मेरी प्रिय मित्र मंडली

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

तुम मिले कोहिनूर से -- कविता


शनिवार, 6 अप्रैल 2019

कौन दिखे ये अल्हड किशोरी सी -- कविता


 चंचल  नैना .    फूल सी कोमल  ,
 कौन दिखे  ये अल्हड किशोरी  सी  ? 
रूप - माधुरी  का  महकता  उपवन -
लगे  निश्छल  गाँव की   छोरी   सी  !
 

मिटाती मलिनता  अंतस की 
मन  प्रान्तर  में आ बस जाए ,   
रूप   धरे  अलग -अलग  से 
 मुग्ध,  अचम्भित  कर जाए ,
 किसी    पिया की है प्रतीक्षित   
 लिए    मन   की  चादर   कोरी सी !  

तेरी   चितवन  में  उलझा  मनुवा -
तनिक  चैन  ना      पाए,
 यही  ज्योत्स्ना  चुरा  के  चंदा  
 प्रणय  का  रास  रचाए ;
 रंग ,गंध  , सुर   में  वास  तेरा  
 तू सृष्टि की  रंगीली  होरी  सी ! 

अनुराग स्वामिनी  मनु  की 
तुम    नटखट  शतरूपा सी,
शारदा तुम्हीं लक्ष्मी  , सीता,
शिव की शक्तिस्वरूपा  सी ,
अपने श्याम सखा में  उलझी  
 तुम्हीं राधिका गोरी सी !!

सृष्टा की अनुपम  रचना 
तुझ बिन सूना जग का आँगन ,
सदा धरे  धरा सा  संयम     
 है  विकल जिया का  अवलम्बन ,
 शुचिता  .  तुम्हीं   स्नेह ,करुणा,
 तुम माँ  की मीठी लोरी सी !! 

चित्र -  गूगल  से साभार


शनिवार, 9 मार्च 2019

उस फागुन की होली में -- कविता


जीना  चाहूँ वो लम्हे बार -बार ,
 जब तुमसे जुड़े थे मन के तार !

जाने  उसमें  क्या जादू  था   ?
 ना रहा जो खुद पे  काबू  था !
 
कभी गीत बन कर हुआ मुखर,
 हँसी में घुल  कभी गया बिखर !
 
प्राणों में मकरंद घोल गया,
 बिन कहे ही सब कुछ बोल गया !
   
इस धूल  को बना गया    चन्दन   
सुवासित , निर्मल और पावन 
 
कभी चाँद हुआ ,कभी फूल हुआ,
या चुभ  हिया की शूल हुआ !

लाल था कभी - कभी नीला,
 कभी सिंदूरी - कभी पीला !
 
कोरे मन  रंग  कर निकल गया ,
कभी   अश्रु बनकर ढुलक गया  ! 

ना खबर हुई  क्या ले गया  
क्या  भर गया खाली झोली में  ?
वो चुटकी भर..अबीर तुम्हारा
 उस फागुन की होली में !!! 
स्वरचित -- रेणु-
चित्र -- गूगल से साभार 

  

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

हार्दिक अभिनन्दन !

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वीर अभिनन्दन !    हार्दिक अभिनन्दन  ! 
 तुम्हारे   शौर्य  को  कोटि  वन्दन !

 पुलकित , गर्वित  माँ  भारती 
 तुम्हारे   निर्भीक   पराक्रम से ,
 मृत्यु -  भय से हुए ना विचलित 
  ना चूके संयम से ,
सिंह पुत्र  तुम जननी के  
 सहमा शत्रु नराधम !!

 शत्रु भूमि पर   जा देखो 
 मातृभूमि का मान बढ़ाया  ,
अर्जित की अखंड कीर्ति   
 ना पीछे कदम हटाया ,
मान -मर्दन किया   पापी का 
 रहा  अडिग हिमालय सा तन !

 कोटि नैन बिछे पथ में 
स्वागत को आज  तुम्हारे  ,
 एक कुटुंब सा जुटा राष्ट्र 
 अपलक तुम्हे   निहारे ,
 तुम्हारा यश रहे  अमर  जग में
  पुकार रहा  यही जन - जन !! 

  
स्वरचित -- रेणु
चित्र --गूगल से साभार --

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

लौटा माटी का लाल !

