारी तकते - तकते

पेड़ ने पूछा चिड़िया से--- कविता --------

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पेड़ ने पूछा चिड़िया से --------- तेरी ‘ चहक’ का फल कहाँ लगता है ? जिसको चख सृष्टि के कण - कण में – आनंद चंहु ओर विचरता है ! ! जो फूल में गंध बन कर बसता, करुणा से तार मन के कसता ; जो अनहद - नाद सा गुंजित हो – जड़ - प्रकृति में चेतन भरता ; वही सांसो में अमृत सा घुल – प्राणों में शक्ति भरता है ! यही कलरव सुन कर के - गोरी का अंतर्मन पुलक जाता , जब कोई श्याम सखा चुपके से- कोरे मन में रंग भर देता ;  इससे निसृत रस चाँद रात में – रास प्रेम का रचता है  !! माधुर्य का पर्याय बन -  तू चहके मीठी पाग भरी , कण - कण में स्पंदन भर देती -  जब तू गूंजे आह्लाद भरी ;  पात -पात बौराता धरा पे -  नवजीवन का सृजन करता है ! !  चिड़िया बोली '' जीवनपथ की मैं अनत यायावर -  तृप्ति - अमृत घट लाती भर - भर , अम्बर की विहंगमता नापूं नन्हे पंखों से -  छूती विश्व का परम शिख्रर ; काल के माथे पर लिखा -ये कलरव अजर – अमर है कविता , वाणी और वीणा में जो नित नए स्वर रचता है  !! मन बैरागी , आत्मगर्वा और आत्माभिमानी कहाऊँ-

तुम्हारी चाहत -------- कविता -----

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अनमोल है तुम्हारी चाहत - जो नहीं चाहती मुझसे , कि मैं सजूँ सवरू और रिझाऊं तुम्हे ; जो नहीं पछताती मेरे - 

विवादास्पद अतीत पर  ! और मिथ्या आशा नहीं रखती - मेरे अनिश्चित भविष्य से ; व्यर्थ के प्रणय निवेदन नहीं है - और न ही मुझे बदलने का कुत्सित प्रयास ! मेरी सीमायें और असमर्थतायें सभी जानते हो तुम , सुख में भले विरक्त रहो - पर दुःख में मुझे संभालते हो तुम  !! ये चाहत नहीं चाहती कि मैं बदलूं और भुला दूं अपना अस्तित्व ; सच तो ये है कि ------- अनंत है तुम्हारा आकाश , मेरी कल्पना से कहीं विस्तृत ----- जिस में उड़ रहे तुम और मैं भी स्वछंद हूँ - सर्वत्र उड़ने के लिये ! ! अनमोल है तुम्हारी चाहत !!!!!!!!!!!!!! 

मेरी वे अंग्रेजी शिक्षिका -------- संस्मरण ---

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  छात्र जीवन  में   शिक्षकों  का  महत्व   किसी से छुपा नहीं |  इस  जीवन में अनेक शिक्षक हमारे  जीवन  में  ज्ञान का  आलोक   फैलाकर  आगे बढ़ जाते है  पर वे  हमारे लिए  प्रेरणा  पुंज  बने हमारी यादों   से कभी ओझल  नहीं  होते | एक शिक्षक के  जीवन  में  अनगिन  छात्र - छात्राएं आते  हैं  तो  विद्यार्थी  भी  कई  शिक्षकों  से   ज्ञान  का  उपहार  प्राप्त कर   अपने   भविष्य  को संवारता  है | इनमे से  कई  समर्पित  शिक्षक  हमारे  जीवन  का  आदर्श  बन  हमारी यादों  में  हमेशा  के  लिए  बस  जाते  हैं |
  शिक्षक  दिवस  के  अवसर  पर  मुझे भी  अपने छात्र  जीवन  के एक  अविस्मरनीय  प्रसंग   को  सांझा करने का  मन  हो  आया  है  | बात  तब की  है - जब  मै अपने    गाँव के   कन्या हाई   स्कूल  में दसवी   में  पढ़ती थी |यह   स्कूल  लडकियों  का  होने  के  कारण   यहाँ  पढ़ाने   वाला सारा  स्टाफ   भी  महिलाओं   का ही  था   | बहुधा   सभी  अध्यापिकाएं     पास  के  शहर  चंडीगढ़   व  पंचकूला   इत्यादि   से   आती  थीं  |  यूँ  तो   सारी  अध्यापिकाएं  अपने  -अपने   विषयों    के  प्रति    समर्पित  थी,  पर …

