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शनिवार, 20 जनवरी 2018

बसंत बहार से तुम --- कविता

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 था पतझड़ सा नीरस  जीवन -
आये बसंत  बहार से तुम ,
सावन भले  भर -भर  बरसे -
 पहली सौंधी    बौछार से तुम  |

  ये मन कितना अकेला था 
एकाकीपन में खोया था  , 
 खुशियों का था   इन्तजार  कहाँ 
बुझा - बुझा  हर रोयाँ  था ;
तपते मन पे सहसा बरस गए 
 बन शीतल  मस्त फुहार से तुम ! 

 मधु सपना बन  ठहर  गए - 
 इन थकी  मांदी  सी आँखों में ,
हो पुलकित  मन ने उड़ान भरी -
  जहाँ  थकन बसी थी   पांखोंमें ;
उल्लास का ले आये तोहफा -
  मन की  मीठी  मनुहार से तुम !! 

चिर विचलित प्राणों में साथी -
 आन  बसे संयम से तुम ,
कोई दुआ    हुई  सफल मेरी -
हो घाव पे शीतल मरहम से तुम ;
मन के मौसम   पलट गये 
छाये  निस्सीम  विस्तार से तुम |!!!!!!!!!




गुरुवार, 18 जनवरी 2018

जी , टी . रोड पर अँधेरी रात का सफ़र --- संस्मरण --




जी , टी . रोड  पर  अँधेरी  रात   का सफ़र  ---

 दिन के प्रत्येक पहर का अपना सौन्दर्य होता है | जहाँ भोर प्रकृतिवादी कवियों के लिए सदैव ही नवजीवन की प्रेरणा का प्रतीक रही है वहीँ प्रेमातुर व्यक्तियों और प्रेमवादी विचारधारा के कवियों व साहित्यकारों के लिए रात्रि के प्रत्येक पल का अपना महत्व माना  है | रचनाकारों ने अपनी रचनाओं -- चाहे वह  कविता हो , निबंध अथवा कहानी इत्यादि-- सबमे रात्रि का बहुत भावपूर्ण वर्णन किया है | रातों में भी चांदनी रात को आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक -- सबने खूब सराहा है और साहित्य से लेकर सिनेमा तक सबमे इसके सौदर्य को खूब स्थान मिला है | फिल्मो मे चांदनी रातों में फिल्माए गीत जनमानस में समय - समय पर खूब लोकप्रिय हुए हैं | कवियों ने गोरी के मुखड़े की तुलना चाँद से कर डाली तो गौरवर्णी नायिका को चांदनी में नहाई होने का ख़िताब देना अद्भुत कहा गया | लेकिन चांदनी रात के विपरीत उस रात्रि का भी अपना ही सौदर्य और महत्व है जो पूर्णतयः प्रकाशविहीन होती है --- जब ना चाँद होता है ना चांदनी -- | काले अंधियारे में डूबी रात में आकाश में तारे भी अपनी भरपूर ताक़त से टिमटिमाते नज़र आते है-- शायद इन रातों में उन्हें चाँद के सामने अपनी रौशनी कम हो जाने का डर नहीं होता होगा | हर पग पर व्याप्त अँधेरा कण- कण को अपार धीरज की प्रेरणा देता दिखाई देता है | ऐसी रातो में सफ़र का अलग ही आनंद है | मौन -- निस्तब्ध वातावरण में अँधेरे में लिपटी प्रकृति अलग अंदाज में प्रकट होती है | |  काली स्याह रात   में पेड़ - पौधे , खेत - खलिहान व रास्तो के किनारे बसी बस्तियां ना जाने कौन - सा जादू जगाती दिखाई पड़ती हैं |  ऐसी ही एक  स्याह रात में पिछले  साल जनवरी की कडकडाती  ठंड  के बीच - दिल्ली से करनाल तक का रोमांच से भरा अद्भुत सफर एक  अविस्मरणीय घटना  में बदल गया-- जब हम सपरिवार  दिल्ली से अपने गृहनगर  लौट रहे थे | उस  रात जी .टी . रोड  सर्द काली रात में एक पुल सरीखा नजर आ रहा था | लग रहा था मानो काली रात एक विशाल समुद्र है तो जी .टी . रोड इस समुद्र पर बंधा एक अनंत पुल -- -- इस पुल पर असंख्य छोटी बड़ी गाड़ियां विराट काफिले के रूप में उड़न -खटोलों की तरह फिसलती जाती प्रतीत हो रही थी | हमारी गाड़ी भी इस काफिले का एक छोटा सा हिस्सा बनकर गंतव्य की  ओर अग्रसर थी | रात्रि का ये   मनमोहक  मौन -मन को जादू में बांधता प्रतीत हो रहा था | घटाघोप अँधेरे में दूर मकानों में जलते बल्ब जंगल में चमकते जुगनुओं का भ्रम पैदा करते लग रहे थे तो पुराना फ़िल्मी संगीत माहौल में अलग ही जादू जगा तन - मन को रूहानी आनंद से भर रहा था--उस पर सफ़र में  पूरे   परिवार के    साथ  मन को  ख़ुशी  की  अनोखी  गर्माहट मिल रही थी | पर हर सफर की मंजिल होती है | वैसे ही यह सफ़र भी अपनी मंजिल पर जाकर थम गया पर हमेशा के लिए यादगार बनकर रह गया| शायद ऐसे ही किसी सफर के लिए किसी शायर ने ये पंक्तियाँ लिखी होगी ------ 
इस सफर में बात ऐसी हो गई --
हम ना सोये रात थककर सो गयी !!!!!!!!!!!!