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 गूँजी    मातमी धुन 
  लुटा यौवन .
  लौटा माटी का लाल 
 माटी में मिल जाने को !
तन सजा तिरंगा !

 इतराया था एक दिन 
  तन   पहन  के खाकी
 चला वतन की राह 
 ना कोई चाह थी बाकी 
  चुकाने  दूध का कर्ज़  
 पिताका मान बढाने को !
 लौटा माटी का लाल 
 माटी में मिल जाने को !!
तन सजा तिरंगा !

रचा चक्रव्यूह  
शिखंडी शत्रु ने 
 छुपके घात लगाई 
कुटिल  चली चाल 
 मांद जा जान छिपाई 
पल में देता चीर
ना  आया  आँख मिलाने को !
 लौटा माटी का लाल 
 माटी में मिल जाने को !!
तन सजा तिरंगा !

उमड़ा जन सैलाब  
विदा  की आई बेला ,
हिया विदीर्ण महतारी आज 
आंगन   ये कैसा मेला ?
 सुत सोया अखियाँ मूंद
 जगा ना  धीर  बंधाने  को;
लौटा माटी का लाल -
 माटी में मिल जाने को ;
 तन सजा  तिरंगा !!! 


पुलवामा  के वीर शहीदों को  अश्रुपूरित    नमन !!!!!!!!!
स्वरचित -- रेणु-- 
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शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

चाँद हंसिया रे !

 

चाँद हंसिया   रे  ! सुन  जरा !
ये कैसी  लगन जगाई तूने ?
 कब के जिसे भूले बैठे थे 
फिर उसकी याद दिलाई तूने !!

गगन में अकेला बेबस  सा  
 तारों से  बतियाता  तू ,
 नीरवता के  सागर में   
  पल - पल गोते खाता  तू  ,
कौन खोट  करनी में आया ? \
ये बात ना कभी  बताई तूने !!

किस जन्म किया  ये महापाप ?
शीतल   होकर  भी सहा   चिर -संताप ,
 दूर सभी अपनों से रह  
 ढोया सदियों ये कौन शाप ?
नित -नित घटता -बढ़ता रहता
नियति कैसी लिखवाई तूने  ? 

तेरी रजत चांदनी मध्यम सी  
 जगाती मन में अरमान बड़े ,
  यूँ ही    सजा बैठा सपने जो  
  हैं भ्रम- से ,करते हैरान बड़े,
 मुझ -सा   तू भी   है   तन्हा 
 ना जानी पर  पीर पराई  तूने !! 


स्वरचित -- रेणु
चित्र -- गूगल से साभार 
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धन्यवाद शब्द नगरी 

रेणु जी बधाई हो!,

आपका लेख - (चाँद हंसिया रे ! ) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

दो परियां ये आसमान की ---- कविता -

दो परियां ये आसमान की
मेरी दुनिया में आई हैं ,
सफल दुआ जीवन की कोई 
स्नेह की शीतल पुरवाई है  !

 लौट आया है दोनों संग 
वो  भूला- सा बचपन मेरा ;
 निर्मल  मुस्कान से चहक उठा  
ये सूना सा आँगन मेरा ,
एक शारदा - एक लक्ष्मी सी  
पा   मेरी ममता इतराई है !

समय को लगे पंख मेरे 
तुममें  खो सुध-बुध बिसराऊँ मैं  
जरा मुख मुरझाये तुम्हारा   ,
तो विचलित सी हो  जाऊँ मैं ;
तुम्हारी आँख से छलके आंसूं ;
तो आँख  मेरी भी भर आई है !!

 दोनों मेरी परछाई -सी  
मेरा ही रूप साकार हो तुम,
मैं तुम में -तुम दोनों मुझमें   
मेरी ख़ुशी का असीम विस्तार हो तुम
मेरे  नैनों  की ज्योति तुम  
 प्राणों में दोनों समाई हैं !!

हो सफल जीवन में बनना 
मेरे संस्कार पहचान तुम , 
मैं वारूँ  नित ममता अपनी 
छूना सपनों का असमान तुम  ,
डगमगाए ना ये नन्हें  कदम  
मेरी  बाँहें   पर्वत बन आई है ! 