लम्पट बाबा ----- कविता

कहाँ से  आये  ये  लम्पट  बाबा ?
  धर  सर   कथित 'ज्ञान '  का  झाबा !!

गुरु ज्ञान  की  डुगडुगी बजायी -
विवेक हरण  कर   जनता लुभाई ,
श्रद्धा , अन्धविश्वास में सारे डूबे      - 
हुई गुम आडम्बर  में  सच्चाई  ;
 बन  बैठे भगवान  समय के 
खुद बन  गये  काशी  और काबा !! 

 धन  बटोरें  दोनों हाथों से -
कलयुग के ये कुशल लुटेरे ,
खुद तृष्णा के पंक  में डूबे 
देते   पर  उपदेश बहुतेरे ;
खूब  चलायें दूकान धर्म की 
सुरा -सुन्दरी  में  बहुत  मन  लागा!!

खुद को बताये आत्म ज्ञानी -
तत्वदर्शी और गुरु महाज्ञानी ,
पर मन   के  काले और कपटी -
 लोभी  क्रोधी   , कुटिल और कामी ;
'गुरु ' शब्द की घटाई  महिमा -
 बने संत समाज पे  काला धब्बा !! 

बुद्ध ,   राम, कृष्ण  की  पावन   धरा  पर
नानक , कबीर  ,रहीम के देश में  ,
 बन   हमदर्द , मसीहा  लोगों के -
बगुले  बैठे  हंस के वेश  में 
छद्म हरी -नाम  बांसुरी  तान चढ़ाई 
 करी  मलिन   हरि- भूमि  की आभा !!

कहाँ से  आये  ये  लम्पट  बाबा ?
  धर सर   कथित 'ज्ञान '  का  झाबा !!!!!!!!!






बीते दिन लौट रहे हैं -------- नवगीत

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ये   सुनकर   उमंग    जागी   है  ,
कि   बीते    दिन   लौट  रहे   हैं  ;
उन  राहों  में    फूल      खिल   गए  -
 जिनमे  कांटे  बहुत     रहे   है   !

 चिर    प्रतीक्षा     सफल    हुई -
यत्नों    के  फल   अब   मीठे    हैं ,
 उतरे   हैं     रंग     जो   जीवन   में-
   वो     इन्द्रधनुष    सरीखे हैं
   मिटी   वेदना   अंतर्मन  की --
 खुशियों  के  दिन  शेष    रहे   हैं   -!!

  वो  एक लहर   समय  की    थी साथी    -
आई  और   आकर   चली  गई,
 कसक   है    इक  निश्छल    आशा  -
हाथ     अपनों  के  छली  गई  ;
 छद्म  वैरी   गए पहचाने   -
जिनके     अपनों   के    भेष     रहे  हैं  !!


पावन ,  निर्मल    प्रेम   सदा     ही --
 रहा     शक्ति    मानवता   की  ,
जग  में   ये   नीड़   अनोखा  है -
जहाँ    जगह   नहीं  मलिनता   की  ;
 युग  आये -  आकर  चले   गए  ,
 पर    इसके   रूप    विशेष   रहे  हैं  !!

उन  राहों     में  फूल  खिल    गए
 जिनमे    कांटे      बहुत  रहे  हैं  !!!!!!!