मेरी प्रिय मित्र मंडली

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

चाँद हंसिया रे !

 

चाँद हंसिया   रे  ! सुन  जरा !
ये कैसी  लगन जगाई तूने ?
 कब के जिसे भूले बैठे थे 
फिर उसकी याद दिलाई तूने !!

गगन में अकेला बेबस  सा  
 तारों से  बतियाता  तू ,
 नीरवता के  सागर में   
  पल - पल गोते खाता  तू  ,
कौन खोट  करनी में आया ? \
ये बात ना कभी  बताई तूने !!

किस जन्म किया  ये महापाप ?
शीतल   होकर  भी सहा   चिर -संताप ,
 दूर सभी अपनों से रह  
 ढोया सदियों ये कौन शाप ?
नित -नित घटता -बढ़ता रहता
नियति कैसी लिखवाई तूने  ? 

तेरी रजत चांदनी मध्यम सी  
 जगाती मन में अरमान बड़े ,
  यूँ ही    सजा बैठा सपने जो  
  हैं भ्रम- से ,करते हैरान बड़े,
 मुझ -सा   तू भी   है   तन्हा 
 ना जानी पर  पीर पराई  तूने !! 


स्वरचित -- रेणु
चित्र -- गूगल से साभार 
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धन्यवाद शब्द नगरी 

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (चाँद हंसिया रे ! ) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

दो परियां ये आसमान की ---- कविता -

दो परियां ये आसमान की
मेरी दुनिया में आई हैं ,
सफल दुआ जीवन की कोई 
स्नेह की शीतल पुरवाई है  !

 लौट आया है दोनों संग 
वो  भूला- सा बचपन मेरा ;
 निर्मल  मुस्कान से चहक उठा  
ये सूना सा आँगन मेरा ,
एक शारदा - एक लक्ष्मी सी  
पा   मेरी ममता इतराई है !

समय को लगे पंख मेरे 
तुममें  खो सुध-बुध बिसराऊँ मैं  
जरा मुख मुरझाये तुम्हारा   ,
तो विचलित सी हो  जाऊँ मैं ;
तुम्हारी आँख से छलके आंसूं ;
तो आँख  मेरी भी भर आई है !!

 दोनों मेरी परछाई -सी  
मेरा ही रूप साकार हो तुम,
मैं तुम में -तुम दोनों मुझमें   
मेरी ख़ुशी का असीम विस्तार हो तुम
मेरे  नैनों  की ज्योति तुम  
 प्राणों में दोनों समाई हैं !!

हो सफल जीवन में बनना 
मेरे संस्कार पहचान तुम , 
मैं वारूँ  नित ममता अपनी 
छूना सपनों का असमान तुम  ,
डगमगाए ना ये नन्हें  कदम  
मेरी  बाँहें   पर्वत बन आई है ! 

दो परियां ये आसमान की
मेरी दुनिया में आई हैं ,
सफल दुआ जीवन की कोई -
स्नेह की शीतल पुरवाई है !! 

सन्दर्भ --- दो प्यारी बेटियों की माँ के गर्व को समर्पित पंक्तियाँ--

बुधवार, 19 दिसंबर 2018

जब तुम ना पास थे -


कुछ घड़ियाँ थी या सदियाँ थी
तुम्हारे  इन्तजार  की ,
 बढ़ी   मन की तपन 
फीकी पड़ी रंगत बहार की !

बुझी-बुझी हर शै थी 
जब तुम ना पास थे  ,
आंगन , पेड़ , फूल , चिड़िया 
सब उदास थे !

  हवाएँ थी  पुरनम , 
 गुम  मन  मौसम थे;
 बरसने को आतुर
 येआँखों के सावन थे !! 

 खुद के   सवाल थे 
अपने ही   जवाब थे ,
चुपचाप  जिन्हें सुन रहे   
जुगनू,  तारे  ,मेहताब थे !
  
ना रहा बस में मेरे 
कब  दिल पे जोर था ,
उलझा रहा   भीतर  
 तेरी  यादों का शोर था !!

 भ्रम  सी थी हर आहट
 तुम जैसे  आसपास हो ।
कह रहा बोझिल मन
कहीं तुम भी  उदास हो !!


बुधवार, 12 दिसंबर 2018

सुन ! ओ वेदना-- कविता --

ब्लॉग पर 75 वीं  रचना 


सुन ! ओ वेदना 
जीवन में ,
लौट कभी ना आना तुम !
घनीभूत पीड़ा -घन बन 
ना पलकों पर छा जाना तुम !