दो परियां ये आसमान की
मेरी दुनिया में आई हैं ,
सफल दुआ जीवन की कोई -
स्नेह की शीतल पुरवाई है !! 

सन्दर्भ --- दो प्यारी बेटियों की माँ के गर्व को समर्पित पंक्तियाँ--

बुधवार, 19 दिसंबर 2018

जब तुम ना पास थे -


कुछ घड़ियाँ थी या सदियाँ थी
तुम्हारे  इन्तजार  की ,
 बढ़ी   मन की तपन 
फीकी पड़ी रंगत बहार की !

बुझी-बुझी हर शै थी 
जब तुम ना पास थे  ,
आंगन , पेड़ , फूल , चिड़िया 
सब उदास थे !

  हवाएँ थी  पुरनम , 
 गुम  मन  मौसम थे;
 बरसने को आतुर
 येआँखों के सावन थे !! 

 खुद के   सवाल थे 
अपने ही   जवाब थे ,
चुपचाप  जिन्हें सुन रहे   
जुगनू,  तारे  ,मेहताब थे !
  
ना रहा बस में मेरे 
कब  दिल पे जोर था ,
उलझा रहा   भीतर  
 तेरी  यादों का शोर था !!

 भ्रम  सी थी हर आहट
 तुम जैसे  आसपास हो ।
कह रहा बोझिल मन
कहीं तुम भी  उदास हो !!


बुधवार, 12 दिसंबर 2018

सुन ! ओ वेदना-- कविता --

ब्लॉग पर 75 वीं  रचना 


सुन ! ओ वेदना 
जीवन में ,
लौट कभी ना आना तुम !
घनीभूत पीड़ा -घन बन 
ना पलकों पर छा जाना तुम !

हूँ आलिंगनबद्ध , सुखद  पलों से ,
कर ना   देना दूर तुम ,
दिव्य आभा से घिरी मैं  
ना हर लेना ये नूर तुम ,
सोई हूँ ले सपन  सुहाने   
ना मीठी  नींद से जगाना तुम!

 आज प्रतीक्षित है  कोई  
कुछ पग संग चलने के लिए ,
 रीते मन  में   रंग अपनी 
 प्रीत  का  भरने के लिए,
 लौटा  लाया जो खुशियाँ  मेरी    
 समझो ना उसे बेगाना तुम!

लौटी हूँ चिरप्रवास से 
 रिक्तियों के नभ से मैं,
आकंठ हूँ अनुरागरत  
 विरक्त हूँ   इस जग से मैं,
 बंधी हूं स्नेहपाश में 
ना बंधन ये तोड़ जाना तुम!

जो हैं शब्दों से परे
एहसास जीने दो मुझे,
बन गया अभिमान मेरा  
विश्वास जीने दो मुझे ,
जोड़ नाता अतीत से 
ना फिर मुझे  भरमाना तुम!

ना रुला देना मुझे
ना फिर सताना   मुझे ,
दिवास्वप्न ये मधुर से  
मिटा ना तरसाना  मुझे ,
दूर किसी जड़ बस्ती  में
जाकर के बस जाना तुम !! 


चित्र -- गूगल से साभार | 

शनिवार, 24 नवंबर 2018

रूमानियत

 



इस   क़दर अपना बनाया आपने  ,
कर दिया जग से पराया आपने  !

था दर्द की इन्तहा में  डूबा  ये दिल ,
चाहत का  मरहम लगाया आपने !

 मेरे  भीतर ही था सोया कहीं ,
  मेरा वो बचपन लौटाया  आपने! 

बदल गए मंज़र कायनात के,
वो हसीं जादू जगाया आपने  !

हुआ एक पल भी दूभर बिन आपके ,
 खुद का यूँ आदी बनाया आपने !

 इस  जमीं से आगे कब  था  मेरा जहाँ '
 आसमां पे ला बिठाया आपने !!

 रूमानियत का  है करिश्मा आपकी, 
मुझसे ही मुझको  मिलाया आपने !



विशेष रचना

मन पाखी की उड़ान -- प्रेम गीत ( prem geet)

              मन पाखी की उड़ान  तुम्हीं तक मन मीता  जी का सम्बल तुम एक  भरते प्रेम घट रीता  ! नित निहारें नैन चकोर  ना   नज़र में कोई दूजा  हो...