संदेश

श्री गुरुवै नमः -------- गुरु पूर्णिमा पर विशेष -

भारत  अनंत   काल से  ऋषियों  और मनीषियों   की  पावन   भूमि रहा है  जिन्होंने  समूचे  विश्व और  भटकी  मानवता   का सदैव मार्ग प्रशस्त  कर  उन्हें  सदाचार और सच्चाई  की  राह  दिखाई   है | इसकी अध्यात्मिक   पृष्ठभूमि  ने हर  काल में  गुरुओं  के सम्मान  की    परम्परा  को  अक्षुण रखा  है |  अनादिकाल से ही     आमजन  से  लेकर अवतारों तक  के जीवन  में गुरुओं  का विशेष  महत्व रहा  है | इसी  क्रम  में  गुरुओं  के  प्रति सम्मान  व्यक्त  करने  को परमावश्यक   माना   गया  है  क्योकि  माता -  पिता  के  बाद  यदि  कोई व्यक्ति हमारे जीवन  को  संवारता  है  तो  वह  गुरु  ही  है | इसी  लिए  गुरु  को  ब्रह्म ,विष्णु  , महेश  नहीं  बल्कि  साक्षात  परमब्रह्म  की उपाधि  दी  गई  है ------
'गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा:
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।'
गुरुहमारे  भीतर  के  अन्धकार  को  मिटा वहां  ज्ञान  के  प्रकाश   को       भरते  हैं |  तभी गुरु  को  अंधकार  से  प्रकाश   की   और  ले  जाने  वाला  बताया गया  है  -- अर्थात  गु यानि  अन्धेरा  और  रु   यानि प्रकाश   | अपने  ग…

सूर के श्याम ---------- जन्माष्टमी पर विशेष

भारतवर्ष के  सांस्कृतिक ,सामाजिक  और  धार्मिक   जीवन  का  एक अक्षुण  अंग  हैं  राम और  कृष्ण | राम जहाँ  मर्यादा  पुरुषोत्तम  है - तो  वही कृष्ण  के  ना  जाने  कितने  रूप  है  | श्री कृष्ण   को सम्पूर्णता का  दूसरा  नाम  कहा  गया  है| वे   चौसठ कला  सम्पूर्ण     माने  गए हैं  |सभी  ललित कलाओं  के  केंद्र  बिंदु  श्री  कृष्ण   ही रहे हैं   | वे योगेश्वर  हैं-   तो  रसेश्वर  भी  हैं | |   श्री  कृष्ण  के व्यक्तितव का विराट दिव्य  तत्व - जन   मानस को  सदियों  से आंदोलित  करता   आया  है|   उस की   दिव्य  आभा  में  ना  जाने  कितने   भटके    पथिको  ने  अपनी मंजिल पायी है  |   श्री  कृष्ण   एक  चंचल बालक  से लेकर  एक  कुटनीतिक      परामर्शदाता से  के साथ- साथ   एक   अच्छे  मित्र , समर्पित  प्रेमी , एक उत्तम गृहस्थ ,  विरल  योद्धा और  सामाजिक  चिन्तक आदि अनेक रूपों  में  हमारे सामने  आते  हैं | एक  माता - पिता  से जन्म  का  संबध  तो  दुसरे पालक  माता - पिता  के  साथ   वात्सल्य   का  अनूठा  रिश्ता  !!
 जन्म  से  पहले ही  अनेक  षड्यंत्रों की छाया में  जन्म कहीं-  तो   जन्म के बाद  पालन   पोषण…