हूँ आलिंगनबद्ध , सुखद  पलों से ,
कर ना   देना दूर तुम ,
दिव्य आभा से घिरी मैं  
ना हर लेना ये नूर तुम ,
सोई हूँ ले सपन  सुहाने   
ना मीठी  नींद से जगाना तुम!

 आज प्रतीक्षित है  कोई  
कुछ पग संग चलने के लिए ,
 रीते मन  में   रंग अपनी 
 प्रीत  का  भरने के लिए,
 लौटा  लाया जो खुशियाँ  मेरी    
 समझो ना उसे बेगाना तुम!

लौटी हूँ चिरप्रवास से 
 रिक्तियों के नभ से मैं,
आकंठ हूँ अनुरागरत  
 विरक्त हूँ   इस जग से मैं,
 बंधी हूं स्नेहपाश में 
ना बंधन ये तोड़ जाना तुम!

जो हैं शब्दों से परे
एहसास जीने दो मुझे,
बन गया अभिमान मेरा  
विश्वास जीने दो मुझे ,
जोड़ नाता अतीत से 
ना फिर मुझे  भरमाना तुम!

ना रुला देना मुझे
ना फिर सताना   मुझे ,
दिवास्वप्न ये मधुर से  
मिटा ना तरसाना  मुझे ,
दूर किसी जड़ बस्ती  में
जाकर के बस जाना तुम !! 


चित्र -- गूगल से साभार | 

शनिवार, 24 नवंबर 2018

रूमानियत

 



इस   क़दर अपना बनाया आपने  ,
कर दिया जग से पराया आपने  !

था दर्द की इन्तहा में  डूबा  ये दिल ,
चाहत का  मरहम लगाया आपने !

 मेरे  भीतर ही था सोया कहीं ,
  मेरा वो बचपन लौटाया  आपने! 

बदल गए मंज़र कायनात के,
वो हसीं जादू जगाया आपने  !

हुआ एक पल भी दूभर बिन आपके ,
 खुद का यूँ आदी बनाया आपने !

 इस  जमीं से आगे कब  था  मेरा जहाँ '
 आसमां पे ला बिठाया आपने !!

 रूमानियत का  है करिश्मा आपकी, 
मुझसे ही मुझको  मिलाया आपने !



शनिवार, 17 नवंबर 2018

आये अतिथि आँगन मेरे-- कविता -

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   आये  अतिथि  आँगन मेरे ,
 महक  उठे   घर - उपवन मेरे !!

छलके  खुशियों के पैमाने 
 गूँजें मंगल - गीत सुहाने , 
आज ना पड़ते  पाँव धरा पे  
भूल गये   सब दर्द पुराने ;
 खिला है कोना -कोना घर का
पतझड़ बन  गये फागुन  मेरे !!

जिस  पल  को थे नैना तरसे ,
देख उसे ये  तन - मन   हरषे ;
खूब निहारूं और  इतराऊँ -
आँगन आज मिलन -रंग  बरसे ;
अपनों  ने जब गले लगाया 
नैना बन गये सावन मेरे !!

 जगमग दीप द्वार  सजे  हैं ,
 झिलमिल  बन्दनवार  सजे  हैं ;
 पथ बिखरी   गुलाब पांखुरी 
 सुवासित गेंदाहार सजे हैं   ;
देव  अतिथि    तुम हो  मेरे !
 स्वीकार करो अभिनंदन  मेरे  !! 
  
 आये अतिथि आंगन मेरे ,
 महक  उठे   घर - उपवन मेरे !!!!!!!

चित्र -- गूगल से साभार -- 

बुधवार, 17 अक्टूबर 2018

कहीं मत जाना तुम -- कविता


बिनसुने मन की व्यथा  
दूर कहीं मत जाना तुम !
कब किसने कितना सताया 
सब कथा सुन जाना तुम ! !

जाने कब से जमा है भीतर 
दर्द की अनगिन तहें , 
 ज़ख्म बन चले नासूर 
अब तो लाइलाज से हो गए ; 
मुस्कुरा दूँ मैं जरा सा 
वो वजह बन जाना तुम ! ! 

रोक  लूँगी मैं  तुम्हें    
किसी पूनम की चाँद रात में ,
उस पल में जी  लूँगी मैं 
एक  उम्र तुम्हारे साथ में ;
नीलगगन की  छाँव  में बस  
मेरे साथ  जगते जाना तुम ! 

एक नदी बाहर है 
इक मेरे भीतर थमी है ,
 खारे जल की झील बन जो 
कब से  बर्फ़ सी जमी है ;
ताप देकर स्नेह का  
इसको पिघला जाना तुम ! ! 