शनिवार, 13 जनवरी 2018

अलाव दर्द का -- कविता --

जलता रहा अलाव दर्द का -
 भीतर यूँ ही कहीं  मन में ; 
 शापित  से   कब से  भटक रहे  -
हम जीवन के  वीराने  वन   में !

 आस के  मोती चुन    कर -
 सदियों सी हर रात बितायी हमने ,
 ये दोष  भरोसे  का  था  अपने-
जो यूँ ठोकर खायी हमने  ;
 बरबस     ऑंखें बरस रही 
 सूखा  बदला  सावन में   !!


अपनेपन  के दावे उनके -
हकीक़त नहीं फ़साने थे  ,
सब अपनों को लिए थे साथ -
बस एक  हमीं बेगाने थे ;
पर जाने क्यों  वो  झांकने लगते   - 
मेरे मन के उजले दर्पण में  ?


कहाँ किसी को कभी  -
 इन्तजार हमारा  था  ?
 एक भ्रम सुहाना सा था   कोई  -
 कब उनपे  अधिकार   हमारा था ?
फिर भी रह -रह  छा जाते हैं 
वो  ही मेरे शब्द सृजन में !!
जलता रहा अलाव दर्द का -
 भीतर यूँ ही कहीं  मन में !!!!!!!!!!!!!!!!




शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

लोहड़ी --------- उल्लास का पर्व --


पंजाब  का लोकपर्व लोहड़ी मकर सक्रांति से ठीक एक या कभी - कभी दो दिन पहले आता है | ये पर्व पंजाब की जिन्दादिली से भरे जनजीवन को दर्शाता है .| इस दिन लोगों का उत्साह देखते ही बनता है | .अब तो  पंजाब के साथ हरियाणा  प्रान्त और देश के अन्य  भागों के लोग भी लोहड़ी से ना सिर्फ परिचित हैं बल्कि इसे  खूब  मनाते भी हैं   |

 इस दिन घरो और गलियों में रेवड़ी और मूंगफली की खुशबु फैली होती है | क्योकि ये पर्व माघ महीने की कंपकंपाती ठण्ड के बीच मनाया जाता है -- ऐसा समझा जाता है कि ये दोनों चीजें सर्दी को कम करने में बहुत सहायक है अतः ये दोनों चींजे लोहड़ी का प्रतीक बन गई हैं | पंजाब की लोक संस्कृति में इस पर्व का इतना महत्व है कि जब भी किसी के यहाँ नयी शादी या नवजात शिशु का आगमन होता है --  तो  लोहड़ी   के दिन इस ख़ुशी को यादगार रूप में मनाया जाता है जिससे  उल्लास  चरम पर पंहुच जाता है |
आग जलाकर उसके चारो तरफ पंजाबी गीतों की धुन पर भंगड़ा और गिद्दा डालते युवक और युवतियां  अद्भुत नजारा प्रस्तुत करते हैं |  खूब मस्ती के बाद लोग मूंगफली -- रेवड़ी  बाँट कर अपनी   ख़ुशी का इजहार करते हैं | लोहड़ी पर लोक नायक दुल्ला भट्टी का गीत   '' सुंदर -- मुंदरिये हो   '' लोहड़ी के गीत के रूप में गाया जाता है|  दुला भट्टी ने   खुद  मुस्लिम होते हुए भी -- सुन्दर - मुन्दर नाम की दो  हिन्दू  बहनों  को अत्याचारी   मुग़ल सरदारों  से छुडवा कर --उनकी शादी   उनके पिता की पसंद की जगह   करवा  उनका घर बसाया था |वैसे कहा जाता है कि  दुल्ला  भट्टी  बहुत ही बहादुर था जिसने महिलाओं की अस्मिता व सम्मान को बचाने लिए बहुत काम किये | उसे अपने समय का रोबिन  हुड  भी  कहा जाता है |अपने इस  नायक  की याद में पंजाब में कई लोककथाएं प्रचलित हैं | सच तो यह  है  कि  गुड से मीठा ये त्यौहार न केवल पंजाब बल्कि पंजाबियत का आईना है |

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

समय साक्षी रहना तुम --- कविता --

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 अपने अनंत प्रवाह में बहना तुम ,
 पर समय साक्षी रहना   तुम !!