अपराजिता ----------- कहानी --

संघर्ष की धूप ने  गौरवर्णी   तारो को ताम्र वर्णी   बना  दिया था  |   लगता था  नियति ने ऐसा कोई वार नहीं छोड़ा  -जिससे   तारो  को घायल न किया हो पर तारो थी कि नियति के हर वार को सहती - निडरता से जीवन की राह पर चलती  ही जा रही थी   |  लोग कहते थे बड़ी अभागी है तारो – क्या कभी तारो  के जीवन में   कोई  ख़ुशी आएगी ? ये देखते –देखते बरस के बरस बीते जा रहे थे   | पर जिस तारो से खुशियाँ  वर्षों  से रूठी थी - उस तारो के घर के दरवाजे पर आज खुशियों ने दस्तक  दे दी थी | छवि को याद आया   ------------------------------
  जब उसने वर्षों पहले   नई नवेली दुल्हन के रूप में पहली बार तारो को देखा था तो वह बार बार अपनी पलकें झपका  रही थी , कि कहीं ये सपना तो नहीं |मोटी-  मोटी  आँखों वाली गोरी  चिट्टी ,लम्बी  , पतली लाल जोड़े में  सजी तारो किसी परी  या अप्सरा  से कम नहीं लग रही थी |  जगतार के  साथ उसकी  जोड़ी इतनी  खूब  लग रही थी     कि  मानो  ईश्वर ने दोनों  को एक दूसरे के लिए ही बनाया  हो !   सेना का बांका जवान जगतार  भी आकर्षण में तारो से  किसी  तरह  कम न था |  बहुत दिनों तक गाँव  भर में उनकी  बेमिसाल जोड़ी क…

हिमालय वंदन ------------ कविता --

चित्र
सुना है हिमालय हो तुम !
सुदृढ़ , अटल और अविचल - जीवन का विद्यालय हो तुम ! ! 
शिव के तुम्ही कैलाश हो -  माँ जगदम्बा का वास हो ,  निर्वाण हो महावीर का --  ऋषियों का चिर - प्रवास हो ;   ज्ञान  - भक्ति से भरा -  बुद्ध का करुणालय हो तुम ! !
युगों से अजेय हो --  वीरों की विजय हो तुम ,  लालसा में शिखर की - साहस का गन्तव्य हो तुम ;  संघर्ष का उत्कर्ष हो - नीति का न्यायालय हो तुम ! ! 
कवियों का मधुर गान हो -  मुरली की मीठी तान हो ,  शीतल उच्छवास हो सृष्टि का -  राष्ट्र का अभिमान हो ;  नभ के संदेशे बांटता -  मेघों का पत्रालय हो तुम ! ! 
हिम - शिखरों से सजा --  माँ भारत का उन्नत भाल हो ,  टेढ़ी नजर से ताकते - शत्रु का महाकाल हो ;  कण -कण में बसा भारत जिसमे -  कश्मीर से मेघालय हो तुम ! ! 
सुदृढ़ , अटल और अविचल - जीवन का विद्यालय हो तुम ! !  सुना है हिमालय हो तुम !!!!!!!!!!!!


शुक्र है गाँव में ------------- कविता --

शुक्र  है  गाँव में  -  इक  बरगद  तो  बचा  है  जिसके  नीचे  बैठते   -   रहीम  चचा  हैं !!  

हर आने -जाने वाले को सदायें  देते  हैं -   चाचा  सबकी  बलाएँ  लेते हैं  ,  धन कुछ  पास  नहीं  उनके  -   बस   खूब  दुआएं   देते  हैं   ;   नफरत   से  कोसों  दूर  है  -   चाचा  का  दिल  सच्चा   है   !!  

सिख  - हिन्दू  या  हो  मुसलमान -   चाचा  के  लिए  सब  एक  समान   ,  माला  में मोती   से - गुंथे  रहें  सब -   यही  चाचा   का  है  अरमान  ;   समझाते  सबको - एक है वो  मालिक -   जिसने  संसार   रचा है   !! 
बरगद   से  चाचा   हैं  -    चाचा   सा   बरगद    है  ,  इन  दोनों   की    छांव  --    गाँव  - भर की सांझी विरासत  है ;   दोनों  ने  गाँव  के  उपवन   को -  अपने  स्नेह  से सींचा है  !! 

शुक्र  है  गाँव में  इक    बरगद  तो  बचा  है  जिसके  नीचे  बैठते   -   रहीम  चचा  हैं !!  !!!!!!!!!