साथ ना चल सको  
मुझे नहीं शिकवा कोई , 
मेरे समानांतर ही कहीं 
चुन लेना सरल सा पथ कोई ; 
निहार  लूँगी मैं  तुम्हें बस दूर से  
मेरी आँखों से कभी  
ओझल ना हो जाना तुम ! !

बिनसुने  मन की व्यथा  
दूर कहीं मत जाना तुम  !! 
-चित्र ०० गूगल से साभार - 
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शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

उलझन -- लघु कविता

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इक   मधुर एहसास है तुम संग  
 ये अल्हड लडकपन जीना ,
 कभी सुलझाना ना  चाहूँ  
 वो मासूम सी उलझन जीना !

  बीत  ना मन का मौसम जाए  
  चाहूँ समय यहीं थम जाए ;
 हों  अटल ये पल -प्रणय  के साथी  
 भय है, टूट ना ये  भ्रम जाए ,
संबल  बन गया  जीवन का 
 तुम संग ये नाता पावन जीना !

  बाँधूं  अमर  प्रीत- बंध मन के
 तुम  संग  नित  नये ख्वाब सजाऊँ, 
 रोज मनाऊँ तुम रूठो तो
पर    तुमसे रूठना -  कभी ना  चाहूं 
फिर भी  रहती चाहत मन   की  
इक   झूठमूठ की अनबन जीना !! 
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धन्यवाद शब्द नगरी - 

रेणु जी बधाई हो!,

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धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

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शनिवार, 29 सितंबर 2018

नेह - तूलिका -कविता




सुनो !   सखा,
 ले   नेह - तूलिका 
 रंग दो मन की कोरी चादर,
 हरे ,गुलाबी ,  लाल , सुनहरी 
 रंग इठलायें  जिस पर  खिलकर !

 सजे  सपने इन्द्रधनुष के   
 नीड- नयन     से मैं   निहारूं 
सतरंगी आभा पर इसकी 
 मैं तन -मन अपना     वारूँ,
बहें  नैन ,जल -कोष  सहेजे 
 मुस्काऊँ  ,नेह अनंत पलक  भर !!
  
 स्नेहिल सन्देश  तुम्हारे 
 नित शब्दों में  तुमसे मिल लूं,
 यादों के गलियारे  भटकूँ 
फिर से  बीता हर  पल  जी लूं  ;
डूबूं आकंठ उन  घड़ियों में 
 दुनिया की हर सुध  बिसराकर !

 अनंत मधु मिठास रचो तुम
आहत मन की आस रचो तुम,
रचो प्रीत- उत्सव कान्हा बन 
जीवन  का मधुमास रचो तुम ,
खिलो कंवल  बन   मानसरोवर  
सजो  अधर   चिर हास तुम  बनकर !!
चित्र -- पञ्च लिंकों से साभार --  
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धन्यवाद  शब्दनगरी ------- 

रेणु जी बधाई हो!,

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शनिवार, 22 सितंबर 2018

तृष्णा मन की - कविता

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 मिले  जब  तुम अनायास  
 मन मुग्ध    हुआ  तुम्हें  पाकर  ;
 जाने थी कौन तृष्णा  मन की  
जो छलक गयी अश्रु बनकर   ? 

 हरेक     से मुंह मोड़ चला  
  मन तुम्हारी  ही   ओर चला,
 अनगिन    छवियों में उलझा  
  तकता   हो भावविभोर चला 
 जगी भीतर  अभिलाष  नई-
 चली ले उमंगों की नयी डगर  ! !

प्राण स्पंदन हुए कम्पित,
जब सुने स्वर तुम्हारे सुपरिचित ;
जाने ये भ्रम था या तुम  वो  ही थे 
 सदियों से  थे  जिसके   प्रतीक्षित;
 कर  गये शीतल, दिग्दिगंत   गूंजे  
 तुम्हारे ही    वंशी- स्वर मधुर !!



 डोरहीन   ये  बंधन  कैसा ?
यूँ अनुबंधहीन     विश्वास  कहाँ ?
  पास नही    पर  व्याप्त मुझमें
 ऐसा जीवन  -  उल्लास  कहाँ ?
 कोई गीत  कहाँ मैं  रच पाती ? 
तुम्हारी रचना ये शब्द प्रखर !
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धन्यवाद शब्दनगरी 

रेणु जी बधाई हो!,

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धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

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विशेष रचना

आज कविता सोई रहने दो !

आज  कविता सोई रहने दो, मन के मीत  मेरे ! आज नहीं जगने को आतुर  सोये उमड़े  गीत मेरे !   ना जाने क्या बात है जो ये मन विचलित हुआ जाता है ! अना...