उस पल के-  जो हो सत्य सा अटल ,
 ठहर गया है भीतर    कहीं गहरे ;
रूठे सपनों से मिलवा जो -
भर गया पलकों में रंग सुनहरे ;
यदा -कदा  बैठ साथ मेरे  -
उन यादों के हार पिरोना तुम 

जिसमे आया  जाने  कहाँ  से -
जन्मों की ले पहचान कोई ,
 विस्मय सा भर जीवन में -
कर गया हैरान कोई !!  
मौन आराधन सा वो  मेरा -
उस संग जन्मों  का संग बोना तुम

आत्मा की  अतल गहराइयों में -
जो  भरेगा उजास  नित नित  ,
दिन महीने गुजर जायेगे  -
 आँखों से ओझल न होगा किंचित ;
हो ना जाऊं तनिक मैं विचलित 
प्राणों में  अनत धीरज  भर देना तुम !!

अपने अनंत प्रवाह में बहना तुम ,
 पर समय साक्षी रहना   तुम !!!!!!!!!!!!!!

 चित्र--- गूगल से साभार -- 

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

तुम्हारा मौन --- कविता --

 तुम्हारा   मौन
असह्य हो चुका है --
तुम्हारा ये विचित्र मौन  ,
विरक्त हो जाना तुम्हारा -
रंग , गंध और स्पर्श के प्रति ;
अनासक्त हो जाना - अप्रतिम सौन्दर्य के प्रति    !
भावहीन हो बैठ उपेक्षा करना -
संगीत की मधुर स्वर लहरियों की  ,
स्वयं से रूठना और कैद हो जाना -
मन की ऊँची दीवारों के बीच-
नहीं है जीवन ----- !

उठो ! खोल दो मन के द्वार !
सुनो गौरैया की चहचहाहट और -
भँवरे की गुनगुनाहट में उल्लास का शंखनाद ! !
देखो बसंत आ गया है ---,
निहारो रंगों को -महसूस करो गंध को -
जो उन्मुक्त पवन फैला रही है हर दिशा में -
हर कोने में !
स्पर्श करो सौदर्य को -
जिसमे निहित है जीवन की सार्थकता !
उठो !कि स्पंदन से भरी- 
  एक मानव देह हो तुम हो  ,
कोई निष्प्राण प्रतिमा नहीं !
तुम्हारे लिए ही बने है ;
रंग , गंध , सौन्दर्य और संगीत
क्योंकि तुम्ही निमित्त हो -
 सृष्टि में नवजीवन के!!!!!!!!!!!!

संदर्भ---- एक अवसाद ग्रस्त युवा के लिए --- 

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

फिर चोट खाई दिल ने ---कविता --



फिर चोट  खाई  दिल ने-
और बरबस लिया पुकार तुम्हे  ,
 हो  विकल   यादों  की गलियों में -
 मुड--मुड ढूंढा   हर  बार तुम्हे  !

 मुंह  मोड़ के   चल दिए साथी -
  तुम तो  नयी मंजिल -   नयी राहों पे  ; 
ये तरल नैन रह गए तकते - 
 तुम रहे अनजान  जिगर की आहों से ;
  उस दिल को  बिसरा कर बैठ गए -
  था दिया जिसपे  सब अधिकार तुम्हे !!

दो नैनो की क्या कहिये  -
बस इनमे छवि तुम्हारी थी ,
मंदिर की   हर मूर्त  में भी  साथी -
बस  सूरत  तेरी निहारी थी ;
मिल  जाते जो  किसी रोज यूँ ही - 
थकते ना   अपलक  निहार तुम्हे !!


न  था कोई     जो मन की सुनता -  
और  समझ लेता   जज्बात मेरे  ,
  कौन    मेरा  अपना तुम  बिन-
 जो  अधरों   पे   सजाता हास   मेरे ;
खुद को खोकर -था  पाया तुमको  -
और जीता  मन को हार तुम्हे !!
  
अनगिन चेहरे थे  हर ओर   -
पर    तुम्ही थे  दिल के पास मेरे,
तुम्ही हंसी में - तुम्ही  दुआ में 
थे  तुमसे  सब एहसास मेरे;
 तुम  लौट ना आये  तो   थक   के - 
गीतों में लिया उतार तुम्हे !!
हो   विकल     यादों  की गलियों में -
 मुड--मुड ढूंढा    हर  बार तुम्हे   !!!!!!!










बसंत बहार से तुम --- कविता

 था पतझड़ सा नीरस  जीवन - आये बसंत  बहार से तुम , सावन भले  भर -भर  बरसे -  पहली सौंधी    बौछार से तुम  |   ये मन कितना अकेला था  एका...