गा रे जोगी ! ----- कविता --

गा  रे - कोई  ऐसा  गीत  जोगी
 बढे  हर   मन   में  प्रीत  जोगी !  

ना  रहा     अब   वैसा  गाँव   जोगी, 
जहाँ   थी  प्यार   ठांव   जोगी ; 
भूले पनघट  के  गीत  प्यारे - 
खो  गई   पीपल की  छांव जोगी 
 बढ़ी  दूरी  मनों में  ऐसी -
 कि  बिछड़े मन के  मीत  जोगी  !! 

बैठ  बाहर  फुर्सत  में  गाँव  टीले .
तू  कस  सारंगी   के  तार  ढीले ;
 छेड़ फिर  ऐसी कोई  तान  प्यारी -
 जो  सजें    उल्फत  के  रंग सजीले ;
 पनपे  प्यार हर     दिल  में 
सुन   ये मस्त संगीत जोगी !!!

  सुना  है  - है  तेरी  दुआ  पुरअसर  जोगी -
जो  जाती खुदा  के दर  जोगी ,
तू  पढ़ कोई  कलमा  मुहब्बत  का -
जो उतरे  नफरत का  जहर  जोगी ;
हारे  हर  बूरी फितरत - 
 हो जो  प्यार की जीत  जोगी !!

  गा  रे ! कोई  ऐसा  गीत  जोगी -
बढे    हर   मन   में  प्रीत  जोगी ! !!!!!!!!!!!!!!!

तुम्हारे दूर जाने से ---------- कविता

आज तुम्हारे   दूर जाने  से साथी  -
 मन को     ये   एहसास   हुआ 
दिन  का  हर  पहर  था  खोया -खोया .
मन का  जैसे  वनवास    हुआ   !! 

तुमसे  कोई अनुबंध नहीं  साथी -
जीवन  भर साथ  निभाने  का  .
.फिर  भी भय व्याप्त  है  मनमे  -
तुमको  पाकर  खो  जाने  का  ;  
समझ ना  पाया  दीवाना मन –
 क्यों  कोई अपरिचित  इतना ख़ास  हुआ ?

जो तुमने जो  दी  सौगात   -  
था  कोई आज  तलक  ना  दे आया  साथी ;
सबने  भरे आँख में  आंसू- 
 पर  तुमने   खूब  हंसाया  साथी ;
भर  दिया   खुशियों   से आंचल - 
सिकुड़ा  मन  अनत  आकाश  हुआ !!

 हम  दर्द  की   राह   के राही   थे -
था    खुशियों  से   कहाँ नाता अपना ?
 जो बन के   मसीहा ना  मिलते - 
 कैसे   सोया  नसीब  जग पाता अपना  ; 
खिली  मन  की  मुरझाई   कलियाँ -  
 हर  पल जैसे  मधुमास  हुआ !! 

आज तुम्हारे   दूर जाने  से साथी  -
 मन को     ये   एहसास   हुआ 
दिन  का  हर  पहर  था  खोया -खोया .
मन का  जैसे  वनवास    हुआ   !! 








आई आँगन के पेड़ पे चिड़िया --- कविता --

चित्र
आई आँगन के पेड़ पे चिड़िया ,
फुर्र - फुर्र उड़ती -  चाल  चले मस्त  लहरिया !
शायद भूली राह - तब इधर आई - देख हरे नीम ने भी बाहें फैलाई ;  फुदके पात पात - हर डाल पे घूमे  कभी सो जाती बना डाली का तकिया ! 
उल्लास में खोई -- फिरे शोर मचाती मीठा गाना गाती - थोड़ा दाना चुग जाती देख हँसे - खिल - खिल मुन्ना , उदास थी पहले -  मुस्काई मुनिया ! 
हुआ भरा भरा सा - सूना था आँगन घर का हर कोना पुलक बना है मधुबन ; तुम्हारे कारण आई - नन्ही सी चिड़िया ! नीम तुम्हारा बहुत शुक्रिया ! ! !